बुधवार, 27 अप्रैल 2016

उसूलों की भेंट

बचपन की सीख
कि ज़िन्दगी उसूलों पे चलती है
मेने भी कुछ बनाये थे

पर जब किताबों से बाहर
व्यावहारिक दुनिया आये थे
उसूलों ने कुछ यूँ थपेड़े खाये थे

वो ही लूटेरे निकलेे जिसने कायदे बनाये थे
खुद की सीख के चीथड़े करते हुए ना शरमाये
मेरे उसूल झूठी शान की भेंट चढ़ाये थे

अब कैसे बदलता खुद को
बचपन में घोट कर पिलाये थे
उनकी आदत थी बदल जाने की
हमने तो एक जीवन के उसूल बनाये थे

ज़मीर से जुड़ा था मेरा हर उसूल
फिर समाज के कुछ कायदे कबूल
ये ही थी जीवन की सबसे बड़ी भूल

हर किसी ने उसूलों के कतरे बहाए है
किसी ने लहू पिया किसी ने टुकड़े चबाये है
फिर क्यों मेने उसूलो के ख़ातिर
ज़िन्दगी के हसीन पल गंवाए है

उसूलो की भेंट मैने सुखद पल खो दिए
दुनिया से लड़ते लड़ते होंसले भी रो दिए

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

बला का खूबसूरत।।

बला का खूबसूरत है वो
मुझे तो नाकाफी था
#
शिकायत है उनको रब्ब ना समझा
#

है चीज कुछ ऐसी ज़िन्दगी
जिसको माना हो भगवान
जागा है उसका अहम का शैतान
न बना भगवान, ना रह पाया इंसान

बला का खूबसूरत है वो
मगर दिल खूबसूरत रख ना पाया
रेत सा फिसलती है रोज ज़िन्दगी
कोई रिश्ता ना उससे सम्भल पाया

#
अहम को जो मिटटी में मिलाया होता
#

बला का खूबसूरत है वो
खूबसूरत दिलों का साथ पाया होता
पलकों पर ना सही बेशक़
दिल में बिठाया होता
ज़िन्दगी का सलीका सिखाया होता

#
वजूद है कुछ ऐसा मेरा
दिल में रखता हूँ अच्छाई
अच्छो की तमन्ना है दिल की
बस ये ही मुझ में एक बुराई

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

चिंता

सबको खाती है
कुछ बात हुई न
कि चली आती है
हँसते खेलते जीवन में
कौन सी आग लगाती है

बुधवार, 30 मार्च 2016

कशमकश में हूँ मैं

कश्मकश में हूँ मैं
वो मेरा है
दिल कहता है
हो सकता नहीं

भुलाना भी चाहूँ गर उसे
मेरी साँसे क्यों टूटती है
एक पल को लगे
पीछे दुनिया छूटती है
कश्मकशम मे हूँ मैं

वो बेशक़ भूला सा लगता है मुझे
कहीं राहों पर फिर मिल जाता है
मेरा उदास चेहरा खिल जाता है
वो नजरें क्यों फिर चुराता है
कशमकश में हूँ मैं

मंगलवार, 22 मार्च 2016

मैं औरत हूँ

काँच की तरह रोज टूट जाती हूँ
अपने ही वजूद से पीछे छूट जाती हूँ

हर दिन नया ज़ख्म, मेरे जिस्म पर उकेर देता है
अपनी हवस और क्रोध से, मेरी रूह हर लेता है

बेबसी का ये मंजर, दशको से मेने ही झेला है
खुशियो को जब भी चाहा, पीछे ही धकेला है

बर्बरता का आलम तो देखो उस वहशी का
नफ़रत भी हमसे, और मोहब्बत का तकाजा भी

अस्तित्व की लड़ाई मैं हार गई मैं लड़ते लड़ते
नोच गया मेरा जिस्म वो, बेजान मानकर

मेरी रूह  को तार तार कर गया, जबरदस्ती मोहब्बत से
कौन सा सकूँ मिल गया उसे, मेरी बंजर सी धरती से

सोमवार, 14 मार्च 2016

मैं ही हूँ बस, ए दिल

हक़ जताना छोड़ दें ए दिल
कोई साथ नहीं निभाता
है ज़िन्दगी जब तलक
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

पल दो पल को मिलते है लोग
अपने हिसाब से दुनिया बनाते
गम छोड़ उन लोगो के जाने का
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

दिमाग ने भी बहुत समझाया तुझे ए दिल
तेरी बनाई दुनिया में जीना है मुश्किल
पत्थर रख ले अरमानो की गठरी पर तू
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

समझ जरा तेरे लिए कोई दिल न बना ए दिल
बस आंसुओ पर खत्म होती है तेरी हर मंजिल
छोड़ दे और जान ले, चाहे  आज हो या कल
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस



शनिवार, 12 मार्च 2016

कांटा बन चुभता हूँ मैं

जिनके दिलों के गुलाब होते थे
अब कांटा बन चुभता हूँ मैं

जिनके ख़्वाबों में हुआ करते थे हम
दूस्वप्न बन नासूर बन गया हूँ मैं

ख़ुदा की इबादत थे जिनकी नजरों में हम
आज उन क़दमों की ठोकर बन गया हूँ मैं

उम्र भर कड़वे शब्दों के जाम की बात करते थे जो
आज कागज के टुकड़े समझने लगे है वो

बस कुछ इस तरह ही दुखता हूँ मैं
अब कांटा बन चुभता हूँ मैं

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

एक दोस्त

एक दोस्त
मिलता है
वादा करता
जिंदगी के
गुर सिखाने का

एक दोस्त
एक नदी में
तैरने की कला
वो सिखाने ले चला
जाने फिर क्या हुआ
हाथ छुड़ाया
अनजानों से मिलाया
छूमंतर हो गया

एक दोस्त
उम्मीदें जगाता है
होंसला बढ़ाता है
फिर क्यों
एक दिन
सब तोड़
सब छोड़
निकल जाता है
एक दोस्त एक दोस्त

गुरुवार, 3 मार्च 2016

औरत के समर्पण की पहचान है वो

हर कदम लड़ती है
तब ही साहसी लगती है

ज़िन्दगी उसके लिए मुश्किलें चुनती है
वो बस हर मुसीबत का हल बुनती है

हर गम ने आकर उसको घेरा है
पर उसके दिल में रौशनी का बसेरा है

मोतियों सा चमकता रहता है वो
बेशक मायूसी का उम्र भर साया हो

होंठो से खुशियों को बांटता है हर पल
बेशक़ उदासी से भरा है उसका हर पल

हौंसलों की उड़ान है वो
मजबूती की पहचान है वो

औरत के समर्पण की पहचान है वो

बुधवार, 2 मार्च 2016

ओह सजन रे

मोतियों सा चमके है तू
अँखियो में दमके है तू
ओह सजन रे

धड़कनो का साज हो गया तू
मेरा कल और आज हो गया तू
ओह सजन रे

पलकों के तले रहने लगा है तू
साँसों संग बहने लगा है तू
ओह सजन रे

रगों में बहता है दर्द बनकर तू
ज़िन्दगी में हो शामिल दवा बनकर तू
ओह सजन रे

ज़िन्दगी भर की जागीर तो नहीं तू
बस दो पल का सुखद मिलन बन जा तू
ओह सजन रे

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

खुश है वो अपनी दुनिया में

एहसास हुआ
भ्रम था जो
आज टूट गया
जब उसका साथ
मुझ से छूट गया
लगता था कोई
मेरी खुशिया
लूट गया
खुश हो गया
वो अपनी दुनिया में
इतना बहुत है
हक़ जताना मुझे
कभी आया नहीं
इसलिए कोई भी रिश्ता
निभाया नहीं
वक़्त ही कुछ ऐसा है
हक़ जताये बिना
कुछ मिलता नहीं
सुखी जमीं पर
फूल खिलता नहीं

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

भटकती ज़िन्दगी

रोजाना सुनने में आता है टीवी पर आज ये हो गया वो हो गया  जानते हो ये सब हमेशा से होता आया है। पर प्रसार के माध्यमो की कमी से लोगो को पता नहीं चलता था तो मुद्दे इतने बड़े लेवल पर गंभीर नहीं होते थे।
और इस का फायदा चंद रसूखदार लोग उठाते है। सामान्य व्यक्ति अपनी उलझनों के साथ और उलझन बढ़ा लेता है।
दिल्ली में माननीय केजरीवाल जी ने क्या किया इसका ताजा उदहारण है। उसने सभी कांग्रेस और बीजेपी व् अन्य सभी पार्टियो को चोर बताया। सत्ता पर काबिज होते ही लालू जैसे मशहूर चारा घोटाले के साथ खड़े नजर आए। मीडिया ने सवाल उठाये तो अन्य राजनेताओ की तरह सफाई देते नजर आये। आज के समय सभी नेताओ में वो सत्ता के सबसे लोभी व्यक्ति है। पैसे के लोभ की सीमा हो सकती है पर सत्ता के लोभ की नहीं होती। हार्दिक पटेल भी इस कड़ी का मोहरा है उसने भी पाटीदार आंदोलन को अपनी राजनीती में चमकने की बैसाखी बना लिया। अण्णा जैसे ईमानदार व्यक्तियो की भी छवि इन लोगो की वजह से धूमिल हुई।
इन लोगो ने साबित कर दिया अगर आप झूठ को भी चिल्लाकर अच्छे से पेश करो तो वो सच हो जाता है। भ्रष्ठ जो है वो कल भी थे और आज भी है। और सभी भ्रष्ठ लोगो को आप गोली भी नहीं मार सकते। आवश्यकता है नियमो में सुधार करने की। मानसिकता बदलने की। आज भी हर व्यक्ति अपना काम निकलवाने के लिए चंद घड़ी लाइन में ना खड़ा होना पड़े तो पहले भाई भतीजावाद का सहारा ढूंढेगा। नहीं मिला तो पैसे की धौंस से करवाना चाहेगा। फिर आप कैसे नेताओ और अफसरों पर ऊँगली उठा सकते हो जबकि शैतान आप के अंदर है। वोट के समय भी उम्मीद्वार को ना देखकर आप प्रलोभनों से वोट देते हो।

आंदोलन तब होता है जब आप पर कोई तानाशाही कर रहा हो । आप द्वारा चुनी गई सरकार के आगे आंदोलन का मतलब है पहले खुद को शीशे के सामने खड़ा करें।
जय हिन्द

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

आखिर तू है कहीं

ख़ामोश रहने लगा है
शायद थोड़ा उदास भी

मुझे से बातें करने से कतराता है
हर लम्हा वो नजरें जो चुराता है

कभी मिल भी जाए गर नजर
एक झूठी मुस्कान बिखेर जाता है

मेरे सीने को इतने प्रहार कर जाता है
फिर भी एक कोने में अलख जगाता है

एक ख़ुशी आखिर तू है कहीं
दिल को सकूँ दिलाती है
तेरी मौजूदगी ही तो है
मेरी नब्ज़ चलती जाती है

#
बेशक़ मेरी राहों से, बंद हुआ तेरा आना
मगर आज भी पायल की खनक का हूँ दीवाना

कलम ...........बुनती अरमान

लिख देती
हर पन्ने पर खुशिया
कोरे मन को
शब्दों से बुन देती

मासूमियत भरे
अल्फ़ाज़ उसके
दिलों पे छा जाए

दो अनजान का
रिश्ता बनाए
एहसास सुनाए

दास्ताँ का लिफाफा
जिसने भी पढ़ा है
उसने खूब जाना और माना

दुआ है मेरी
कलम बुनती अरमान
यूँ ही चलती रहे

कोरी है जो जिंदगियां
इस कलम से खिलती रहे

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

ज़िन्दगी

मिल गया मुकद्दर
कि ज़िन्दगी उड़ने लगी

काँटों सी झूलती
मखमल पर चलने लगी

बरसो से तपती हुई अँखिया
आज झील सा शांत हो गई

रोज रोज की तंग थी खुशिया
आज खुलकर मेरी ही हो गई

सदियो से कटती ना थी जो रतिया
आज खुले आँगन में ही सो गई

लगता तो है आखिर
मेरी ज़िन्दगी मेरी हो गई

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

क्यों बेचैन है वो

क्यों बेचैन है वो
जब साथ था तब भी
दूर हुआ तो अब भी
क्यों बेचैन है वो
पहले मेरे शब्दों से परेशां
अब मेरी ख़ामोशी से हैरान
क्यों बैचैन है वो
मैं बेशक टूटा हूँ
पर उस से छूटा हूँ
फिर क्यों बैचैन है वो
दुनिया भी छोड़ सकता नहीं
बहुतो की उम्मीदें तोड़ सकता नहीं
फिर क्यों बैचैन है वो
अपने आसमान की छाँव में
बेहतर रिश्तों की पनाह में
फिर क्यों बैचैन है वो
फिर क्यों बैचैन है वो

शनिवार, 16 जनवरी 2016

वक़्त बे वक़्त ये आंधिया आशियाँ हिला जाती है

जब भी कदम बढ़ाये थे की
कुछ तिनके मिलाये थे की
वक़्त बे वक़्त ये आंधिया आशियाँ हिला जाती है

होश की बात नहीं थी ये दोस्तों
वक़्त की गर्दिश ले डूबती है हमें
लोग तो ताश के पत्तो से महल बना देते है
एक हमारा है कि
वक़्त बे वक़्त ये आंधिया आशियाँ हिला जाती है

कोई ख्वाहिश नहीं रखता हूँ चाहने वालो से
बस उनकी ख्वाहिशो में मिटा चला जाता हूँ
रौशनी हुयी थी ना कि रोशन दानो में
वक़्त बे वक़्त ये आंधिया आशियाँ हिला जाती है

लकीरें बनाना आसाँ है ए दुनिया वालो
चार गज की ज़मीं में दफ़न हो जाऊंगा
फिर ढूंढते रहना कि कोई शख्स भी था
तिनकों से महल बनाने वाला, जिसका
वक़्त बे वक़्त ये आंधिया आशियाँ हिला जाती है

#
होंसला दे मेरे मौला मगरूर आंधियो से लड़ने का
यूँ गिर गिर कर सम्भलने का, मौकापरस्त ज़माने से
ख़ुद के खंजर भी रस्में ए कायनात जताते है
मेरे मखौल को भी, वासना के भूत बताते है
फिर क्यों जाने लौट मेरा आशियाँ निशाना बनाते है

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

मोह छोड़ उनसे है नाता तोड़ा,

बहते अश्क़ो को अब नहीं है रोना
ज़िन्दगी जो बन गई थी एक खिलौना
उसे कुछ सपनो से है संजोना
क्योंकि आज मेने मोह छोड़ उनसे है नाता तोड़ा,

रिश्तों की जुगलबंदी में उलझा था जो
आज उन्माद से भरे नव पथ पर चला है वो
रोज़ के झगडे अब ना मुस्करा ना पाएंगे
मेरे जीवन में भी रंग आएंगे
क्योंकि आज मैंने मोह छोड़ उनसे है नाता तोड़ा,

सिसकते लम्हें इतिहास हो जायेंगे
कांपते हुए स्वर, गीत गुनगुनाएंगे
हम अब खुद भी खुश रहेंगे,
लिया प्रण औरो को भी हंसाएंगे
क्योंकि आज मैंने मोह छोड़ उनसे है नाता तोड़ा,
एक नया पन्ना आज फिर ज़िन्दगी में है जोड़ा

सोमवार, 11 जनवरी 2016

ग़ज़ल:- उदासी के दामन तले वो मेरा अश्क़ छुपा लेता है

उदासी के दामन तले
वो मेरा अश्क़ छुपा लेता है
मैं डूब भी जाऊ इश्क़ में
वो आँखों से छलका देता है
उदासी के दामन तले
वो मेरा इश्क़ छुपा लेता
वो मेरा इश्क़ छुपा लेता है
वो मेरा इश्क़ छुपा लेता है

जब भी कोई बात उस से में पुछु
होंठो तले जज्बात दबा लेता है
उदासी के दामन तले
वो मेरा अश्क़ छुपा लेता है
वो मेरा अश्क़ छुपा लेता है

हो जाऊ मैं हो जाऊ में गैर भी अगर
वो अपना बनाने का राज बता देता
उदासी के दामन तले
वो मेरा अश्क़ छुपा लेता है

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

चुनाव:- लोकतान्त्रिक वैवाहिक स्वरूप आयोजन

चुनाव या कह सकते है सरकारी वैवाहिक लोकतान्त्रिक आयोजन
ये अपनी तरह का अनूठा आयोजन है जिसमे आयोजक को वेतन मिलता है। आयोजन में आने वाले लोग वोट रूपी शगुन से एक स्वस्थ समाज की कल्पना करते है कि उनके द्वारा चयनित उम्मीदवार उनको एक स्वच्छ वातावरण देगा जिसमे वो अपने कार्यो का निर्वहन निर्भयकता से कर सके। चुनते वक़्त उम्मीदवार का ईमानदार ही होना ही काफी नहीं होता क्योंकि अगर एक व्यक्ति कितना भी ईमानदार हो और वह व्यक्ति अपने क्षेत्र की समस्या को उच्च अधिकारी अथवा सम्बंधित विभाग में रखने की नेतृतीव् क्षमता रखता हो। दृढ़ता के साथ अपनी बात को ऊपर तक ले जाए।

मैने कुछ कर्मचारियों को चुनाव में ड्यूटी लगते ही उनकी भौहें तानते देखा है ये वो मेहनतकश लोग होते है जो सारा साल शायद एक कार्य का भी निर्वहन दिल से नहीं करते। जो व्यक्ति हमेशा मेहनत से कार्य करता है उसके लिए तो ये सुनहरा अवसर होता है अपने कौशल का प्रदर्शन करने का। अन्यथा आलसी व्यक्ति को ही ये चुनोतिपूर्ण कार्य प्रतीत होगा। और मेहनतकश इसे सहजता से कर भी जायेगा।
एक पल के लिए अगर आप को बताऊ तो आप दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के कार्यक्रम के हिस्सा हो जो कि अपने आप में अहम् उपलब्धि है। 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

वो जब आये मेरे मोहल्ले में

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
होंठो से नहीं, नजरो से बतियाना हुआ
कुछ तो नजरो का मिलाना
कुछ उनका शर्माना हुआ

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
कुछ इस तरह उनका मुस्कराना हुआ
होंठ तो खुले नहीं, चेहरा गुलाब हो गया
देखते ही मैं तो लाजवाब हो गया

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
कुछ इस तरह उसका इतराना हुआ
उसने तो पूछ लिया, पता अपने ख़ास का
रंग उड़ गया मेरे आत्म विश्वास का

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
मेरा दिल ही निशाना हुआ
वो तो चले गए वापिस कब से
मेरे लिए उम्र भर का अफ़साना हुआ

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
तो मेरा दिल भी दीवाना हुआ

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

मोम सा हो गया हूँ मैं उस पत्थर के प्यार मैं

मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं
वक़्त से नाता तोड़ दिया
उस कम्बखत के इन्तजार में
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

बहुत जतन लगाये
उसके दिल को रास ना आया
मेरे धड़कते दिल का
उसको विश्वास ना हो पाया
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

मेरी आहों पर हँसता था वो
मेरी साँसों में रचता था जो
टूट कर बिखर गया उसकी बाँहों में
वो काँटे बिखेर गया मेरी राहों में
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

ज्योति बन जिंदगी रोशन कर दे ये समझा था मैं
आंसुओ का समुन्दर मेरी झोली में डाल गया है वो
नासूर बन जिंदगी को डस गया है जो
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं



बुधवार, 9 दिसंबर 2015

वजह क्या है मुझे चाहने की

तू गुलाबो से घिरा है
तेरा हर ख़्वाब भी मिला है
फिर इतना बता
वजह क्या है मुझे चाहने की

संगमरमर सा तो में भी नहीं
जो मुझे मोहब्बत का ताज समझे
फिर इतना बता
वजह क्या है मुझे चाहने की

बह गया हूँ तेरी आँखों से
कभी ज़ख्म तो कभी दर्द बनके
फिर इतना बता
वजह क्या है मुझे चाहने की

मेरे दिल में कोई जगह नहीं
तेरे दिल का ख़्वाब सजाने की
फिर इतना बता
वजह क्या है मुझे चाहने की
फिर इतना बता
वजह क्या है मुझे चाहने की

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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

गीत:- बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

ना इसकी फिकर ना उसका है डर
हर दर्द से अनजान, ना चाहतो का असर

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

इक झूठी मुस्कान, दूजा स्वर अभिमान
टूटा दिल नहीं, रुसवा है उसकी पहचान

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

चर्चे उसके होते है अब हर दूकान और मकान
मीनारों और किलों से ऊँची हो गई है उसकी शान

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

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#
अंदाज ए यार हो गए बेज़ार
मोहब्बत का नहीं इख़्तियार

सोमवार, 30 नवंबर 2015

अक्स तलाशती ज़िन्दगी

अक्स तलाशती ज़िन्दगी ओझल हो गई है समस्याओ के काले बादलों में, कोई फुरसत का लम्हें की गुजारिश कर भी लूँ। कोशिशो के बावजूद फिर उसी चोराहे पर मिलता हूँ जहाँ रास्ते तो बहुत है, मगर मंजिल कहाँ होगी मालूम नहीं। हर जगह बेशक गलत हो सकता हूँ में, मगर मेरा दिल भी गलत है ये मालूम ना था। अक्सर सुना है दिल जो कहे वो किया कीजिये। कम्बखत भग दौड़ के ज़माने में हमारा तो दिल इम्तिहान में हार गया। मुझे किसी धर्म/जाति से कोई सारोकार नहीं। मेरी धड़कने एक ही भाषा की मुरीद है जो दिल से छूकर गुजरती हो। जब वो दिल को छूने वाली लहर भी कोई धोखा होने का एहसास दे तो आप के अंदर कोई ज़िन्दगी बाकि नहीं रहती।

रविवार, 8 नवंबर 2015

काव्य रस

काव्य मेरा रसहीन हो गया
जब से वो और भी हसीन हो गया

उसके लिए में ज़मीन
वो मेरा आस्मां हो गया

काव्य को मेरे हास्य जताता है
अपने रूप को सर्वोपरि दर्शाता है

जब से वो मेरे लिए अनमोल हुआ
मेरा स्वयं का मोल खो गया

#
वक़्त ही फल का रंग दिखाता है
अच्छे से अच्छा बदल जाता है

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

कविता

अभी टूट कर गिरा था
कि नए कोंपले फुट पड़ी

आँधी से जजर्र हुआ वृक्ष
नए अध्याय की और बढ़ चला

निशान अभी बाकि है क्षति के
बिखर सौ टुकड़े हुए मति के

हारी नहीं हिम्मत उठ खड़ा हुआ हूँ
लडख़ड़ा ही सही चलने लगा हूँ

फिर एक नया मौसम आएगा
मेरी शाखाओ से चमन लहराएगा

टूटी थी आस जिनकी
खुशियों का समां बंध जायेगा

ये टूटा हुआ दरख्त
फिर सम्भल जायेगा

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

बैसाखियों पर ज़िन्दगी

आसाँ नहीं होती
बैसाखियों पर ज़िन्दगी

मोहताज हो जाती है जिंद सहारे को
ढूंढ़ नहीं सकता किसी किनारे को

आसाँ नहीं होती
बैसाखियों पर ज़िन्दगी

लाचारी के आलम में अपने भी रूठ जाते है
दूसरों का बोझ उठाते वक़्त रिश्ते भी टूट जाते है

आसाँ नहीं होती
बैसाखियों पर ज़िन्दगी

दया की नजरें चुभती है इन आँखों को
वक़्त तोड़ नहीं सकता बेबसी की सलाखों को

आसाँ नहीं होती
बैसाखियों पर ज़िन्दगी
आसाँ नहीं होती
बैसाखियों पर ज़िन्दगी

#
मुझे भी बिन बैसाखी जीने की चाहत है
ये ही उम्मीद जीवन में एक राहत है

बुधवार, 30 सितंबर 2015

पहला प्यार

मोहित हो गयी हूँ मैं
जबसे लड़े उनसे नैना
अँखिया दरश गयी उनको
भूली भूख प्यास और चैना

सजदे में उसके पलकें झुक जाती है
और वो बेरहमी से क़त्ल किये जाता है
मेरी धड़कनो से होकर
दिल तक दस्तक दे जाता है

उसकी आहट से मेरी बेचैनी बढ़ जाती है
दूरियों से जाने क्यों मेरी उम्र घट जाती है

साजना भर ले बाँहों में, जी लूँ जरा
पहले प्यार का जाम , पि लूँ जरा

#
यौवन का पूर्ण श्रृंगार
उसका पहला प्यार
जीवन का आधार
इश्क़ का इजहार

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

सर्वोतम हूँ में

सर्वोतम हूँ में

इस दौड़ में
जानवर हो गया इन्सान
भले बुरे की छोड़ पहचान
हो गया हूँ महान

सर्वोतम हूँ में
इस दौड़ में
दुसरो को नीचा दिखाता गया
खुद का परचम लहराता गया
दिल को बहलाता गया

सर्वोतम हूँ में
इस दौड़ में
नशे में चूर हो गया था मय के
भूल गया था मायने भय के
बस दौड़े जा रहा था

सर्वोतम हूँ में
इस दौड़ में
कुछ अपने थे जो समझाते रहे
मेरे जहन से रुकावट समझ बहते रहे
वो फिर भी अपना कहते रहे


सर्वोतम हूँ में
इस दौड़ में
सर्वोतम हूँ में
इस दौड़ में

सर्वोतम हूँ में
इस दौड़ में

#
सर्वोतम की होड़ में
मंजिल पर अकेला होगा तू
दुनिया छोटी आएगी नजर
कोई बराबरी को नहीं होगा बेशक




सौदागर वो इश्क का

सौदागर है वो इश्क का
किस के हिस्से आएगा
तय करता है अपने पैमाने से

किसी को जिस्म का भूखा बताता है
तो किसी को रूह का शहजादा जताता है
सौदागर है वो इश्क का



बुधवार, 16 सितंबर 2015

बेगानो से अपने अपनों से बेगाने

नन्हें कदमो से चलना सीखा था
की बचपन छीन लिया
अपने और कुछ बेगानो ने

खेत खलिहानों की जगह ले ली
आलीशान मकानों ने
ऐसा छला मुझे अपने और कुछ बेगानो ने

वक़्त की रैना में वो बेगाने भी अपने हो गए
हम कुछ वक़्त के लिए हसीं सपनो में खो गए
लगने लगा है कि वो बेगाने भी अपने हो गए

रास ना आई मेरी खुशिया, अपनों की ही नजर लग गई
इस तरह हुयी विपदा की
जो बेगाने हुए थे अपने
आज फिर बेगानो सा हो गए

जो संजोये थे संग जीने के सपने
वो कहीं अपनों की खुशियो में खो गए
जो बेगाने हुए थे अपने
आज फिर बेगानो सा हो गए

#
क्या खेल जीवन ने है खेला
आगे बढ़ने को नहीं
पीछे हटने को नहीं

तथ्य:- एक दोस्त ने अपने दोस्त की वेदना सुनाई थी कुछ इस तरह ही व्यक्त कर पाया॥ हिम्मत ना हुयी कुछ और लिखने की

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

कुछ तो बात है

कुछ तो बात है
जो आँखों से दिल में उतर गया वो
साँसों में बस
ज़िन्दगी बन गया है वो

कुछ तो बात है
पल भर संग उसके
सादियो सा जी लेता हूँ में
कुछ लम्हों में
उम्र भर की चोट ले लिया करता हूँ मैं

कुछ तो बात है
मेरी तस्वीर
आँखों में लिए फिरता है वो
मेरी हर बात
दिल पर लिए आहें भरता है वो

कुछ तो बात है
लबो पर मेरा नाम आये
तो दुनिया से डरता है वो
मैं खामोश हो जाऊ गर
तो दुनिया से लड़ता है वो

कुछ तो बात है

शनिवार, 5 सितंबर 2015

सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर


सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर
बेदर्दी से दौड़े जा रहा हूँ
ना आज होश है ना कल की खबर

दर्द के सिवा कोई मंजर नहीं
फिर भी बह गया हूँ रसधार में
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर

नाउम्मीदें के आलम में एक उम्मीद जगाये बैठा हूँ
नफ़रत के माहौल में मोहब्बत लौ जगाये बैठा हूँ
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर

तू बेशक मुझे तरह तरह के नाम से बुलाता है
पर मेरा दिल सिर्फ एक ही धुन समझ पाता है
तेरे लिए एक ही राग गुनगुनाता है
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर

बतिया मुझे से तू घडी दो घड़ी
मेरी ज़िन्दगी की टूटे ना लड़ी
तेरे कदमो में मेरी जान है अड़ी
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर

सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर
तेरे दिल को छु जाऊंगा
नफरत के समुन्दर को
मीठे पानी की झील कर जाऊंगा
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर
सवार हो इश्क़ के घोड़ो पर

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ऐसा आया हूँ तेरे जीवन में
तोहफा समझ रब्ब का अपना बना लेना
ना पसंद आये तो बुरा सपना
समझ कर भूल जाना

सोमवार, 24 अगस्त 2015

बेड़िया है मेरे पाँव म बेड़िया है मेरे पाँव मे े

बेड़िया है मेरे पाँव मे बेड़िया है मेरे पाँव मे ं
जो झुलस गया इश्क़ की छाँव मे
खिलने था जहाँ वहां मुरझा गया

बेड़िया है मेरे पाँव मे
बेड़िया है मेरे पाँव मे

हर बाजी हारा हूँ
मोहब्बत के दांव में
मोहरा बन रह गया
शतरंज के प्यादों सा

बेड़िया है मेरे पाँव मे
बेड़िया है मेरे पाँव मे

हर शब्द कर देता है घाव
जो करता इलाज वो मर्ज बन गया
हर लम्हां उनको एक अर्ज बन गया

बेड़िया है मेरे पाँव मैं बेड़िया है मेरे पाँव मे

उसको देखा जब से, मिट गए सब चाव
भूख प्यास सब एक हो गए उसकी आस में
नफ़रत भी भूल गया मोहब्बत की तलाश में
बेड़िया है मेरे पाँव मे
बेड़िया है मेरे पाँव मे

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वजह बेशक तू है हर दर्द की
आराम भी रूह को तेरी झलक से आता है
मैं आज भी उसकी आह भरता हूँ
वो बेशक मुझे बेवफा बुलाता है

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

उलझन भरी ज़िन्दगी

कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

मकसद नहीं
कोई इसका
फिर भी उलझाती है
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

बेमतलब का तमाशा
कभी आशा
कभी निराशा
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

कोई खींच लेता है
ख्वाहिशों को दबाकर
थोपी जाती है
उनकी मेहरबानियां
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

कोई सब कुछ लूटा देता है
कोई सब लूट ले जाता है
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

किसी ने सजदा किया
तो किसी ने किया रुस्वा
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

बर्दाश्त नहीं किसी को आह भी
कोई उम्र भर की चोट से उफ़ नहीं करता
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

किसी ने मतलब से अपनों को खो दिया
कोई बेमतलब गैरो को अपना बना गया
कभी मुस्कराती
कभी रुलाती
उलझन भरी ज़िन्दगी

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ज़िन्दगी की उलझनें हो जाएँगी कम
गर दिल से लगाना
और किसी को समझाना छोड़ दें

बुधवार, 12 अगस्त 2015

गीत :- ज़िंदा हूँ मैं जिंदा हूँ मैं

ज़िंदा हूँ मैं
जिंदा हूँ मैं

अभी मोहब्बत जो बाकि है
मेरे दिल को धड़काती है
कहीं से है थोडा गुदगुदाती
कभी कभी है थोड़ा रुलाती

ज़िंदा हूँ मैं
जिंदा हूँ मैं
इतना तो है ये बताती
मुझको है राह दिखाती

नफरत तो सिर्फ इंसान को जलाती
मोहब्बत ही है जो ख़्वाबो को सजाती
दो दिलों के रंग रूप धर्म के भेद छुपाती
बस मोहब्बत ही मोहब्बत जो दिल को महकाती

ज़िंदा हूँ मैं
जिंदा हूँ मैं
इतना तो है ये बताती
मुझको है राह दिखाती

कुछ अठखेलियाँ वो मुझको दिखाती
कुछ मेरी नजरें उसको है जताती
वो शर्मा कर, कुछ है छुपाती
पर मोहब्बत से नहीं है बच पाती

ज़िंदा हूँ मैं
जिंदा हूँ मैं
इतना तो है ये बताती
मुझको है राह दिखाती

हर पल उसकी साँसे है घबराती
कभी पुछु तो कुछ बहक सी जाती
दिल की आग वो लब पर नहीं लाती
बस एक झूठी मुस्कान बिखेर जाती

ज़िंदा हूँ मैं
जिंदा हूँ मैं
इतना तो है ये बताती
मुझको है राह दिखाती

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एक मोहब्बत ने ही मुझे इंसान बनाया है
नहीं तो हर रहगुज़र ने नफरत से ही मिलाया है
बस दुआ है रब्ब से मोहब्बत के जाम ही लुटाना
नहीं तो नफ़रत से जला देगा ये जालिम जमाना

रविवार, 9 अगस्त 2015

क्यों आदत हो गई .......

क्यों आदत हो गई
मुझे तड़पाने की
बात बात पर रूठ जाने की

संजोता हूँ सपने तेरे संग
वक़्त बिताने के
तू ढूंढता है बहाने
मुझ से दूर जाने के
क्यों आदत हो गई .......

बेशक ये रिश्ता मेने बनाया है
दिल ने तेरे भी हामी भरी होगी
बेशक हमारी राहें जुदा होंगी
फिर भी ज़िंदा मोहब्बत होगी
क्यों आदत हो गई .......

गुजारिश है तुझ से इतनी मेरी
चाहे मुझसे मीलों दूर चले जाना
पर रिश्ता है जो, अंतिम सांस तक निभाना
किसी भी वहम को मध्य ना लाना
क्यों आदत हो गई .......

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मैं कुछ भी कह जाता हूँ बेचैनी में
गर तुझे है चैन मेरे दोस्त
मेरी बेचैनी ने जो किया है सवाल
उसका हल भी ढूंढ लाना



कड़वे शब्द बोलता हूँ