सोमवार, 11 मई 2015

दो धाराओ में जिंदगी बह सकती नहीं

लिपट गया मेरा दिल जो तेरी रूह से
अलग होता नहीं, रोज जमाना हँसता है
अक्सर जिद्द के दामन में ही दर्द बसता है

छोड़ ये सकता नहीं, निभाना मुझ से जाना नहीं
ये पल पल तड़पेगा, बेबसी भरा दिल धड़केगा
जाने क्यों जख्म नासूर बनाता है

पत्थर होने को कहा था इसे,
उसकी साँसों की तपिश
पत्थर को मोम बना गई

गर्मजोशी से आते है वो मेरे आशियाने में
डर के मारे, अक्सर नजरें फेर लेता हूँ
उस से कहीं ज्यादा, खुद को चोट देता हूँ

हिम्मत कर कह भी दूं हाल ए दिल
उस गैर से संभाला ना जाएगा
उसका अतीत, उसको रुलाएगा

दो धाराओ में जिंदगी बह सकती नहीं.....................

#साहस टूट गया लिखने को, हम पत्थर है बस दिखने को

रविवार, 10 मई 2015

आवाज देता अँधा दिल

रूठ गयी जमीन मुझ से
खिसक गयी पैरो तले से

धँसता गया हूँ दर्द के कुंए में
ओझल हो गया हूँ तन्हाई के धुंए में

रात दिन कशमकश में डूबा है मन
मछली सा तड़पता है मोरा बदन

आंसुओ को भी इजाजत नहीं बहने को
दर्द ने मेरा दिल घरोंदा बनाया है रहने को

परस्पर मेल खाती नहीं, दिल और दिमाग की
जीत की खबर नहीं, हार हुयी मेरे विश्वास की

हो सके तो कुछ लिहाज रखना मेरे आखिरी श्वास की
तू करीब न आना, कहीं डोर बंध ना जाये टूटते सांस की

#
मासूमियत भरे हसीं चेहरे पे मत पिघल जाना
शौक है इनका, दिल में आग लगा कर निकल जाना

शनिवार, 9 मई 2015

एक दिन जुदा हुआ यार तो अन्धकार हो गया

क्यों एक दिन की जुदाई अरसा हो गयी
बरसो की मुलाकात, पल में पलछिन हो गयी

हम देखते रहे, वो ओझल हो गए हमसे
मुट्ठी से फिसल गए हो रेत के जैसे

अब उनके जाने का दर्द सहे कैसे
हो जख्मी सीना, हँसते हुए रहे कैसे

चंद यादें रखी है उनकी, सीने से लगाकर
बाकि तो संग ले गया वो, रिश्ता तोड़कर

अब और कहीं दिल ना लग पायेगा
बहुत देख लिया, बेव्फा से दिल जोड़कर

अर्ज मेरी हो सके तो अपने मासूम दिल को बताना
दिल हो बेशक पत्थर, पर किसी पत्थर से ना दिल लगाना



रस बहता गया और में लिखता गया, क्या लिखा मालूम नहीं

खामोश रह कर यूँ सताया ना कर
बोझ दिल का अकेले उठाया ना कर

आज होता नहीं आंसुओ का किसी पर असर
हर कोई अपनी धुन में सबको अपने सिवा किस का फिकर

तू यूँ ही रुलाता है अपना सीना
बड़ा मुश्किल है इस जग में जीना
जाने किस ने किस किस से क्या क्या है छिना

रस्में अदायगी और भी है, रिश्तों के समुन्दर में
कोई महबूब ही नहीं, साथ निभाने को

बाहें खोल, दरवाजे खुले थे जिनके लिए
वो किसी तंग गली से, आँचल समेट निकल गए

ज़िन्द्गी दोहरापन वाली

दो जिंदगी जीते है हम

एक तो जो फ़र्ज़ के लिए बनाई इस दुनिया ने
इसके लिए ये फर्ज
उसके लिए वो फर्ज

दूसरी जिंदगी जो हम खुद बुनते है
बाहर अन्जान लोगों से मिलते है
दोस्त और दुश्मन अपने विवेक से बनाते है

पहली जिंदगी हम चाह कर भी नहीं छोड़ सकते
इस कदर थोप दी हमारी मानसिकता पर

और दूसरी जिंदगी हम छोड़ना नहीं चाहते
इस का अच्छा पहलु यह भी है जो मंन में है
जुबां पर नहीं होता मगर चेहरा बोल देता है

पहली जिंदगी में जुबाँ वो सब बोलती है
जो दिल में कभी नहीं होता पर
मानसिकता हो जाती है जहर उगलने की

बड़ी मुश्किल वाली संस्कृति है ये
शिक्षा का भी असर नहीं हुआ इन पर
बस ढोये जा रहे है जिंदगी
दो विपरीत दिशा वाले पहियो पर

#लगे रहिये मेरे ब्लॉग को सीरियस ना लीजिये॥ पीकू देखकर सच याद आ गया थोडा सा

गुरुवार, 7 मई 2015

खुशियों को नजऱ

निगाहें ज़माने की मुझ से ज्यादा कहीं तुझ पर है
उन्हें फ़िक्र खुद से ज्यादा, हमारे रिश्ते की है

रवैया इस कदर बिगड़ा है इस समाज का
भूलकर अपना कल, बस तमाशा बनाता मेरे आज का

हो गया है दुश्मन जब से, में और मजबूत हुए जाता हूँ
भावनाओ के समुन्दर से निकल, में भी सख्त हो गया हूँ

अब अश्क़ नहीं बहाता, औरो के कसूर पर
वक़्त बे वक़्त हंस लेता हूँ, उस मगरूर पर

वजह जो हो, ख़ुशी है मेरी ज़िंदगानी की
जीने की चाह है मुझको भी, बरसो बरसी अंखिया पानी की

कभी आंसू पोंछने ना जो उस वक़्त आया, आज वो आया है
संग अपने ढेरो मशवरे और फ़िक्र का संदूक लाया है

मेरा तकाजा है जिंदगी से, ज़िन्दगी फूल माफिक कुछ पल महकती है
तन्हाई और परेशानियो के दौर में, बस लम्हें जी भर चहकती है

इस बारिश में मुझे भीग जाना है
सर्द मौसम नहीं, कम्बखत ये जमाना है
वक़्त के थपेड़ो से आज हमने लूट कर ये जाना है

लम्हें उदासी भरे

क्यों उदास बैठे हो
क्या ज़ख्म है तुम्हारा

अंखियो में उदासी छाई है
चेहरे पर मायूसी क्यों आई है

कुछ ज़ख्म मेरे नाम कर दो
बेपनाह मोहब्बत अपने नाम कर लो

कोई शिकवा हो गर हम से
यूँ दोस्ती न करो किसी गम से

पास आकर बताता हूँ
हर शिकवा दूर करवाता हूँ

हमदर्द नहीं बेशक में तेरा
दोस्त होने का फ़र्ज़ निभाता हूँ

मंगलवार, 5 मई 2015

छोड़ मुझे, दर्द बेइन्तहा, अब ना सहे जाना

जी भर देखना चाहा तो
हया से चूर हो जाता है वो
में कहता हूँ जो दिल की बात
मजबूर हो जाता है वो

दस्तूर है मोहब्बत का, नजरें चुराना
फिर भी छुप छुप, उन्हें देख कर आना
झूठे बहाने बनाकर, उनसे  मिलने जाना
आँखों में बसे दर्द को, होंठो से छुपाना

गर्दिश भरे हो बेशक हमारी मोहब्बत के सितारे
ज़िन्दगी हमारी तो हर सांस उनको ही पुकारे
कोई शिकवा नहीं, जो वो हुए ना हमारे
हमने तो तन्हा लम्हें, सब उनकी यादों में है गुज़ारे

दो पल की खुशिया, मेरे दामन में भी छोड़ जाना
ताउम्र सजदा ना सही, किसी मोड़ पर मुस्कराना
आँखें फेर लेना हुआ बहुत, शिद्दत से गले लगाना
बरसो की प्यासी जमीं को, प्यार से भिगो जाना

छोड़ मुझे, दर्द बेइन्तहा, अब ना सहे जाना
सिर्फ चंद साँसे जो है, संग तेरे जीवन महकाना

रविवार, 3 मई 2015

प्यार की परिभाषा

प्यार एक जज्बा है
प्यार एक हुनर है
जो बंधन में बंधे वो डोर ही प्यार है
प्यार से बनते है रिश्ते हजार
इसमें रंगो की लय, नाजुक भय
इक आकर है जो परमात्मा है
उसका एक अंश प्यार है
दो दिलो में पलने वाला मासूम इजहार है
इसमें बंधा अलग जज्बा ही सब को स्वीकार है
कहता है हर पल, झरना, पवन, चमन सब में बसा
अनमोल उपहार है
प्यार को जितना फैलाये
उतना फैले, ऐसा व्यापार है
इसमें ना होता धोखा, ना घाटा
ऐसा व्यवहार है
जीवन प्यार ना होता
जीवन बेजान मूर्त समान है
प्यार का तो आकार निराकार है
प्यार सब के दिलों में
इसका अलग ही आकार है जो
रचा कण कण में
जिसमे है एक ठंडा एहसास वो प्यार है
सकूँ पहुंचाए दिलो को, करता एक दूजे को बेकरार है
फिर भुला बैर को
'कहो न प्यार है'

ये पंक्तिया आठवी कक्षा में लिखी थी शायद अच्छी नहीं पर उस वक़्त के दिमाग से बहुत सटीक है

शनिवार, 2 मई 2015

बचपन में ठूँठे आम से जो दिल लगाया

ठूँठे आम से दोस्ती कर ली बचपन में
सोचा था की, इसका भी वक़्त आएगा
कुछ नयी कोंपलों से, आँगन खिल जायेगा

सींचती रही में उसे अपने त्याग और बलिदान से
बूँद बूँद कर बहाया, पसीना अपना निचोड़ दिया
उस ठूँठे आम की खातिर, रसीला जग छोड़ दिया

हर मौसम उसका इन्तजार करती थी भूखी प्यासी
वो हर वक़्त बेरुखी और नीरसता भरा जीवन लाया
मेने अपने बचपन के प्यार से, इस कदर धोखा खाया

आज खोखली हो गयी है ठूंठे आम की असलियत भी
भरा था दीमक से जो, बस छलावा जो है दिखाया
अब ना भेद सकेगा ह्रदय, अपना और पराया

अब तो ठूँठे आम संग या तो अरमान जलाउंगी
हो सका तो, अकेले ही जीवन पथ पर कदम उठाऊंगी
बस रहम कर देना , एक तुम ठूँठे आम
ना करना मुझे किसी गली मोहल्ले बदनाम

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

मुश्किल से संभाला इस बेकाबू दिल को (=>

धड़कन थाम बैठा था आज
जब जब वो आये थे मेरे पास
मुश्किल से संभाला इस बेकाबू दिल को

वो अठखेलियाँ खेलता रहा मेरे जिस्म और जान से
में बूत सा बना रहा, अनजान था अपनी ही पहचान से
उनके थिरकते होंठो  की कशिश से
मुश्किल से संभाला इस बेकाबू दिल को

सांस तो उनकी भी उखड़ी होगी
या मेरा ही सीना गले तक आ गया
उसके बिखरें बालो का बादल
मेरे नैना को बरसा गया
मुश्किल से संभाला इस बेकाबू दिल को

मेरी मासूमियत तो देखो
दिल की बातें हंसी में टाल जाता हूँ
वो समझते है हम समझते नहीं
वो क्या जाने जज्बातों की बिसात
मुश्किल से संभाला इस बेकाबू दिल को

#हो सके तो रब्बा ये दौर फिर ना आये
मेरा संभला हुआ दिल कहीं गिर ना जाए
में कोई सन्यासी नहीं, जो हर वार तोड़ दूं
हुस्न के निशाने पर, अक्स ना छोड़ दूं

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

चंद रोज की ज़िन्दगी मौत की गोद समा गयी

चंद रोज की ज़िन्दगी मौत की गोद समा गयी
आज फैली हुयी ख्वाहिशे, एक सफ़ेद चादर में आ गयी
कोई काल की गति उसके सपनो को भी संग खा गयी
चंद रोज की ज़िन्दगी मौत की गोद समा गयी

चल रहा था वो लड़खड़ाते हुए, जमाने का बोझ डाले कंधो पर
आज उसके कंधो को भी चैन आ गया,
मौत के साथ ज़िन्दगी के बोझ निपटा गया

चंद रोज की ज़िन्दगी मौत की गोद समा गयी
चंद रोज की ज़िन्दगी मौत की गोद समा गयी

रविवार, 26 अप्रैल 2015

अंतर्मन में उलझ गया हूँ में

जो तस्वीर है तुम्हारी
बस गयी मेरी रूह में
कह सकता हूँ नहीं
रह सकता भी हूँ नहीं

अंतर्मन में उलझ गया हूँ में

तेरे नयन मुझ से अक्सर सवाल करते है
मेरे नयन है कि पलट कर कहने से डरते है
तू नैन मिला भी ले तो नजरें झुक जाती है
पल भर को तो साँसे आहें भर भर रह जाती है

अंतर्मन में उलझ गया हूँ में

शीशे सा दिल है मेरा, कैसे इसे चोर बनाऊ
कभी खुद से, तो कभी इस बैरी जग से छुपाऊ
रह रह उठती है लपटें, जो मेरे सीने में
कैसे, कब और क्यों में सब को दिखाऊ

अंतर्मन में उलझ गया हूँ में

दो घडी को मान भी जाए अगर दिल मेरा
जग की बातें, घायल कर जाती है इरादें
वो भी है कि, पल पल को शोलो सा बदलता है
अब इन अंगारो को सीने , कैसे में लगा लूँ

अंतर्मन में उलझ गया हूँ में

मेरा जिया है एक जो पल पल जलता सा है
उसका तो बस, हर वार मुझे छलता सा है
गवाही है मेरे दिल की, हर पन्ना देगा तुम्हें

अंतर्मन में उलझ गया हूँ में
अंतर्मन में उलझ गया हूँ में

# मैं कोई सितारा नहीं जो तुझे रोशन कर दूं
    उजड़े स तेरे इस दिल में, कैसे उम्मीदें भर दूं
   हो सजे तो समझ जाना, मेरी मजबूरियां
   मेरे दिल की नहीं, जालिम समाज की है ये दूरियां

सहस्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में, किसी प्यासे का सहारा हूँ में

उदगम पावन और निश्छल
शास्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में,
किसी प्यासे का सहारा हूँ में

बढ़ी थी एक अमृत बूँद बन
जग की प्यास मिटाने को
ज्यों ही देखा, रवैया जग का
अमृत को जहर बना दिया
जिसने पिया उसको जला दिया

सहस्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में, किसी प्यासे का सहारा हूँ में साफ़ स्वस्थ बूँद से, मलिन मिलता रहा
मुश्क़िल मे उसका अस्तित्व हो गया
पावन था मन जिसका, मलिनता में खो गया

सहस्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में, किसी प्यासे का सहारा हूँ में किसी ने अपना पाप है धोने को मेरा आँचल पाया
कोई मिट कर , मेरी लहरो सी गोद में समाया
मेरे अक्स का दर्द मगर किसी के जहन ना आया

शास्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में, किसी प्यासे का सहारा हूँ में

ख्वाहिश मेरी, मेरी साँसे लौटा दे ओह रब्ब के बन्दे
छोड़ दे जो, मेरे सहारे है , तेरे बेवजह के धंधे
तू तो कारोबारी हो गया, मेरा जल भिखारी हो गया
तू चैन से सो गया, मेर प्यासे का धर्म भी कहीं खो गया

सहस्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में, किसी प्यासे का सहारा हूँ में तेरी कबरगाह नहीं, ज़िन्दगी का सरमाया हूँ में
बोझिल न कर तू मुझे, जीवनदायनी स्वरुप है मेरा
हुआ जो अंधकारमय अस्तित्व मेरा, जाने कब हो सवेरा

सहस्त्रधाराओ में एक धारा हूँ में, किसी प्यासे का सहारा हूँ में

# एक दिन कहाँ जाएगा
जब मीठा जल कड़वा हो जाएगा
वो प्रलय भरा समय, गर सोचा ना
तो जल्द सब का जीवन मिटाएगा

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

कागज की तरह मोड़ जाते हो कुछ लिखते हो और छोड़ जाते हो

कुछ लिखते हो और छोड़ जाते हो
कागज की तरह मोड़ जाते हो

संभाले नहीं थे, जो सपने संग थे संजॉय
हाथ में हाथ लिए बढ़ने से पहले
कागज की तरह मोड़ जाते हो
कुछ लिखते हो और छोड़ जाते हो

आंसुओ से भरी थी मेरी ज़िन्दगी
तुम जो दो पल की खुशिया लेकर आये
खुशिया जीने से पहले
कागज की तरह मोड़ जाते हो
कुछ लिखते हो और छोड़ जाते हो

अनजाने से हुयी गलती तो ना थी में तुम्हारी
जो भी तय थी संग की बातें थी सारी
बातों के समझने से पहले
कागज की तरह मोड़ जाते हो
कुछ लिखते हो और छोड़ जाते हो

इतना बेखबर ना बन ए ज़ालिम
ज़िन्दगी अभी बाकी है मेरी
नई शुरुवात करने से पहले
कागज की तरह मोड़ जाते हो
कुछ लिखते हो और छोड़ जाते हो

#सांसो से बांधे थे जो लम्हें
यूँ कैसे तुम तोड़ जाओगे
मुझे से तो जी चुराया तो सही
रब्ब से कैसे नजरें मिलाओगे
एक दिन फिर तड़पते हुए
खुद की नजरों से भी गिर जाओगे

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई

सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई
हर कली, मंद मंद है मुस्काई
फूलो ने भी पलकें छपकाइ

सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई
हर जीव, निकला दाना पानी कमाने को
कुछ सपनो को अपना बनाने को

सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई
मोहब्बत की छटा है बिखर आई
फसलों ने भी ली है अंगड़ाई

सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई
हर जीवन ने अपनी गाडी दौड़ाई
किसी की आलस तो किसी की तेजी लाइ
सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई
सुबह जो आई , संग नए उद्देशय है लाई

कुछ नहो हो सकता हैवानो का


आज फिर शिकार हुआ उनके निशानों का
कुछ नहो हो सकता हैवानो का

इंसान फिर भी सवेदनशील होता है
हैवान तो सिर्फ हैवान ही होता है

मेरा दिल बेशक उनके कहे से रोता है
पर हैवानो पर कहाँ कोई असर होता है

ओह रब्बा॥ मुझे ना उन जैसा हैवान बनाना

वैसे ये बातें लिखना अच्छी बात नहीं
पर मुझे अंतर्मन के शुद्धिकरण के लिए लिखना पड़ता है॥

मॉफी इस करम की ए भगवन॥

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

दोहरापन विचारों का

लिखने का मन नहीं कर रहा पर लिखा नहीं तो नस नस में लावा बन दौड़ रहे खून के दौर को कम नहीं किया तो शायद नसें फट जाए।

अब बात आई की ऐसा हुआ क्या?

हुआ कुछ नहीं एक दोस्त(?) ने बहुत कुछ ज्ञान बांटा मुझे और फिर कहा ये तो कोई ख़ास बात नहीं।
पहले उस दोस्त के विचारो पर नजर डाले
उनके अनुसार महिलाओ को सम्मान मिलना चाहिए महिलाये पुरुषो से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं॥
जी बिलकुल, उत्तम विचार हम समर्थन करते है
अब उनके आज के नए विचार सुनिए
उनका मानना है गाँव में रहने वाले समुदाय सकीर्ण विचार व् शहरी समुदाय जैसे सवेदनशील नहीं होते॥
अनपढ़ और जाहिल होने के साथ वो लोग सवेदनहींन होते है। जबकि शहर के लोग पढ़े लिखे, सुशील और संस्कारी होते है।

अब मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि जो व्यक्ति समुदाय, धर्म एवम् रंग से इंसान में भेद करे वो खुद को संस्कारी और सुशील बताये तो आप् क्या समझें॥

अब समझ समझ की बात है और में किसी की समझ को नहीं बदल सकता ॥ इंद्री sdm दफ्तर में एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझ से दुर्व्यवहार किया था जिसके बारें मेने उपमंडल अधिकारी को शिकायत की थी तब उन्होंने एक जवाब दिया था
"विकास में आप को ठीक कर सकता हूँ या खुद को ठीक कर सकता हूँ पर एक बूढ़े दिमाग को ठीक नहीं कर सकता"

मतलब अगर हम अपने दिमाग सोच को एक धुरी पर टिका लेते है उनका कुछ नहीं हो सकता॥ अगर किसी समुदाय में सब अच्छे होते तब इस समाज में कोई विकृति होती ही नहीं। और सब बुरे होते तो कोई संगति भी नहीं होती।

देखिये में खुद उनकी बातों से इतना बुरा आहत हुआ कि खुद के धैर्य से रहने की बजाये एक दो विषय पर उलझ गया जबकि मेरी प्रकृति सुनने की है। पलट कर जवाब देना मुझे शोभा नहीं देता।। मेरी रब्ब से एक ही प्रार्थना है मुझे सन्मति प्रदान करें।। ताकि में किसी का भी अहित ना कर सकुं।। बाकि कोई जैसा भी हो उसकी प्रकृति उसके सिवा और कोई नहीं बदल सकता।।
बहुत कुछ लिखना था पर ओम चोपड़ा से मेरा फ़ोन रखना बर्दाश्त नहीं हो रहा॥

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

फूहड़ गाना:- ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

सुबह शाम मेरी हालत हुयी क्रिटिकल
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

बिना तेरे मौसम भी नही लगता ओवेसम औवेसम
मुझे तो खालिश करता है बारिश का मौसम
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

सांसो का भी हुआ जाता है ब्रेकअप ब्रेकअप
पर तू है की नजर आता तुझे मेकअप मेकअप

ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

वनीला, स्ट्रॉबेरी और जाने कितने फ्लेवर में तेरे लिए लाया
अक्सर मेने फाइव स्टार में , तुझको लंच करवाया

ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

स्वीट बन जा ब्यूटीफुल
लाइफ हुयी क्रिटिकल
ओह ब्यूटीफुल तू है मेरे लिए फ्रुईटीफुल

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

कुछ इस तरह जूझती ज़िन्दगी एक बड़े हस्पताल में

6 बाय 3 का बिस्तर पर
एक 5 फ़ीट का बूढ़ा कंकाल
दमा और दम, दोनों है बेहाल
कुछ इस तरह जूझती ज़िन्दगी
एक बड़े हस्पताल में

जान फुंकती है कुछ दवा के नाम का जहर
पल दो पल की देरी, फिर वो ही बुरा हाल
मरीज के परिवार को भी , जी का जंजाल
कुछ इस तरह जूझती ज़िन्दगी
एक बड़े हस्पताल में

पूछे कोई बीमारी के नाम पर, चार सुनहरे नाम
इन्फेक्शन, टाइफाइड, मलेरिया और निमोनिया
मालूम हो कर भी, ना कोई होश ना कोई आराम
कुछ इस तरह जूझती ज़िन्दगी
एक बड़े हस्पताल में

मेरे घर की रोटी चलती रहे,
बेशक किसी की हड्डिया जलती रहे
बीमारियां यूँ ही, जिस्म में पलती रहे
कोर्स है मेरा चार दिन का, पांचवे दिन की गारन्टी नहीं
पूरी फीस के सिवा, मरीज की लाइबलिटी नहीं
कुछ इस तरह जूझती ज़िन्दगी
एक बड़े हस्पताल में

चंद साँसे ले, कोई चला जाएगा
फिर क्या हुआ, कोई चला गया
कल और कोई संभल ना पायेगा
फिर चलता हुआ, एक शख्स आएगा
मेरा धंधा फिर से चमक जाएगा
कुछ इस तरह जूझती ज़िन्दगी
एक बड़े हस्पताल में

# कारोबार जरूरी है पर दूसरे के जिस्म का ठीक नहीं
   धंधा वेश्या भी करती है, ज़िन्दगी लेने से वो भी डरती है
   कब तक चिताओ पर , यूँ रोटिया बना कर खायेगा
   एक दिन खुद तू भी, इस अग्नि में भस्म पायेगा
   बाकि सिर्फ इस जहाँ में, तेरा गुनाह किसी को रुलाएगा।।
 
नोट:- एक दोस्त के पिता को पिछले एक महीने में डॉक्टर को चार बार दिखाया, हर बार नया मर्ज बताया॥ पर कभी उसका इलाज ना हो पाया।। इस सन्दर्भ प्रस्तुत है ये ब्लॉग।। 

आदत हो गयी उनको अब मेरे दिए दर्द सहने की

आदत हो गयी उनको अब मेरे दिए दर्द सहने की
जरुरत बाकी नहीं रही, कोई लफ्ज़ कहने की

दर्द का घूँट पीकर, गला उसका भर आता है
कुछ आँखों के सहारे तो कुछ सिसकियों से
वो अपना गम ए इजहार कर जाते है
आदत हो गयी उनको अब मेरे दिए दर्द सहने की

फ़लसफ़ा समझ से बाहर है उनकी भी और मेरे भी
क्यों घट जाता है जो, दिल ए इनकार होता है
यहाँ नफरत का मतलब भी, ढेर सा प्यार होता है
आदत हो गयी उनको अब मेरे दिए दर्द सहने की

घंटो का उनका इन्तजार, तन्हा दिल का खुमार
आता है जब वो तो, प्यार भी उमड़े बेशुमार
बस एक इन होंठो से, जाहिर नहीं होता इकरार
आदत हो गयी उनको अब मेरे दिए दर्द सहने की

उम्र गुजर जाती है, एक रिश्ता जोड़ने को
एक लम्हा भारी होता है, दिल तोड़ने को
में बेवजह यूँ, कभी कोई तक़रार नहीं करता
आदत हो गयी उको अब मेरे दिए दर्द सहने की

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

नाकाबिल हूँ में अपना दर्द बताने में
होंसला नहीं । ख्वाहिश जताने में
कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

अर्ज लिखने को दिल करता है
तो मर्ज आड़े आ जाता है
मर्ज़ जाहिर करता हूँ
कोई अर्ज लगा बैठता है
कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

खामियां नजर आती है उनको मेरे शुकराने में
ढूंढते है कसीदे, मेरे थोडा मुस्कराने में
नजर ना आया उनसे हंसीन दोस्त ज़माने में
कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

सुबह उनका नजाकत से वो सलाम
मिलता है मेरी रूह को, सकूँ सा आराम
सुनकर उनके होंठो पर, नाचीज का नाम
कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

पसंद आते ना हो उनको बेशक शब्द हमारें
पर खूब लूटते है हमारी आँखों से वो नजारें
बस एक तलाश होती कि कब हम उनको पुकारें
कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

मेरी नादानियों को अर्ज समझना
हो सके तो मर्ज समझ ना दिल से लगाना
हो कोई शिकवा भी अगर तुम्हें मेरे दोस्त
रूठ जाना, मगर दोस्त को ना ठुकराना
कोई अर्ज पूछे तो कोई मर्ज़

बुझ गया मेरा मन

जब से उनसे हुयी अनबन
बुझ गया मेरा मन

बोझिल सी नजरें मेरी
उसको निहारती है
उसकी नज़रें जाने
किसको पुकारती है

हक़ जताना मुझे आता नहीं
मायूसी का चेहरा उसे भाता नहीं
वो हवाओ से बातें करता है
मेरा दिल जमीं पर ही चला करता है

वो बारिश की बूंदों सा मुझे घायल करता है
मेरा हाल उस ज़ख़्मी सा जो मरहम से भी डरता है

जारी है मेरे दिल का बैठ जाना
उनका मुस्करा कर निकल जाना
तन्हाइयो में उनके नाम से
सिसकियां निकल जाना

कोई लब से झूठा कर देता है उनका नाम
जाने क्यों बदन मेरा , जल जाता है

बहुत बेताबी है मेरे, अक्स को खबर भी नहीं
जो फैलता है मेरी रूह, कोई ज़हर तो नहीं

मीठा है उनका, दिल को बहलाना
सुर्ख बढ़ा है, नजरों से ओझल हो जाना

में पल पल उसकी राह ताकता हूँ
वो है कि ..................

राहें बदल जाता है

मेरी साँसों के तार

मेरी साँसों के तार
कुछ तो उधार दें
खुद पर नहीं
मेरी ज़िन्दगी पर वार दे

मेरी साँसों के तार

बाँध तू बैठा कितने चैन और सकूँ से
में बिन पर पंछी सा, उड़ान भरता हूँ
हर लम्हा, हर योजन, याद करता हूँ

मेरी साँसों के तार

जोड़ दे गर तू खुद की साँसों से
बुझते चिलमन में जान फूंक दें
जहाँ हो प्यार की बारिश
पोखर कभी नहीं सूखते है

मेरे साँसों के तार

झिलमिल ना हो तू मेरे सितारे
तेरे लिए जाने कितने हीरे मोती है वारे
साहा भी तेरे तों बगैर
साँप नेवले का बैर

मेरी साँसों के तार

अपनी सीने से उतार ले
कीमत ना सही उधार ले
पर मेरे उजड़े चमन को
अपनी बगिया सा संवार ले

#मेरी साँसों के तार, तेरी साँसों से मिला दें॥
   इस अँधेरे दिल को भी तू जगमग सा बना दे॥

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

जमकर बरसा हूँ आज

में अक्सर इतना बुरा नहीं होता
जितना आज हुआ हूँ
शायद ज़िन्दगी में इतनी दुविधा के कारन ऐसा हुआ
पूरी ज़िन्दगी मेने ऐसा करम आज तक नहीं किया
जो आज किया, जितना जहर था सीने में उतार डाला
बहुत तक़लीफ़ थी इसलिए
या आप ये भी कह सकते हो
बहुत कमजोर हूँ इसलिए
मुझे खुद उम्मीद नहीं थी
में इस कदर कर जाऊंगा
जो सुलझाता था ज़िन्दगी औरो की
खुद उलझ गया है इस अंधे संसार में
मुझे उन सब से क्षमा की जरुरत है
जिन सब को मुझ से ढेर सारी उम्मीदें है

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

हस्पताल:-जिन्दा लाशों का महल

अगर आप समझते है की दुनिया में कोई दुःख दर्द नहीं है। सब स्वर्ग से संसार में ख़ुशी ख़ुशी रहते है तो आप एक बार हस्पताल देख लीजिये आप का नजरिया पूरी तरह से बदल जायेगा। यहाँ इतने दुखी है लोग आप को दुःख ही संसार नजर आएगा। हर कोई नयी पीड़ा नए ज़ख्म से परेशान है। एक दो दिन से नहीं बरसो पुराने मर्ज यहाँ मिल जायेंगे। हर उम्र हर रंग हर धर्म का मिल जायेगा।
आज बैसाखी का त्यौहार है लोग नयी फसल की खुशिया मना रहे है और ये लोग पुराने दर्द से कराह रहे है। दुःख में जीने का नजरिया बदलने के सिवा आप कोई मदद नहीं कर सकते। आप सिर्फ मूक बने रह देख सकते है शायद उस से ज्यादा दर्द आप महसूस कर रहे हो। पर आप की पीड़ा कोई नहीं जान सकता।
अभी तो 11 बजे है जाने पूरा दिन कौन से रंग दिखायेगा।।

कड़वे शब्द बोलता हूँ