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मंगलवार, 4 सितंबर 2018

शिक्षक

शिक्षक

मेरे लिए उस दिए के समान है जो aghyanta के अंधकार में शिक्षा रूपी रोशनी से सृजन करता है।

शिक्षक

मेरे लिए उस कुम्हार के सामान है जो मुझ माटी को एक आकार में ढालकर, समाज में दिशा और दशा प्रदान करता है।

शिक्षक

मेरे लिए वो रास्ता है जो मेरे जीवन को मंजिल तक पहुँचाता है

शिक्षक

और क्या कहूँ
शिक्षक ही वो स्तम्भ है जिसपर मुझे रचने का भार है, शिक्षक ही मेरे जीवन का सार्थक आधार है

बुधवार, 11 जुलाई 2018

माँ के दिल से

प्रिय हो तुम,
मेरे श्वास से भी ज्यादा
#कड़वाशब्द
माँ शब्द ....माना कि सँसार है
पर शिशु ही ममता का आधार है
#कड़वाशब्द
तेरी अठखेलियों से खिलती हूँ,
तुझ से ही, मैं खुद से मिलती हूँ
#कड़वाशब्द
शिकन तेरी, मेरी बेचैनी बढ़ाती है
माँ की मुस्कान, तेरी हँसी से लौट आती है
#कड़वाशब्द
रोज तेरी नई लीला, माँ का आनंद बन जाती है
शिशु की किलकारी, माँ के आंगन की बाती है
#कड़वाशब्द
ममता के चिराग में, रोशनी भर भर आती है
जब माँ की गोद एक नन्हें फूल से महक जाती है
#कड़वाशब्द
माँ की बात आज तुम्हें एक माँ ही सुनाती है
ममता रूपी दिए कि शिशु से अलख जग पाती है
#कड़वाशब्द
तुम बिन हर शब्द ममता का अधूरा है
मेरे शिशु से ही मेरा परिवार भरा पूरा है
#कड़वाशब्द
तो माँ की ममता के बखान में याद रखना जरूर
हर माँ के लिए उसका शिशु होता है उसका ग़ुरूर
#कड़वाशब्द
तेरे माथे को चूम कर जो सकूँ मिल जाता है
वो एहसास ही मुझे, माँ होने का हक़ दिलाता है

एक माँ की कहानी ....उसकी जुबानी

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

महिला सशक्तिकरण

चारों तऱफ बात तो सब करते है महिलाओं के सशक्तिकरण की, पर करते क्या है? सुरक्षा के नाम पर चंद दीवारें और महिलाओं के लिए खड़ी कर देते है। तुम्हें ये नहीं करना, वो नहीं करना इत्यादि बन्धनों में बांध दिया जाता है।
महिला सशक्तिकरण? महिलाओं को इतना सक्षम बनाना कि उनकी निर्भरता चाहे वो आर्थिक हो या सामाजिक किसी अन्य व्यक्ति विशेष पर न निर्भर हो। उसके आत्मविश्वास को इतना सृदृढ़ बनाना कि उसे किसी भी कार्य को करने में अक्षमता का अनुभव न हो।

पर हम लोग सशक्तिकरण के नाम पर करते क्या है,
कॉलेज के बाहर लड़कियों को लड़के छेड़ते है, वहां पुलिस लगा दो
दफ़्तर में महिलाओं को शोषण होता है, वहाँ भी किसी कमेटी का गठन कर दीजिए।
बेटी को स्कूल जाना है तो बड़े भाई व अन्य को कवच बना जिम्मेदारी उसे सौंप दी।
शादी कर रहे है तो बेटी को अगले घर परेशानी न हो, तो दहेज के बड़ा सा टोकरा लाद दिया।

इन बैसाखियों के सहारे दे दिए ताकि वह अपना जीवन सुखद बना सके। क्या ये ही है महिला सशक्तिकरण।
कल कोई बैसाखी नहीं हुई तो वह महिला फिर स्वयं को असहाय महसूस करें।
सहारा चाहे पुरुष हो या औरत उसे केवल कमज़ोर बनाता है सशक्त नहीं। आपका पुत्र क्यों सशक्त बनता है क्योंकि बचपन से उसके जहन एक ही बात डालते हो ये तो लड़का है कर लेगा बस वह फूक जिंदगी भर उसे उड़ाए रखती है और उस लड़की जिसे कहते है ये तो लड़की है उसको सोने के पिंजरे में कैद कर देते है। कोमलता के नाम पर उसे परिवार की सबसे कमजोर कड़ी बना दिया जाता है। जिसने सही बात कर दी तो उसका मुँह चंद खोखली मिसालों से बन्द कर देंगे कि नारी तो मजबूत है जो बच्चों को जन्म देती है सर परिवार संभालती है इत्यादि बड़ी बड़ी बातों से उसके वजूद को, भावनात्मक परत से ढक दिया जाता है।

महिलाओं को अगर सक्षम बनाना है तो वास्तविकता में बचपन से उनके साथ वही व्यवहार करना होगा जो एक पुरुष के साथ होता है कोई भी ऐसा विन्रम व्यवहार कि वो लड़की है नहीं कर सकती उसके अंदर हीनता को जन्म देना है। अगर परिवार का पुरुष ही उसका सरंक्षक होता तो महिलाओं पर अत्याचार के ज्यादातर मामले में पुरुष परिवार से या रिश्तेदार नहीं होता।

कानून का फायदा भी वो तब उठा सकती है जब उसमें पुरुष के विरुद्ध जाने कि आत्म शक्ति का एहसास होगा।

मेरी उक्त बातें सब निर्रथक है अगर अब भी आप लड़की या महिला को मजबूत बनाने की बजाए उसे सरंक्षण की बैसाखी देना चाहते है। भगवान द्वारा ऐसी कोई कमज़ोरी नहीं दी गई कि महिला पुरुष की ताकत का मुकाबला नहीं कर सकतीं। समाज में अनेक ऐसे उदारहण है जा महिलाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया उसका मुख्य कारण उनकों बढ़ने के लिए सामान अवसर प्रदान करना था।

औरत को सम्मान के साथ होंसला दीजिए, सहारे की बैसाखी कमज़ोर बनाती है इंसान को असली पहचान उसकी समाज में लड़ने की हैसियत दिलाती है।

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

जन्मदिन की शुभकामनाएं

आपके ज़िन्दगी का नया पन्ना,
जो शुरू हुआ, आज नई भोर से

मेरी और से, आपको शुभकामनाएं
जीवन में नई दिशा और ऊर्जा आये

क़ामयाबी कदम चूमें, रिशतें साथ निभाए
रुकावटों के हल मिलें, रास्ते सुगम हो जाए

बरसों के आपके अनुभव में, नए हुनर आयें
नवसृजन व रचनात्मक सोच कीर्तिमान बनाए

होंठों की मुस्कान को उदासी छू भी न पाए
बढ़ते पल, बढ़ते लम्हें, बढ़ते दिवस और बढ़ते साल
शौर्य चढ़कर बोले, बनो दुनियां में एक नई मिसाल

# जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

#सुदामा के चावल की भांति, मेरी पंक्तियों को ही समझना भेंट, आपके लिए हजार अधीनस्थ कर्मचारियों
सा हूँ मैं, पर मेरे लिए चिन्हित गौरवमय अधिकारियों में से हो आप, ईश्वर सदैव आपका गौरव बनाए रखे।

गुरुवार, 15 जून 2017

ODF➕

ODF ➕ है क्या?

खुलें में शौच मुक्त होने के पश्चात गाँव में स्वच्छता के अगले चरण की और बढ़ना ही odf प्लस है। जिसके दौरान मुख्यतः पांच तत्वों पर कार्य किया जाता है
1. खुलें में शौच मुक्त की निरंतरता
2. ठोस कचरा प्रबंधन
3. तरल कचरा प्रबंधन
4. ग्राम स्वच्छता:- साफ सफाई
5. व्यक्तिगत स्वच्छता

1. खुलें में शौच मुक्त की निरंतरता बनाये रखना प्रमुख चुनौती है क्योंकि खुलें में शौच मुक्त एक अभियान से हुआ जा सकता है लेकिन बरसों के खुलें में शौच जाने की आदत में परिवर्तन लाने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक है, जिसके लिए निगरानी समिति के सदस्यों का इस तरह से प्रबंधन किया जा सके कि दैनिक निगरानी हो सके। उदारहणतय अगर आपके पास निगरानी समिति में 50 सदस्य है तो रोज केवल 10 सदस्य निगरानी करें ताकि 5 स्थानों पर 2-2 व्यक्ति पहरा दे ताकि हर किसी को 5 दिन पश्चात पहरा देना पड़े जिस से निगरानी निर्बाधित चलती रहे।

2. ठोस कचरा प्रबंधन विस्तृत रूप से देखा जाए तो इसमें गलनशील व अगलनशील कचरे के दो प्रकार होते है। गलनशील में रसोई के अपशिष्ट पदार्थ, मवेशियों के चारा व गोबर इत्यादि आते है जिनका गांव में लोगो द्वारा प्रबंधन तो कर लिया जाता है मगर उनकी तकनीक में सुधार की आवश्यकता होती है
जैसे गांव में पुराने समय से गोबर की खाद के गड्ढे होते है, लेकिन उन गड्ढो में निरंतर गोबर डालते हुए उनको बेसिक बातें बता दी जाए कि समय पर मिट्टी व पत्तो की परतें बनाई जा सके जिससे बढ़िया कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकें।

अगलनशील में दोबारा इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं तो आमतौर पर ग्रामीण कबाड़ी को बेच देते है मगर पॉलीथिन, टेट्रा पैक इत्यादि कचरा जिसके निपटान का कोई स्थायी समाधान नही है एक गंभीर समस्या है, इसका वजन के हिसाब से उत्पादन प्रति घर साप्ताहिक 100 ग्राम भी नही होता, हाँ अगर हम इसका प्रयोग कलात्मक वस्तुएं बनाने के लिए कर सकते है जिनका ज्ञान स्वयं सहायता समूह प्रशिक्षण देकर, ग्राम स्तर पर सुगमकर्ता तैयार किये जा सकते है।

इसी कड़ी में स्वच्छता प्रेरक को वर्मी कम्पोस्ट व बायोगैस का इतना ज्ञान नही होता तो संवंधित कृषि सहायक को भी योजना के साथ जोड़ा जा सकता है ताकि लोगो को सटीक जानकारी दी जा सके।

3. तरल कचरा प्रबंधन एक ऐसी समस्या है जो आधुनिकरण के नाम पर संसाधनों का दिशा निर्देश की कमी में इस्तेमाल के कारण उत्पन्न हुई है। इसमें चाहे सेप्टिक टैंक वाले शौचालय का प्रयोग ले लीजिए, चाहे पानी के लिए सबमर्सिबल का प्रयोग व नालियों के निर्माण में इंजीनियर विंग का ध्यान न देना। इस समस्या को दूर करने के लिए लोगो के व्यवहार परिवर्तन के लिए व्यापक अभियान की आवश्यकता है, चाहे वो पोस्टर, रेडियो, पेंटिंग, घर घर जाकर इत्यादि सप्रेषण के माध्यमो से लोगो के मानसिक पटल पर चित्र अंकित करना। ताकि वह घरेलू स्तर पर सोखता गड्ढा बनाकर व रसोई के दूषित पानी को पेड़ पौधों में इस्तेमाल करके, वाश बेसिन के इस्तेमाल पानी का कनेक्शन टॉयलेट के फ्लश के साथ करके आंशिक सुधार किए जा सकते है।

4. ग्रामीण स्वच्छता:- बढ़ती जनसंख्या के कारण, जगह की कमी के कारण सार्वजनिक स्थलों पर ग्रामीणों द्वारा निजी कचरा व गोबर डालने से गांव की सुंदरता पर ग्रहण लग गया है, जगह जगह गलियों में पशुओं की खोर बना, पशु बांधने से भी समस्या गंभीर बनी हुई है, इसका समाधान समुदाय को ट्रिगर करके ही किया जा सकता है क्योंकि राजनीति करण की वजह से स्थानीय पंच व सरपंच इन विषयों पर गंभीरता नही दिखाते है। इसके लिए सामुदायिक स्वभाविक नेताओ की मदद ली जा सकती है। नालियों को ढकने के पश्चात उनके ऊपर सौंदर्यकरण को बढ़ावा देने के लिए फूल पौधे लगाए जा सकते है।

5. व्यक्तिगत स्वच्छता:- आमतौर पर सभी व्यक्ति गत स्वच्छता के प्रति जागरूक होते है, लेकिन फिर भी स्कूल में सेमिनार करके बच्चों को जागरूक करने से उनमें बचपन से व्यक्तिगत स्वच्छता को व्यवहार में लाया जा सकता है, क्योंकि बच्चें परिवार में बदलाव के कारण बन सकते है। इसमें साथ आंगनवाड़ी वर्करों, आशा वर्कर द्वारा घर घर जाकर महिलाओ को भी खाना बनाने व खाने से पहले, शौच पश्चात हाथ धोने की आदत में शामिल करने के लिए जागरूक किया जा सकता है।
उपरोक्त सभी कार्यों को आकार देने के लिए, एक दृढ़ इच्छाशक्ति व निर्देशन की आवश्यकता है, क्योंकि कोई भी योजना विफ़लता का कारण निर्देशन में ढील भी पाया जाता है, योजना के प्रारम्भ में जो दिशा निर्देश अधिकारी द्वारा दिये जाते है उनमें धीरे धीरे हो जाएगा जैसे विचारों से योजना के पूर्णतः सफल होने पर ग्रहण लग जाता है, इसके अतिरिक्त अन्य कारण गांव स्तर पर डेटा को अच्छी तरह से इकठा न करना भी मुख्य कारण है, हम प्रायः देखते है कि आंकड़ो को एक छत के नीचे बैठकर भर दिया जाता है जिससे बुनियादी सुधारों को छोड़ दिया जाता है। जबकि बुनियादी सुधारों के बिना कोई सफलता प्राप्त नही की जा सकती जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण शहर है, वहाँ सरकार द्वारा सभी सुविधाओं के बावजूद स्थिति दयनीय होती है।

उपरोक्त ज्ञान मेरे विवेकानुसार है जिसमें त्रुटि की संभावनाएं है मगर सुधार की गुंजाइश निरंतर रहती है, यही प्रकृति का नियम भी है, बस हम ये भूल जाते है सुधार के वक़्त उस प्रकृति को ही भूल जाते है, दूरदर्शिता का अभाव नजर आता है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

साम्राज्य का दुष्चक्र

गत कुछ दिनों से में कार्यालय की ग्राम सचिव के समूह स्तर की बैठकों में भाग ले रहा हूँ, जिन अपेक्षाओं से मैंने इन मीटिंग में भाग लिया था उनसे विपरीत अधिकारी का आचरण देखने को मिला। मानता हूँ कि हो सकता है कि मेरी सूझबूझ का स्तर उतना न हो, लेक़िन मेरी समझ अनुसार इन बैठकों का नतीजा शून्य है, जैसे कोई खानापूर्ति के लिए कार्य किया जा रहा हो। जैसे दिखावा करने को की मेने तो अपनी जिम्मेदारी निभा दी दूसरों ने नही किया तो मेरा क्या दोष। क्या इतनी सार्थकता काफी है। केजरीवाल जैसा आचरण है ये तो? जितना हम दूसरों से कार्य की अपेक्षा रखते है अगर स्वयम को उसी तराजू में रखें तो शायद हम कुछ जान पाए। अधिकारियों के पिछले 3 वर्ष में 3 अधिकारी और 3 ही रूप दिखे। प्रथम अधिकारी तो जगजाहिर था, जैसा कहते है सब नेता चोर है पर मेरा काम करदे मुझे उससे क्या। द्वितीय अधिकारी ऐसा की जिसके लिए नौकरी एक सरकारी अध्यापक की तरह थी, जो हो रहा है ऐसे ही होगा मेरा वेतन मिल रहा है मेरा घर चल रहा है वो काफी है। और तीसरे अधिकारी की शिक्षा और दीक्षा देखकर लगा था कि ये अधिकारी तो कुछ जुनून रखता है जमीनी स्तर पर कार्य करने का, मगर आशाओं पर उस वक़्त पानी फिर गया जब मैंने उनकी अखबारों में चमकने की भूख, ग्राम विकास की पीड़ा को अनुभव करने से ज्यादा थी। मैं सहमत हूँ कि समाज स्वयम का दुश्मन बना हुआ है वो निज हित के कारण सामूहिक विषयों को दरकिनार कर देता है। लेकिन इतना आसान होता सत्य का रास्ता तो हर कोई मसीहा या फरिश्ता न होता। संसार नही बदल रहा तो मैं ही बदल गया, इस धारणा का दुष्परिणाम तब देखने को मिलेगा जब आने वाली नस्लें चैन की जिंदगी के लिए जमीन तलाशेगी और सिवा कचरे के और कुछ नही होगा, मेरा शक अधिकारी की क्षमता पर नही और न ही मैं उनकी विवेचना करने की क्षमता रखता हूँ, मैं स्वयं की पीड़ा व्यक्त कर रहा हूँ, क्योंकि इतनी शिक्षा और नयेपन का अधिकारी बहुत कम देखने को मिलेगा और जब वो ही अधिकारी नही काम करेगा तो तकलीफ़ होना जायज है, स्वयम की बात करूं तो फिर सब कहेंगे अहम हो गया, मैं अपनी निर्धारित कार्य को कभी रुकने नही देता और सही कार्य को अधिकारियों से करवा भी लेता हूँ। मुझे तक़लीफ़ इतनी सी बात देती है जब मुझे दुसरो की तुलना करके नीचा दिखाया जाता है, एक विषय पर जब आप मेरी तुलना उनसे करते है क्या अन्य विषय जिनमें मेरी दक्षता है उनकी तुलना की, नही कभी नही। क्योंकि वो विषय तो आपकी पसंद ही नही।

और कुछ बातें सीने में इसलिए दफन कर लेता हूँ क्योंकि समाज का हर बात को लेने का संदर्भ अलग होता है । जब कभी आप किसी का सम्मान करने का नाम करते हो और फिर पलट जाते हो तो क्या उसका अपमान नही हो जाता। और ऐसा एक बार नही बहुत बार हुआ, कभी रिवॉर्ड के नाम लैपटॉप की मीठी गोली, कभी स्वतंत्र दिवस पर सम्मानित करवाने के सपने, यहां इस बात से ये भी प्रश्न उठता है कि जब अधिकारी अपने क्षेत्र का कार्य सम्पन्न नही कर पाता और कर्मचारी से उसकी तय चुनोतियों से अलग कार्य की अपेक्षा रखता है और पूरा न होने पर उसे बैठकों में अपमानित करता है। हालांकि मेने अधिकारी को भी उनके उच्च अधिकारियों के समक्ष बेबस पाया है और ये ही सोचकर मैं स्वयम को तसल्ली देकर अपने कार्य को पूरी मेहनत से पूर्ण करने की कोशिश करता हूँ।
__________________________________________

आज बाहुबली 2 मूवी देखी उसमें कुछ सार समाज की समझ बतलाता है जब आपके मन कपट नही होता तो कपटी व्यक्ति आप का शोषण इस तरह से करेगा आप सोच नही सकते यही जीवन में घटित होता है सदा, जहां आप सहकर्मियों पर भरोसा करते है वहीं सहकर्मी निज हित के लिए आप को मूर्ख साबित करते है, जबकि वो ये भूल जाते है कि जो व्यक्ति उनके स्नेह में एक बार मूर्ख बनकर उन्हें फायदा देता है जीवन भर के दोस्ती में कितना अनमोल होता। और थोड़े लालच में वो बड़ा नुकसान कर देते है। वो मूर्ख मित्र तो मन से प्रसन्न जीवन आनंदपूर्वक जी लेगा क्योंकि उसके मन मैल नही। छल करने वाला सदा छल की दलदल में ही रहता है डर के साये में सदा।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

ग़जल:- हर जर्रे की बात कहूँ तो......

हर जर्रे की बात कहूँ तो
यहाँ पर सब बिकता है
लहू और आंसुओ का
सैलाब भी बिकता तो है

हर जर्रे की बात कहूँ तो......

महकते हुए गुलाबों का
अर्क भी बिकता तो है
सुर्ख होंठो से हँसी का
सैलाब भी रुकता तो है

हर जर्रे की बात कहूँ तो......

हुस्न के बाजारों में
जज़्बात कहाँ टिकता है
हरी गली मोहल्ले में जिस्म तो है
ख़रीददार भी तो दिखता है

हर जर्रे की बात कहूँ तो......

ग़रीबी के चादर पर मेहनत का सौदा तो है
अमीरी के शौक़ पर, पसीना भी बहता तो है
चंद सिक्कों के लिए इंसान बिकता भी तो है

हर जर्रे की बात कहूँ तो......

क़िस्मत का भरोसा करे भी तो क्या
भाग्य में लिखा जो वो मिटता भी तो है
बस चलते रहो अँधेरी राहों पर
कभी कभी उजाला दिखता भी तो है

हर जर्रे की बात कहूँ तो
यहाँ पर सब बिकता है
लहू और आंसुओ का
सैलाब भी बिकता तो है

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

मेहनत का जनाजा

आज दफ्तर में कार्य करते हुए तीन साल बीत गए और जब आज नया अनुबंध सिर्फ 6 माह के लिए बढ़ाया तो मनोबल को गहरा आघात पहुँचा। कार्य के प्रति अपना शत प्रतिशत देने के बावजूद जब ....….....।

मैं मानता हूँ कि जब भी कोई नया अधिकारी आता है उसकी कार्यशैली को समझने में वक़्त लगता है। उस वक़्त डाँट से भी इतना फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप की कार्य दक्षता का उनको और उनकी कार्यशैली का आपको पता नहीं होता। एक अनुबंध कर्मचारी का पहले ही आर्थिक शोषण होता है उसके बावजूद समय पर वेतन व् एक वर्ष तक अनुबंध बढ़ने का सकूँ होता है निश्चिन्त होकर कार्य कर सकते है। आज वो भी छीन जाने से एक भी कार्य करने का मन नहीं हुआ। जाने अगले अनुबंध से पहले नया अधिकारी आ जाये और फिर अनिश्चिताओं का दौर शुरू हो जायेगा। पहले वर्ष पश्चात् ये भय सामने होता था अब हर 6 माह बाद होगा। बेहतर कार्य करने के उपरांत भय में जीना पड़ता है। जबकि सारी शक्तियां अधिकारी के पास होती है वो चाहे तो अगले दिन ही घर भेज दें फिर भी जाने क्यों अनुबंध की तलवार से डराया जाता है।

फिर आपके पास वो अधिकार भी नहीं कि आप अपनी बात कह सके। यह अत्यंत दुःखद व् पीड़ादायक है।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

ए दिल है मुश्किल

ख्वाहिशों की बिसात
मुझे उसकी
उसे किसकी
किसको जाने किसकी
ए दिल है मुश्किल

मिला सकूँ नही
ना मुझे
ना उसको
ना किसी को
ए दिल है मुश्क़िल

दोस्ती थी
या प्यार
वफ़ा थी कि
बेवफा यार
ए दिल है मुश्क़िल

हर कोई था चाह में
किसी की परवाह में
खो गया था इश्क़ की राह में
ए दिल है मुश्क़िल

#
एक तरफ़ की
इबादत हो या मोहब्बत
ख़ुदा से हो खुदा नहीं
महबूबा से हो महबूबा नहीं
बस है तो दिल ए मुश्क़िल

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

मुश्किलों से लिखी मेरी कहानी:- किसी मुश्किल से

कदम चलती हूँ
लड़खड़ा जाती हूँ
किसी मुश्किल से

बहुत संजोया हर रिशतें को
हर किरदार बखूबी निभाया
दो पल हुई न खुशियां
कि घिर गई
किसी मुश्किल से

टूटती रहती हूँ
फिर भी मुस्कराती हूँ
बेबसी के लम्हों से
खुद को छुपाती हूँ
ये सोच की खो न जाऊ
किसी मुश्किल से

आजमाइश करती रही ज़िन्दगी
मैं नुमाइश बन रह गई ताउम्र
गाँठती रही डोर फिर टूट गई
किसी मुश्किल से

#
मुश्किलों से लिखी मेरी कहानी
अब खुशियों से आँसू आ जाते है
हम गम तो बर्दाश्त कर लेते है
खुशियों से घबरा जाते है।।

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

स्वार्थी मानव मन

जीवन जीना सृष्टि की महत्वपूर्ण व् प्राथमिक कला है। जीने को सभी जीवन जी रहे है, पर मैने इतना महसूस किया कि अक्सर हम अपनी इच्छाओँ की पूर्ति ना होने पर इतने क्रोधित अथार्थ स्वयं में समाहित हो जाते है। निज हित के चलते हम विवेकहीन हो जाते है। जीवन के रस में क्रोध व् कुंठा रूपी जहर घोल देते है। ऐसे वक़्त पर समान्यता यह भी देखा गया है कि हम समाज से अलग पड़ जाते है। इस समय से गुजरना पीड़ादायक होता है एक तो आपको इच्छाओं की पूरा ना होने की पीड़ा ऊपर से समाज का आप के प्रति रवैया, इन सबसे निकलने का एकमात्र उपाय चिंतन है जोकि विभिन्न पहलुओं पर होना चाहिए क्योंकि निज हित में तो हम चिन्तन कर ही रहे थे पर हम ने उन पहलुओं पर विचार नहीं किया जो अन्य के हितों से जुड़े थे।
उदाहरणतयः एक बालक जिद्द करता है तो उसकी समझ केवल उस जिद्द को पूरा करने के सिवा उस से होने वाले परिणामो पर नहीं होती। वो चिंगारी की तरफ भी आकर्षित हो उसे पकड़ने की कोशिश करेगा और उसे उस पीड़ा को अनुभव नहीं होता जो चिंगारी उसे दे सकती है।
ख़ुद के जीवन को हम बिना समाज के प्रभाव नहीं जी सकते क्योंकि उत्तपत्ति का आधार समाज है। वैसे जीवन में कभी गौर किया कि हम जहाँ भी चले जाए नई जगह हम दोस्त क्यों बना लेते है। गौर कीजिए और चिंतन जीवन का सार्थक मन्त्र मिल जायेगा।।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

रिश्तों की गुलामी या आजादी

महत्वकांशी होता है मनुष्य बढ़ा जब उसे अपनी इच्छाओं  की पूर्ति होते दिखाई नहीं देती तो उसे रिश्तों में घुटन अथार्थ आजादी का सवाल खड़ा हो जाता है उसके जहन में

मेरी भी ज़िन्दगी है जैसे कई सवाल उसे जकड लेते है। इस क्रिया को दोहराते हुए वो पुराने रिश्तों जिन्हें गुलामी समझ बैठता है उन्हें छोड़ फिर नए रिश्तों की गुलामी में चला जाता है। वो ये भूल कर बैठता है कि रिश्ता गुलामी नहीं उसकी जरुरत है। क्योंकि मानव अकेले रह नहीं सकता कुदरत ने उसकी सरंचना इस तरह की बनाई की उसे दूसरे मानव के बिना रहना असंभव है बेशक वो रिश्ता माँ बाप । भाई बहन। पति पत्नी। अथवा कोई दोस्त हो। दुसरो से हम जो अपेक्षा करते है वो ही गलतिया खुद के जीवन में दोहरा लेते है। मनुष्य के मन की अवस्था बहुत ही अधिक चंचल होती है वो ना चाहते हुए भी उन राहों को चुनता है जिन्हें उसका मस्तिष्क तो जवाब दे रहा होता है पर चंचल मन ले जाता है। फिर जब दोष की बात आती है तो मन पल्ला झाड़ मस्तिष्क के ऊपर ठीकरा फूट जाता है। क्या तुम्हें समझ नही थे जैसे सवाल उसकी बौद्धिक क्षमता को सवालिया निशान लगा दिए जाते है।
हम गुलाम इस शरीर और चंचल मन के है ये मन कभी भी हमारी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है। वास्तविकता को जानते हुए भी अवास्तविक संसार की कल्पना कर जीना चाहता है।
उदारहणतय देश आजाद हुआ 1947 में अंग्रेजो से तो आज यहाँ के लोगो को खुद के सविंधान से गुलामी नजर आने लगी कभी आरक्षण की आग तो कभी गरीबी की आग गुलाम होने का एहसास दिला जाती है। न्याय न मिलने पर कहीं आपराधिक बोध से त्रस्त विचारो की लहर आंदोलन बन जाती है। मेरे कहने का सिर्फ इतना मतलब है कि विसंगतिया हर ढांचे में होती है। बशर्ते दूर जाने की हमें उन विसंगतियों से जूझने की कोशिश करनी चाहिए।

#मैंने ईश्वर से भी आजतक ये ही माँगा

हे ईश्वर मुझे सद्बुद्धि दीजिये अन्य किसी भी वस्तु का लोभ निरर्थक है।।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

ज़िन्दगी के रंग

समाज के सम्मान का तमगा था जिसके पास
उसे अन्धकार से दिखा कर रौशनी की आस

फिर धकेल दिया पहले से भी गहरे अन्धकार में
उसी सम्मान के नाम मुझे कर शहर में बदनाम
खुद का दामन छुड़ा गये, रूह मेरी रुला गये

समझ नहीं पाया, क्यों मुझे वो रास्ता क्यों दिखाया
शायद वो ही अपने कायदों को मुझ पर थोप गया
मुझे दुविधा की आग में तनहा ही झोंक गया

शुक्र है फिर भी , साँसों को कुछ पल ही रोक गया
ज़िन्दगी थी दांव पर, मुझे कम से कम ज़िंदा छोड़ गया

#
रिश्तों से खेलना छोड़ दे जिंदगी
मेने छोड़ दी तो ना रिश्ते होंगे ना तुम

बुधवार, 22 जून 2016

दो उदास दिल

उदास था मन
और ख़ाली भी था
जीवन भी बेरंग था
और लम्हें भी उदास

फिर

एक और खाली मन मिला
दोनों के खालीपन को
कोई नया जीवन मिला
जी उठा वो हर उदास लम्हा

मन चंचल भी खिल उठा
साँसों को धड़कनें की वजह मिली
आँखें भी उनके नूर से खिली
तक़दीर भी आज ज़िन्दगी से मिली

#
जी कर वो लम्हा कोई भी उदास ना था
मन को ऐसी ख़ुशी मिलेगी विश्वास ना था
सकूँ के इन लम्हों को सहेजना तुम भी
अक्सर मीठी यादें ही जीवन को खूबसूरत बनाती है

कड़वे शब्द बोलता हूँ