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गुरुवार, 14 जून 2018

तुम हाँ तुम

तुम हाँ तुम
प्रेरणा बनी थी मेरे कलम की

बड़े फ़रेबी अंदाज से, मुझे समझाया था
खुद के दासी होने पर मुझे मालिक बताया था

तुम हाँ तुम
जिसने मुझे हँसना सिखाया था

एक राह दिखाई थी, कि दुनिया बड़ी हसीन है
ऐसा उड़ा था मैं, जैसे तू ही मेरा मोहिसिन है

तुम हाँ तुम
जिसके खातिर उसूलों को छोड़ दिया

उतर गए मेरे कोरे मन में, जैसा चाहा लिख डाला
मोहब्बत होने लगी थी ज़िन्दगी से, तो बदल गया

तुम हाँ तुम
जिसने मेरी शराफ़त को निचोड़ दिया

मासूमियत भरी मेरी सीरत को, फ़रेब से रूबरू कर दिया
तन्हाई में बहने वाली तन्हा रगों को, जुदाई के दर्द से भर दिया

तुम हाँ तुम
जिसने मुझे तन्हा से रुसवा कर दिया

शिकवा करते है मुझ पर लिखते नहीं वो
जिनकी तारीफ़ से, मेरी कलम ही रूठ गई

तुम हाँ तुम
जिसकी वजह से जीने की वजह ही छूट गई
😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

ए दिल है मुश्किल

ख्वाहिशों की बिसात
मुझे उसकी
उसे किसकी
किसको जाने किसकी
ए दिल है मुश्किल

मिला सकूँ नही
ना मुझे
ना उसको
ना किसी को
ए दिल है मुश्क़िल

दोस्ती थी
या प्यार
वफ़ा थी कि
बेवफा यार
ए दिल है मुश्क़िल

हर कोई था चाह में
किसी की परवाह में
खो गया था इश्क़ की राह में
ए दिल है मुश्क़िल

#
एक तरफ़ की
इबादत हो या मोहब्बत
ख़ुदा से हो खुदा नहीं
महबूबा से हो महबूबा नहीं
बस है तो दिल ए मुश्क़िल

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

मुश्किलों से लिखी मेरी कहानी:- किसी मुश्किल से

कदम चलती हूँ
लड़खड़ा जाती हूँ
किसी मुश्किल से

बहुत संजोया हर रिशतें को
हर किरदार बखूबी निभाया
दो पल हुई न खुशियां
कि घिर गई
किसी मुश्किल से

टूटती रहती हूँ
फिर भी मुस्कराती हूँ
बेबसी के लम्हों से
खुद को छुपाती हूँ
ये सोच की खो न जाऊ
किसी मुश्किल से

आजमाइश करती रही ज़िन्दगी
मैं नुमाइश बन रह गई ताउम्र
गाँठती रही डोर फिर टूट गई
किसी मुश्किल से

#
मुश्किलों से लिखी मेरी कहानी
अब खुशियों से आँसू आ जाते है
हम गम तो बर्दाश्त कर लेते है
खुशियों से घबरा जाते है।।

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

कंचन करनाल बनाने का

कंचन करनाल बनाने का बीड़ा हमने उठाया है
गाँव गाँव स्वच्छता का दीपक जलाया है
खुले में शौच मुक्त  का सपना सजाया है
कंचन करनाल .........2

हर गली मोहल्ले में जाकर, लोगो को स्वच्छता सन्देश सुनाया है
खुलें में शौच से होने वाली बीमारियों से चेताया है
कंचन करनाल  ..........2

निगरानी समितियों ने ठीकरी पहरा लगाया है
गाँव के हर चौन्क पर सुबह शाम का डेरा जमाया है
लोगों को खुले में शौच रोकनेे का संकल्प निभाया है
कंचन करनाल ......2

पंच हो या सरपंच
आंगनवाड़ी वर्कर हो या आशा वर्कर
नंबरदार हो या चौकीदार
स्वच्छता के बने है सब पहरेदार
सब मिलकर बदल रहे गाँव की तस्वीर
कंचन करनाल ......2

नन्हें सिपाहियों ने भी, स्वच्छता डोर थामी है
स्वच्छता रैली कर-कर सब को है बतलाया
खुलें में शौच ने मेरे गाँव का मान है घटाया
कंचन करनाल .......2

गाँव के हर घर बनवाया  है शौचालय
जब से चली मुहीम, गाँव हुआ देवालय
शपथ ले हर जन, खुलें में शौच से बदले मन
कंचन करनाल का .....2

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

ज़िन्दगी के रंग

समाज के सम्मान का तमगा था जिसके पास
उसे अन्धकार से दिखा कर रौशनी की आस

फिर धकेल दिया पहले से भी गहरे अन्धकार में
उसी सम्मान के नाम मुझे कर शहर में बदनाम
खुद का दामन छुड़ा गये, रूह मेरी रुला गये

समझ नहीं पाया, क्यों मुझे वो रास्ता क्यों दिखाया
शायद वो ही अपने कायदों को मुझ पर थोप गया
मुझे दुविधा की आग में तनहा ही झोंक गया

शुक्र है फिर भी , साँसों को कुछ पल ही रोक गया
ज़िन्दगी थी दांव पर, मुझे कम से कम ज़िंदा छोड़ गया

#
रिश्तों से खेलना छोड़ दे जिंदगी
मेने छोड़ दी तो ना रिश्ते होंगे ना तुम

रविवार, 15 मई 2016

सन्तान।।

माँ और बाप दोनों की
आन होती है सन्तान
बेटी हो या बेटा
दोनों पर होता है मान

जगत चाहे भेद करे हज़ार
माँ बाप का होता एक सा दुलार

बुधवार, 30 मार्च 2016

कशमकश में हूँ मैं

कश्मकश में हूँ मैं
वो मेरा है
दिल कहता है
हो सकता नहीं

भुलाना भी चाहूँ गर उसे
मेरी साँसे क्यों टूटती है
एक पल को लगे
पीछे दुनिया छूटती है
कश्मकशम मे हूँ मैं

वो बेशक़ भूला सा लगता है मुझे
कहीं राहों पर फिर मिल जाता है
मेरा उदास चेहरा खिल जाता है
वो नजरें क्यों फिर चुराता है
कशमकश में हूँ मैं

मंगलवार, 22 मार्च 2016

मैं औरत हूँ

काँच की तरह रोज टूट जाती हूँ
अपने ही वजूद से पीछे छूट जाती हूँ

हर दिन नया ज़ख्म, मेरे जिस्म पर उकेर देता है
अपनी हवस और क्रोध से, मेरी रूह हर लेता है

बेबसी का ये मंजर, दशको से मेने ही झेला है
खुशियो को जब भी चाहा, पीछे ही धकेला है

बर्बरता का आलम तो देखो उस वहशी का
नफ़रत भी हमसे, और मोहब्बत का तकाजा भी

अस्तित्व की लड़ाई मैं हार गई मैं लड़ते लड़ते
नोच गया मेरा जिस्म वो, बेजान मानकर

मेरी रूह  को तार तार कर गया, जबरदस्ती मोहब्बत से
कौन सा सकूँ मिल गया उसे, मेरी बंजर सी धरती से

सोमवार, 14 मार्च 2016

मैं ही हूँ बस, ए दिल

हक़ जताना छोड़ दें ए दिल
कोई साथ नहीं निभाता
है ज़िन्दगी जब तलक
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

पल दो पल को मिलते है लोग
अपने हिसाब से दुनिया बनाते
गम छोड़ उन लोगो के जाने का
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

दिमाग ने भी बहुत समझाया तुझे ए दिल
तेरी बनाई दुनिया में जीना है मुश्किल
पत्थर रख ले अरमानो की गठरी पर तू
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

समझ जरा तेरे लिए कोई दिल न बना ए दिल
बस आंसुओ पर खत्म होती है तेरी हर मंजिल
छोड़ दे और जान ले, चाहे  आज हो या कल
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस



शनिवार, 12 मार्च 2016

कांटा बन चुभता हूँ मैं

जिनके दिलों के गुलाब होते थे
अब कांटा बन चुभता हूँ मैं

जिनके ख़्वाबों में हुआ करते थे हम
दूस्वप्न बन नासूर बन गया हूँ मैं

ख़ुदा की इबादत थे जिनकी नजरों में हम
आज उन क़दमों की ठोकर बन गया हूँ मैं

उम्र भर कड़वे शब्दों के जाम की बात करते थे जो
आज कागज के टुकड़े समझने लगे है वो

बस कुछ इस तरह ही दुखता हूँ मैं
अब कांटा बन चुभता हूँ मैं

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

एक दोस्त

एक दोस्त
मिलता है
वादा करता
जिंदगी के
गुर सिखाने का

एक दोस्त
एक नदी में
तैरने की कला
वो सिखाने ले चला
जाने फिर क्या हुआ
हाथ छुड़ाया
अनजानों से मिलाया
छूमंतर हो गया

एक दोस्त
उम्मीदें जगाता है
होंसला बढ़ाता है
फिर क्यों
एक दिन
सब तोड़
सब छोड़
निकल जाता है
एक दोस्त एक दोस्त

गुरुवार, 3 मार्च 2016

औरत के समर्पण की पहचान है वो

हर कदम लड़ती है
तब ही साहसी लगती है

ज़िन्दगी उसके लिए मुश्किलें चुनती है
वो बस हर मुसीबत का हल बुनती है

हर गम ने आकर उसको घेरा है
पर उसके दिल में रौशनी का बसेरा है

मोतियों सा चमकता रहता है वो
बेशक मायूसी का उम्र भर साया हो

होंठो से खुशियों को बांटता है हर पल
बेशक़ उदासी से भरा है उसका हर पल

हौंसलों की उड़ान है वो
मजबूती की पहचान है वो

औरत के समर्पण की पहचान है वो

बुधवार, 2 मार्च 2016

ओह सजन रे

मोतियों सा चमके है तू
अँखियो में दमके है तू
ओह सजन रे

धड़कनो का साज हो गया तू
मेरा कल और आज हो गया तू
ओह सजन रे

पलकों के तले रहने लगा है तू
साँसों संग बहने लगा है तू
ओह सजन रे

रगों में बहता है दर्द बनकर तू
ज़िन्दगी में हो शामिल दवा बनकर तू
ओह सजन रे

ज़िन्दगी भर की जागीर तो नहीं तू
बस दो पल का सुखद मिलन बन जा तू
ओह सजन रे

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

आखिर तू है कहीं

ख़ामोश रहने लगा है
शायद थोड़ा उदास भी

मुझे से बातें करने से कतराता है
हर लम्हा वो नजरें जो चुराता है

कभी मिल भी जाए गर नजर
एक झूठी मुस्कान बिखेर जाता है

मेरे सीने को इतने प्रहार कर जाता है
फिर भी एक कोने में अलख जगाता है

एक ख़ुशी आखिर तू है कहीं
दिल को सकूँ दिलाती है
तेरी मौजूदगी ही तो है
मेरी नब्ज़ चलती जाती है

#
बेशक़ मेरी राहों से, बंद हुआ तेरा आना
मगर आज भी पायल की खनक का हूँ दीवाना

कलम ...........बुनती अरमान

लिख देती
हर पन्ने पर खुशिया
कोरे मन को
शब्दों से बुन देती

मासूमियत भरे
अल्फ़ाज़ उसके
दिलों पे छा जाए

दो अनजान का
रिश्ता बनाए
एहसास सुनाए

दास्ताँ का लिफाफा
जिसने भी पढ़ा है
उसने खूब जाना और माना

दुआ है मेरी
कलम बुनती अरमान
यूँ ही चलती रहे

कोरी है जो जिंदगियां
इस कलम से खिलती रहे

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

ज़िन्दगी

मिल गया मुकद्दर
कि ज़िन्दगी उड़ने लगी

काँटों सी झूलती
मखमल पर चलने लगी

बरसो से तपती हुई अँखिया
आज झील सा शांत हो गई

रोज रोज की तंग थी खुशिया
आज खुलकर मेरी ही हो गई

सदियो से कटती ना थी जो रतिया
आज खुले आँगन में ही सो गई

लगता तो है आखिर
मेरी ज़िन्दगी मेरी हो गई

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

क्यों बेचैन है वो

क्यों बेचैन है वो
जब साथ था तब भी
दूर हुआ तो अब भी
क्यों बेचैन है वो
पहले मेरे शब्दों से परेशां
अब मेरी ख़ामोशी से हैरान
क्यों बैचैन है वो
मैं बेशक टूटा हूँ
पर उस से छूटा हूँ
फिर क्यों बैचैन है वो
दुनिया भी छोड़ सकता नहीं
बहुतो की उम्मीदें तोड़ सकता नहीं
फिर क्यों बैचैन है वो
अपने आसमान की छाँव में
बेहतर रिश्तों की पनाह में
फिर क्यों बैचैन है वो
फिर क्यों बैचैन है वो

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

वो जब आये मेरे मोहल्ले में

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
होंठो से नहीं, नजरो से बतियाना हुआ
कुछ तो नजरो का मिलाना
कुछ उनका शर्माना हुआ

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
कुछ इस तरह उनका मुस्कराना हुआ
होंठ तो खुले नहीं, चेहरा गुलाब हो गया
देखते ही मैं तो लाजवाब हो गया

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
कुछ इस तरह उसका इतराना हुआ
उसने तो पूछ लिया, पता अपने ख़ास का
रंग उड़ गया मेरे आत्म विश्वास का

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
मेरा दिल ही निशाना हुआ
वो तो चले गए वापिस कब से
मेरे लिए उम्र भर का अफ़साना हुआ

वो जब आये मेरे मोहल्ले में
तो मेरा दिल भी दीवाना हुआ

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

मोम सा हो गया हूँ मैं उस पत्थर के प्यार मैं

मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं
वक़्त से नाता तोड़ दिया
उस कम्बखत के इन्तजार में
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

बहुत जतन लगाये
उसके दिल को रास ना आया
मेरे धड़कते दिल का
उसको विश्वास ना हो पाया
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

मेरी आहों पर हँसता था वो
मेरी साँसों में रचता था जो
टूट कर बिखर गया उसकी बाँहों में
वो काँटे बिखेर गया मेरी राहों में
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

ज्योति बन जिंदगी रोशन कर दे ये समझा था मैं
आंसुओ का समुन्दर मेरी झोली में डाल गया है वो
नासूर बन जिंदगी को डस गया है जो
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं



बुधवार, 2 दिसंबर 2015

गीत:- बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

ना इसकी फिकर ना उसका है डर
हर दर्द से अनजान, ना चाहतो का असर

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

इक झूठी मुस्कान, दूजा स्वर अभिमान
टूटा दिल नहीं, रुसवा है उसकी पहचान

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

चर्चे उसके होते है अब हर दूकान और मकान
मीनारों और किलों से ऊँची हो गई है उसकी शान

बेख़बर हो ओ  ओ ओ ओ बेख़बर वो

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अंदाज ए यार हो गए बेज़ार
मोहब्बत का नहीं इख़्तियार

कड़वे शब्द बोलता हूँ