शनिवार, 31 जनवरी 2026

मार्केटिंग कंपनी ठगी का बाजार या नए जमाने का कारोबार

पिछले कुछ महीने से मैने एक मार्केटिंग कंपनी को ज्वाइन किया, उस कंपनी के वेलनेस और एग्रो के प्रोडक्ट है। प्रोडक्ट बेहतर है इसमें कोई चर्चा का विषय नहीं,विषय चर्चा का है कि इन प्रोडक्ट को बेचने का तरीका। इस तरह के प्रलोभन दिए जाएंगे जो आपको दैनिक जीवन में कमी महसूस देते हो जैसे अच्छे टूर करवाना, डांस पार्टी इत्यादि। एक बार के लिए मन बहल जाता है लेकिन जब आप आदि हो जाते हो आपको इनका जबरदस्ती प्रोडक्ट बेचने या खरीदने का प्रेशर आपकी कमर तोड़ देता है। जहां आज के समय में लोगों के पहले ही रिश्ते बेहतर नहीं उन्हें ये बिल्कुल खराब कर देते है। जिस सामान की आपको आवश्यकता नहीं उस सामान को जबरदस्ती जिस जनकर को आप अपने भावनात्मक सम्बन्ध में बेच दोगे अगली पार वो आपसे और दूरियां बना लेगा।  कुछ प्रोडक्ट की अच्छाइयों का फायदा उठा कर आपके जीवन को तीतर बितर कर देंगे। इनको ट्रेनिंग में प्रशिक्षित इस तरह से किया जाता है कि लूटना इनका अधिकार है, और लुट जाना अपनों का भाग्य। मैने बहुत कुछ खो दिया इस काम में, अब मैं खुद का भी सम्मान नहीं करता। 
कौन नमक लौटा लेकर कसम खिलाएगा आप समझ सकते है जिसे डर हो कि उसकी दुकान बंद हो जाएगी अगर आप ने आना छोड़ दिया। इसलिए मैं किसी भी भले इंसान को व्यक्तिगत रूप से जाने की सलाह नहीं दूंगा अगर आपका काम ही हमेशा ठगी से चला हो तो ये आपके लिए बेहतरीन काम है। 
जय मार्केटिंग कंपनी। 

रविवार, 2 फ़रवरी 2025

समस्याएं कल और आज

कितनी ज्यादा समस्याएं है आज लोगों को इतना डिप्रेशन है और उन्हें लगता है कि इस से भयानक जीवन नहीं हो सकता, पहले का जमाना सरल था ऐसी धारणा बनी हुई है। लेकिन कोई इनको बताने वाला नहीं कि जो आज उनके लिए सहज है वो मूलभूत सुविधाएं उस वक्त के लोगों के लिए एक मिशन की तरह होती थी। 
सबसे पहले हम बात करते है पानी की
पानी जो आज बोतल में हर चौराहे की दुकान पर मिल जाता है वो आज से 30 बरस पहले यूं कह लीजिए 1995 से पहले बड़ी मशक्कत से हासिल होता था। मिलने के स्रोत क्या थे तो जैसे भारत देश विविधताओं का देश है तो पानी की भी अपनी हर जगह अलग कहानी थी उत्तरी भारत में हिमालय की नदियां ही मुख्य स्रोत थी पानी का, इसलिए अक्सर शहर नदियों किनारे ही बसाए जाते थे क्योंकि अन्न से लेकर मवेशियों को पालने तक के सभी कार्य पानी के बिना सम्भव नहीं थे, जहां नदियों से दूर के क्षेत्र थे उनका पानी का मुख्य स्रोत कुआं और बावड़ी होता था। ग्रीष्म काल के समय अक्सर ये स्त्रोत सूखने के कारण कुछ ही जगह पानी की उपलब्धता होती थी, मीलों चल कहीं पानी मिलता था, परिवार के कुछ सदस्यों का दिन घर की पानी की जरूरत में ही निकल जाता था और रात अगले दिन के पानी के बंदोबस्त की सोच में निकल जाती थी। धन से पानी नहीं खरीदा जा सकता था श्रम की अधिक आवश्यकता पड़ती थी। और आज का मानव पानी की उपलब्धता की कद्र करने की बजाए उसके दोहन में लगा हुआ है उसे ज्ञात नहीं वक्त को लौटने में वक्त नहीं लगता। 

मंगलवार, 5 नवंबर 2024

स्वच्छता योजना नहीं आचरण हो

स्वच्छता के बारे में सभी प्रशिक्षण तकनीकी बातें तो आपको बता देंगे लेकिन तकनीक से भी अलग स्वच्छता का एक पहलू है व्यवहार परिवर्तन, आप सब को यह तो अवश्य पता होगा कुछ बरस पहले गांव की फिरनी व आसपास के खेतों में खुले में शौच के कारण मल पड़ा हुआ मिलता था लेकिन यह नहीं पता होगा कि ऐसा क्या हुआ जो आज सभी लोग खुलें में शौच की बजाए शौचालय का प्रयोग करने लगे
तो उसका बेहतरीन टूल है
 व्यवहार परिवर्तन
लोगों के आचरण में बदलाव से ही संभव हो पाया यह सब, न कोई पैसा लगा न कोई योजना , काम आया सिर्फ लोगों में जागरूकता का अभियान उनके आचरण को बदलने के टूल।

ठीक उसी तरह अब भी हमें लोगों ने इतनी जागरूकता करनी होगी कि उन्हें मालूम चले कि एक गंदगी से उनके स्वास्थ्य और जेब पर कितना असर पड़ता है, कूदे या कचरे का व्यक्तिगत अथवा घरेलू स्तर पर ही निपटान हो जाए तो सब बदल जाएगा। बाहर कूड़े के ढेर नहीं होंगे, सर्वत्र स्वच्छता का वास होगा। 
फिर सवाल उठता है करें कैसे?
तो आसान सा जवाब है गांव मोहल्ला में जब भी कोई सभा हो तो एक स्वच्छता का संदेश इफेक्टिव तरीके से दिया जाए तो जब बार बार सभी वही बात करेंगे तो आने वाली पीढ़ी और जनमानस के मस्तिष्क पटल पर स्वच्छता की छाप छूट जाएगी सभी अपने स्तर पर भागीदारी करके समाज और अपने गांव को स्वच्छ रखेंगे। 

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

टकराव स्वाभिमान का

आज अपमान का एक और अध्याय मेरे जीवन में जुड़ गया, आज पहली बार था मेने आक्रमकता के साथ विरोध जताया, उसके फलस्वरूप हुआ यह कि मुझे नौकरी छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन यह फैसला काफी दुविधा भरा है क्योंकि मेरे सिर की जिम्मेदारियां मुझे अपमानित होने को भुलाने को कह रही है। जबकि मेरी अंतरात्मा स्वाभिमान के लिए नौकरी छोड़ने को। कभी भी दो लोगो की लड़ाई में एक की गलती नहीं हो सकती लेकिन अक्सर फैसला व्यक्ति के प्रभाव के कारण होता है। आमतौर पर दफ़्तर में उस व्यक्ति जोकि सुप्रीडेंट के पद पर कार्य करता है उसकी बदतमीजी का सामने जवाब देने की बजाए लोग बाहर आकर तरह तरह की गालियों से करते है। कभी उनकी विकलांगता पर तंज कसते है तो कभी उनके गंजेपन पर, यह काफी व्यावहारिक प्रचलन है। उनकी अक्सर आदत है बिना मतलब के दूसरों की बुराइयां करने की, इस बारे मेने अपने मुख्य कार्यकारी अधिकारी को पहले ही सचेत भी किया था। मगर जाने क्यों उन्होंने इग्नोर किया। आज भी वही हुआ कि डीपीएम वीसी के लिए सेक्टर 12 जा चुके थे। उन्होंने वहां से कॉल किया कि गोवर्धन कैमला गांव का जो रिप्लाई भिजवाया था वो भेज दे। मेने उनसे फाइल पूछी तो उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप से मिल जायेगा। तब ही इंटरकॉम पर तीव्र लहजे में बोलते हुए सुप्रीडेंट ने कहा कि साहब लेटर मांग रहे है, मेने वही रिप्लाई दिया की फाइल में संधू साहब को पता वो नहीं है। उन्होंने कहा कि फाइल से ढूंढ कर लाओ। इतने में फिर से संधू सर का कॉल आया कि साहब ने वीसी के लिए सेक्टर 12 बुलाया है। मेने जल्दी में मेल से लेटर ढूंढा और संधू सर को व्हाट्सएप कर दिया। सुप्रीडेंट सर का नंबर न होने के कारण, मेरे ध्यान से निकल गया और मैं टॉयलेट चला गया। टॉयलेट से निकलते ही कमरे में एंटर होते ही विवेक डीपीएम ने कहा कि सुपरिडेंट सर बुला रहे, तो मैं तुरंत उनके पास गया तो वहां उनकी टोन वही बदतमीज लहजे वाली थी (जोकि उनके नालायक सहकर्मियों को काफी सौहार्दपूर्ण लगती है क्योंकि उनका समय उनके पास कैमरे की निगरानी से दूर चापलूसी करने में बीतता है। ) मेने कहा सर बड़ी पोस्ट होने कोई बड़ा नहीं बनता तमीज भी होनी चाहिए बात करने कि कह दीजिए सर को मेने नहीं दी। ऐसा कहते ही मैं निकल गया तो मुझे जाते हुए को कहा थप्पड़ लगेंगे तेरा, मैं वापिस आया और तैश में बोला कि मार कर दिखाना, राकेश पीओ साथ में खड़ा था उसने रोकने की एक्टिंग की, (क्या किसी तैश में आए व्यक्ति को कोई रोक सकता है आज तक तो किसी से कोई रुका नहीं) वो सिर्फ बदतमीज आदमी को एहसास कराने का तरीका था कि गलत बोलने के क्या दुष्प्रभाव भी हो सकते है। खैर ये अंग्रेजो के बनाए अधिकारी इनको कार्य लेने से ज्यादा स्वयं कि खुशामद वाले कर्मचारी पसंद होते है। सुप्रीडेंट ने फिर कहा निकल जा यहां से तो मैं निकल आया। फिर बदतमीज में कुछ बोले तो मैं जाते हुए कह गया आपका लहजा बता रहा है कि तमीज क्या है।  इतना कह कर मैं वहां से वीसी के लिए निकल गया। इसके बाद इतनी देर में मैं वीसी से आया तो सभी दफ्तर के कर्मचारियों को उन्होंने अपने संस्करण को इतना रटा दिया कि अपने शब्दों में साथ बैठे कर्मचारियों में घोल दिया। वो कहते है न एक झूठ को 100 बार दुनियां को सुनाए तो वो सच लगने लगता है। और इतने में उन्होंने वही कर दिया। मुझ से साथ वालो ने वीसी के बाद आने पर पूछा मेने सिर्फ इतना कहा कि हम तो लड़ लिए अधिकारी के लिए मुसीबत हो जायेगी फैसला करने की। क्योंकि सच अक्सर इस तरह कि लड़ाई में बाहर नहीं आता इसमें कभी एक की गलती नहीं होती एक उकसाता है तो दूसरा उग्रता दिखाता है, एक भी शांत स्वभाव का हो तो झगड़ा टल जाता है। 
खैर 4 बजे सीईओ सर का फोन आया, मेने सारा पक्ष सही से रख दिया तो उन्होंने बुजुर्ग है सॉरी बोलने को कहा सुप्रीडेंट सर को, तो मुझे पता था सॉरी बोलने जाऊंगा तो फिर वही बदतमीजी का सामना करना पड़ेगा। मेने सर को बोल दिया आपके सामने ही सॉरी कह दूंगा जी। तो यहां मेने सीईओ सर के शब्दों का मान रखने के लिए अपने को कमजोर साबित कर दिया। खैर साढ़े 4 बजे सुप्रीडेंट तो अपने सिखाए सभी कर्मचारियों को लेकर पहुंच गया। और जो पाठ उन्होंने 2 घंटे से सिखाया उन शब्दों को सीईओ सर के समक्ष उकेर दिया। मेरे मन में तब तक भी यही था कि सीईओ सर की बात का मान रखना है बुजुर्ग होने के नाते सॉरी बोलना है और निकलना है। पर जब उन सब ने चक्रव्यूह रचा तो मैं निहत्था हो गया और उन सबकी सुनता रहा, उनके झूठ में न्याय नहीं केवल पद के अहम को ठेस पहुंचने की बात थी। 

आरोप:- कि मेने उनका सम्मान नहीं किया जानबूझ को गलत कहा
जवाब:- अगर उनके पद का सम्मान नहीं करता तो क्या उनके बुलाने से जाता, वीसी के बहाने वहां से निकल भी सकता था बिना मिले, जैसा अक्सर दफ्तर में सब करते है। 
आरोप:- कि मेने सम्मान से बात नहीं कि बड़े छोटे सबसे सम्मान से बात करनी चाहिए। सभ्य नहीं है ये।
जवाब:- क्या सम्मान से बात करना बड़े अधिकारी/कर्मचारी पर लागू नहीं होता। तुझे थप्पड़ मारूंगा कहने वाले की जुबान सभ्यपन के चर्म को छू रही थी। 
आरोप :- कि मेने कहा इसके जैसे बहुत सुप्रीडेंट देखे।
जवाब :- बिलकुल कहा, क्योंकि उसका पहली बार नहीं था मुझे अपमानित करना, एक दिन निगम से DLTF की मीटिंग से आया इसने धमका कर मुझे गाड़ी से बाहर निकाला और मैं पैदल दफ़्तर आया। फिर दफ़्तर कहता फिरता जब विजिलेंस मॉनिटरिंग कमेटी की मीटिंग थी कि पत्रकार बुलाओ इसकी गाड़ी के पीछे ऑन गवर्मेंट ड्यूटी लिखा है। लेकिन इसके बावजूद मेने इनसे बचने की कोशिश की क्योंकि मेरे स्वभाव में गलत सहने की कोई गुंजाइश नहीं। अगर गाली या अपशब्द कहने कि आदत होती दूसरों के पास जाकर गाली देने से मन हल्का हो जाता। तो सबको बेहतर लगता। 

खैर फिर भी मेने सीईओ सर के कहने से 3 बार सॉरी बोला और वहां से आ गया। बाहर जिस संजीव को मैं सुपरीडेंट का खास समझता था बल्कि उसने उनकी गलती निकाली कि सुपरिडेंट अक्सर सबको गलत बोलता है। फिर भी नगर निगम से बाहर आकर मॉडल टाउन तक जाते जाते, जाने कौन से दर्द ने दिल को लपेट लिया कि फूट फूट कर एक घंटे तक रोया। दुखी मन से सीईओ व डीसी सर को मेसेज भी किया, जवाब नहीं देख 10 मिनट में डिलीट भी कर दिए क्योंकि उनकी न्याय व्यवस्था देख मन दुखी था। कहीं जॉब में निकम्मा होता या पैसा कमाया होता शायद व्यक्ति नीवा पड़ जाता है। लेकिन जिसने सिर्फ काम को ही सब कुछ माना हो उसके लिए स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं होता।

अब कैसे उस छत के नीचे काम कर सकता हूं सुप्रीडेंट के साथ , वो आगे भी वही बदतमीजी करेगा क्योंकि उसके पक्का कर्मचारी और बड़े पद होने का जो लाभ मिला है। वो और अहंकार से भर जायेगा। 
और जब गलत ही मैं निकला हूं तो मुझे अधिकारी के सम्मान में स्वयं इस्तीफा दे देना चाहिए, मेरे अनुसार सुप्रीडेंट गलत है वो कहीं जा सकता नहीं तो फिर भी मुझे ही जाना होगा, दुविधा में मेने सीईओ सर से कल की छुट्टी लेकर कोशिश तो की है कि तीन दिन में मन शांत हो जाए। लेकिन ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा तो सोमवार को पेट और स्वाभिमान में से कौन जीतता है तो देखते है। 

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

दर्द का ट्रिगर

15 मार्च 2023 का दिन मैं तो भूल गया था लेकिन आज मेरे दोस्त के दो दिन के जन्मे बच्चे की ठाकुर हॉस्पिटल करनाल में हालत देख कर, मेरा अपना दर्द भी ट्रिगर हो गया, मेरे सामने उस भयानक दिन के सारे लम्हें एक पल में आंखों के आगे से गुजर गए, 14 मार्च को बेटे की पट पर लोहे का बेंच गिरने से हड्डी टूट गई थी। डॉक्टर ने अगले दिन ऑपरेशन ही इलाज का एकमात्र विकल्प बताया, मेने भी मेडिकल विद्या के आगे नतमस्तक हो कह दिया जैसा डॉक्टर साहब आपको ठीक लगे। 
15 मार्च की सुबह 8 बजे डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर लेकर गए तकरीबन 10 बजे उन्होंने मुझे ही आईसीयू में बुलाया, वीर निरंतर रोता और सिसकता जा रहा था। एक पल भी गैप दिए बिना वो जैसे रो रहा था मेरा दिल बैठ रहा था। डॉक्टर ने उसे एक खड़तल से 3 घंटे तक पड़े रहने के निर्देश दिए। मेरा एक हाथ उसकी कमर पर स्पॉट दिए तथा दूसरा मेने उसकी मुट्ठी को अपने हाथ से पकड़ रखा था। जैसे जैसे समय बड़ रहा था उसका रोना मुझे बुरी तरह से तोड़ रहा था। शायद वो दर्द मैं बियान ना कर पाऊं लेकिन उस दर्द ने मुझे जिंदगी की अहमियत जता दी। मैं हर एक मिनट में उसे सांत्वना दे रहा था लगभग 3 घंटे उसका रोना बंद नहीं हुआ। और मैं आईसीयू में उसके पास बैठकर उस मार्मिक पलों में घुट रहा था।। मुझे एक जिम्मेदार पिता की तरह संभलना भी था और मां के दिल सा रोना भी था। रोता तो संभलता कैसे इसलिए बस उसका रोना और मेरा ये कहना कोई न बेटा बस ठीक हो जायेगा थोड़ी देर में, ये सिलसिला 3 घंटे चलता रहा। 
फिर रात के 12 बजे से उसका खाना पीना सब बंद था, जब सिसकना बंद हुआ तो उसे पानी की प्यास लगने लगी डॉक्टर का कहना था की 6 घंटे तक पानी नहीं दे सकते। मुझे लग रहा था जैसे आज कुदरत मेरे बेटे की सारी परीक्षा ले रही हो,  उसके सब्र के बांध को देख रही थी या मेरे । 
और आज दोस्त के बेटे की हालत ने वो दिन मेरी नजरों में फिर गुजार दिया। दर्द किसी भी अपने का हो तकलीफ तो देता है, हालांकि समझता वही है जिस पर गुजरती है लेकिन बेबस वो भी कम नहीं होता जो इस बुरे वक्त की घड़ी में अपनों के साथ होने के सिवा कोई मदद नहीं कर पाता। 

शनिवार, 27 मई 2023

वैवाहिक जीवन

एक ऐसा बन्धन जो अगर सामाजिक रूप से जुड़ा हो तो वैचारिक मतभेद होने के कारण जीवन अभिशाप बन जाता है। इसमें किसी एक की गलती नहीं होती बस उनकी समझ विपरीत होती है, आप यूं कह सकते हो कि एक आस्तिक होता है तो दूसरा नास्तिक।  विवाह को लगभग 14 वर्ष बीत चुके है लेकिन आज तक मुझे यह एहसास नहीं हुआ कि वैवाहिक जीवन में यह सुख है जो केवल विवाह करने उपरांत ही संभव है और ऐसा नहीं कि यह घुटन मुझे ही महसूस हो रही है और मेरी पत्नि को नहीं है, कहूं तो मेरी पत्नि को यह घुटन शायद मुझ से भी कहीं गुना ज्यादा है क्योंकि मुझे घर से बाहर जाने के कारण ध्यान थोड़ा निजी समस्याओं से हटकर कार्यालय की समस्याओं में बंट जाता है। मगर मेरी पत्नि को तो 24 घंटे उसी घुटन से गुजरना पड़ता है। और उसका मन इतना नाजुक हो चुका है कि जरा जरा सी बात उसके मन में घर कर जाती है। अब कल की बात ले लीजिए हम नॉर्मल बात कर रहे थे, मेने पूछ लिया कि वैष्णो देवी जा रहे है कोई दोस्त तो हम भी चलें, कहने लगी नहीं मुझे किसी के साथ नहीं जाना दूसरों के साथ भाग भाग रहती है मुझे आराम से अर्धकुंवारी व अन्य जगह आराम से पूजा पाठ करना है। यहां तक सब सही चल रहा था। फिर अचानक से बोल पड़ी मुझे एक और काम करना है कि छोटे बेटे के मूल शांति का पाठ दोबारा करवाना है जो पिछली बार हुआ था वो विघ्न पड़ गया। मेरे मुख से अनायास निकल गया कि इसकी क्या गारंटी है कि अगली बार जो पंडित करेगा वो सफल होगा और जो पहले किया था वो असफल है इसका तो कोई पैमाना नहीं। बस इस बहस में दोनों के मध्य तनाव हो गया। मेरी अच्छाई लगाओ या बुराई लेकिन मैं हमेशा खामोश हो जाता हूं मेरा विजन होता है कि गुस्से में कही बात कभी कभी ऐसी चुभ जाती है कि उम्र भर की रिश्ते में खटास बन जाती है। बस मेरी पत्नि को लगता है कि मैं समस्याओं से दूर भागता हूं। उनका सामना नहीं करता जबकि मुझे लगता है कलह ही वो विषय है जिसमे पीछे हट जाना सभी उपायों से बेहतर है।  
कल की वो लड़ाई उसके मन में ऐसा गुब्बार बनती रही कि उसके डिप्रेशन को दुबारा घुटन ने ट्रिगर कर दिया। मैंने माहौल सुखद बनाने हेतु कोशिश की और कहा की बच्चों का भविष्य उनकी शिक्षा, केयर और सुविधाओं से बनेगा न कि किसी पूजा पाठ से, बस यह बात सुनते ही उसने मुझे पिछले 14 वर्षों के सारे जख्मों को कुरेद कुरेद सुनाया और डिप्रेशन की अधिकता के कारण शाइवरिंग (कंपन) करने लगी। नेट पर उपाय ढूंढने के पश्चात देखा कि गर्माहट अर्थात पैरों के तलवे की मालिश या गर्म पानी पीने से आराम मिल सकता है। अब इतने क्रोध में पानी तो उसने पीना नहीं था। मेने उसके मना व बार बार पैर झटकने के बावजूद मालिश शुरू कर दी। 15 मिनट की मसाज के बाद कंपन में आराम आया। 
अब कोई समझाए इस घटना में दोष कहां था कहां इतना बड़ा मसला था कि अपनी सेहत को ही खराब कर लिया तथा दोनों की मानसिक अवस्था कमजोर हुई वो अलग, भावनाओं के ये दौर इंसान को इतना बेबस कर देते ही कि अगर थोड़ा भी दिमाग ज्यादा उत्तेजित हो जाए तो कोई भी अप्रिय घटना को बढ़ावा मिल जाता है। मेरी पत्नि की मानसिक अवस्था के लगभग पिछले साल से ज्यादा ही खराब होने के कारण मेरा भी जीवन से बिलकुल विश्वास उठ गया है। पूरी निष्ठा व मेहनत से परिवार के लिए दिन रात झूझने के बावजूद भी जब केवल तिरस्कार ही मिले तो मन व्यथित हो जाता है। असली वजह वर्तमान पीढ़ी में सहन शक्ति का कम होना तथा त्याग की भावना का कम हो जाना है। रिश्तों में अगर लम्बा चलना होता है तो समय समय पर किसी न किसी को पिसना ही होता है। कमाल की बात है हम केवल संतान के आगे तो झुक जाते है बाकी सभी रिश्तों में टकराव ले आते है। कहीं न कहीं हम सभी बुरे है क्योंकि हम निज स्वार्थ में इतने अंधे हो जाते है दूसरों के लिए कब तकलीफ बन गए हमे खुद नहीं पता चलता और रिश्तों में गहरी खाई हो जाती है। 

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

पेड़ पौधों से कर प्यार

पेड़ पौधों से कर प्यार
मनु सांसों का कर्ज उतार

जीवन बना है जिस मिट्टी से
आखिर उसमे ही मिल जाना है
जीवन भर तुझे मिट्टी का ही खाना है
सहेज ले धरा कर खुद पर उपकार

पेड़ पौधों से कर प्यार
मनु सांसों का कर्ज उतार

कड़वे शब्द बोलता हूँ