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शनिवार, 3 सितंबर 2016

खुलें में शौच मुक्त बनाना है

ना ख़ुद खाना है
ना औरो को खिलाना है
बस सोच है ये
अब हमारी
गाँव को
खुले में शौच मुक्त बनाना है

शौच से फ़ैलने वाले रोगों को
जड़ से ही मिटाना है
नन्हें बाल रूपी फूलो को
मुरझाने से बचाना है
मुझे अपने गाँव में
स्वच्छता का पौधा लगाना है
खुले में शौच मुक्त बनाना है

दादा और दादी
चाचा और चाची
माँ और पिता
भैया और बहना
सबको है समझाना
मुझे अपने गाँव के
इस कोढ़ को है मिटाना
खुले में शौच मुक्त बनाना है

#
मानसिकता बदलने की जरुरत है
मेरे गाँव की भी तस्वीर खूबसूरत है
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मंगलवार, 17 मई 2016

शब्दों के आंसू

पत्थर से भी वजनदार हो गया
उसके जीवन में मेरा किरदार

अब मेरी हर कहानी उसके लिए
सिर्फ एक लफ़्ज भर हो गई है

कुछ ओह आह की दाद दिया करता है
मेरी हर बात पे इरशाद किया करता है

मायने नहीं उसको मेरी कविताओं के
एक भूली बिसरी याद समझ भुला देता है

मेरी बातें दिल से ना लगे, इसलिए रो देता है
जितनी भी आरजू करूँ, आंसुओ से धो देता है

जब हूँ ही नहीं, उसके जीवन का किरदार
फिर क्यों तानों से जख़्म दिया करता है

जब भी कोशिश करता हूँ आगे बढ़ने की
फिर उस दोराहे पर, ला दिया करता है

कुछ दर्द बांटने की थी जिस से ख्वाहिश
वो ही आंसुओ में डुबो दिया करता है

कमजोर दिल/जिगर भी क्या चीज है
समझने को तो सबके लिए अजीज है

पर ये भी इस समाज की ही तमीज़ है
व्यवहारिक दुनिया में हम सिर्फ नाचीज है

बुधवार, 16 सितंबर 2015

बेगानो से अपने अपनों से बेगाने

नन्हें कदमो से चलना सीखा था
की बचपन छीन लिया
अपने और कुछ बेगानो ने

खेत खलिहानों की जगह ले ली
आलीशान मकानों ने
ऐसा छला मुझे अपने और कुछ बेगानो ने

वक़्त की रैना में वो बेगाने भी अपने हो गए
हम कुछ वक़्त के लिए हसीं सपनो में खो गए
लगने लगा है कि वो बेगाने भी अपने हो गए

रास ना आई मेरी खुशिया, अपनों की ही नजर लग गई
इस तरह हुयी विपदा की
जो बेगाने हुए थे अपने
आज फिर बेगानो सा हो गए

जो संजोये थे संग जीने के सपने
वो कहीं अपनों की खुशियो में खो गए
जो बेगाने हुए थे अपने
आज फिर बेगानो सा हो गए

#
क्या खेल जीवन ने है खेला
आगे बढ़ने को नहीं
पीछे हटने को नहीं

तथ्य:- एक दोस्त ने अपने दोस्त की वेदना सुनाई थी कुछ इस तरह ही व्यक्त कर पाया॥ हिम्मत ना हुयी कुछ और लिखने की

शनिवार, 30 मई 2015

दंगो का अभिशाप

कोई दर्द आज भी सीने में सुलग जाता है
दहक उठती है बुझे हुए शोलो में आग

कैसे दमन हुआ उन चिरागों का
जिनका रोशन होना था अभी बाक़ी

लूट गयी अस्मत उन दामनो की
जिनकी किलकारियां गूंजती आँगन में
उन घरो में सन्नाटा छा गया

जिन पनघटों पर लगते थे जमावड़े
आज कोई वहां लहू बहा गया
बरसो की बेपरवाह दोस्ती को
एक शक/अहम् का कीड़ा खा गया

भेद ना जाने था जो नन्हा जीवन
उसको भी ये खुनी भेड़िया खा गया
अपने स्वार्थ की खातिर
किसी घर का दीपक बुझा गया

लिपटी पड़ी शोलो में वो काया
जो कल लाल जोड़े में थी आई
महकना था जिसे अभी खलिहानों में
वो बूटी नोच कर है बलि चढाई

दंगो की ये आग ना किसी रोटी के काम आई
सिवाए बदन जलाने के और कुछु ना भलाई
बैर की ये बीज़ जो भी जग में बोता है
शायद वो अपने घर/ जग में इकलौता है

कड़वे शब्द बोलता हूँ