रविवार, 12 अप्रैल 2015

जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की
वजन आ गया उनकी बात में

दो मीठे बोल से खरीद मुझे
बंद कर दिया अपनी तिज़ोरी
क़ीमत थी जो मेरी, उसकी आदत पुरानी
इतनी सस्ती हो जो, उसकी कीमत किसने जानी
जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

हरक़त होती मुझे तो वो कुछ मीठे बोल ले आता है
मेरी उठती आवाज को अपनी औकात दिखा जाता है
जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

मासूमियत का भी क्या मजाक है उसने बनाया
हर जर्रे को कर्ज़दार बना, खुद का नाम चमकाया
जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

हंसी को मेरी, है जब से उसने चुराया
मेरा रोने का अधिकार भी है लुटाया
जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

नस नस मेरी को, इतना है कमज़ोर किया
हर छोटी बात पर, धड़कता है मोरा जिया
जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

हैरान होते है लोग भी मेरे इस दाम पर
हँसते है कुछ इस तरह वो भी मेरे नाम पर
जब से वो जान गए कीमत मेरे जज्बातों की

#इल्तजा है तुझ से किसी और के ना ये दाम लगाना
जीते जी ना किसी शख्स को, मोहब्बत का गुलाम बनाना

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

बारिश॥बर्बादी॥बर्बरता॥

रोज की ये बारिश की बर्बरता सिर्फ बर्बादी के सिवा कुछ नहीं दे सकती। इसने साबित कर दिया की आवशयकता से अधिक कोई भी वस्तु हो जीवन में बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं दे सकती।

किसान रब्ब को निहारता है तो कभी अपनी फसल को
उसके पास 6 महीने की म्हणत को पानी में बहा दिया इस बेरहम कुदरत ने,

रोटी को मोहताज हो गया वो किसान
जिसने तुम्हारे घर भरे धन्य धान
कुछ तो सोच उस बारे ए इंसान

बदलती फ़िज़ा ने शिकंज बढ़ा दी मस्तक की
इस बरस और दो चार झुर्रियां पढ़ गयी

दाना दाना लूट रहा है मेरी बगिया का
कोई पगड़ी संभालता तो कोई डबड़ी

गाडी घोडा तो दूर की बात है
किसान का तो हर दिन अँधेरी रात है

चमक देखि बस उजड़े खलिहानों में
या फिर आसमां के गरजते बादलों में

दर्द मेरा कोई सुन कर नहीं जाता
बस हँसता है और मुस्कराता है

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं।।

हर कोई तांक जाता है
जो देखे वो ही झाँक जाता है
क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं

लाचारी और बेबसी का कोई ठिकाना नहीं
जिसे देखो हर पांचवे के पास आशियाना नहीं
गरीबी का बेशक कोई पैमाना, नहीं पर में हूँ
क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं

अस्मत मेरी खुलेआम , बेआबरू हो जाती है
राह चलते को नीलामी की वस्तु नजर आती है
पर्दा में करू किस किस हैवान से
क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं

कह खुश हो जाता है मोरा जिया
सारा जहाँ मेरा आँगन है कोई सीमा जो नहीं
पर कोई भी दुतकार दुत्कार चला जाता है
क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं

रोती अंखिया अक्सर, सितारों के नीचे
जो घूर जाता था भरी दोपहर
आंसू उसे नजर आते नहीं
एक जानवर है जो पास आने पर घबराते नहीं
क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं

लाज शर्म मुझे भी आती है
आबरू मेरी भी घबराती है
अँखिया ज़माने की मुझे नोच खाती है
क्योंकि मेरे आँगन को चारदीवारी नहीं

मौका मौका मौका

हर कोई इस मौके की तालाश में रहता है कि कब कैसे किस का तमाशा बनाया जा सके। ये किसी एक की समस्या नहीं अधिकतर भारतीयो को दुसरो का मजाक बनाने में ख़ुशी मिलती है जब खुद पर बात आये तब उन्हें सारी दुनिया बुरी नजर आती है।

अब आजकल सारा दफ्तर जाने क्यों मेरे पीछे पड़ा हुआ है सारा दिन अनर्गल बातें बनाते है मेरे बारे में, जैसे मेने उन लोगो का कुछ चुरा लिया हो। ऐसा हाल जो लोग कल तक आप के शुभचिंतक थे आज आप को हर वक़्त ताने मारते नजर आएंगे।

बहुत कोशिश करता हूँ सब की बातों को अनसुना करने की आखिर दिल तो दिल है कहीं ना कहीं तो टीस उठ ही जाती है। मेरी सबसे बड़ी खामी जल्दी विश्वास करना है और आजकल ज़माने में कोई विश्वास के लायक रहा ही ना हो। मेरा तो इस जन्म में कुछ नहीं हो सकता, ना में अपनी प्रकृति बदल सकता हूँ और ना दुनिया को।

सिवाए यूँ लिख कर जहर निकालने के सिवा कोई विक्लप नहीं बचता।

मेरी दफ्तर के सभी दोस्तों से विनती है, मेरी तरफ यूँ गुनाह भरी नजरो से ना देखे में कोई गुनहगार नहीं।।

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

चल पड़े पिया संग पतंग बनके

निकले थे वो आज बन ठन के
चल पड़े पिया संग पतंग बनके

डोर से बंधी थी साँसे उनकी
चमक उठी थी आज कानो की झुमकी

रास्ते भी रुक गए थे उनके आज
भूल बैठे ये दुनिया और समाज
चल पड़े पिया संग पतंग बनके

मंद मंद चलते हुए भी पाज़ेब है खनके
सोना सा चमक उठ, गले के मणके
सोने यार दे नाल, चूड़िया भी खनके
चल पड़े पिया संग पतंग बनके

मिट गयी जो थी बरसो की दूरियाँ
खत्म हो गयी है आज मजबूरियां
आँखों का काजल भी है दमके
चल पड़े पिया संग पतंग बनके

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

गुनाहगार बन गया हूँ में तेरा

आज कुछ इस कदर हुआ है हशर मेरा
गुनाहगार बन गया हूँ तेरा

लफ़ज़ छोटे पड़ गए , तेरे ज़ख्मो के आगे
चीख बन शोर, सीने को चीर जाता है
अधीर् हुआ जाता है मन मेरा
गुनाहगार बन गया हूँ तेरा

माफ़ी नहीं कोई हिंसक प्रहार की
कुदरत कायदों में भी सुनवाई  नहीं गुहार की
मेरे कर्मो से , किसी को मिला जो आज अँधेरा
गुनाहगार बन गया हूँ तेरा

समाज ने भी उड़ाई, इस कृत्य की जो खिल्ली
आस पड़ोस सब की नजर, कचोट रही थी मुझको
गुनाहगार बन गया हूँ तेरा

कोई पहली बार ना था जो माफ़ हो जाता
मेरा खुद का जमीर, मुझे है खा रहा जो
गुनाहगार बन गया हूँ तेरा

रब्बा तूने क्यों मेरा, ह्रदय पत्थर सा है बनाया
मेरा मन, फूलो की कोमलता समझ ना पाया
जाने अनजाने , नफ़रत ना आ मुझे है घेरा
गुनाहगार बन गया हूँ तेरा

# शुक्रिया सहकर्मियों एहसास जो दिलाते हो तुम
    मेरे बुरे कर्मो को, अच्छे से आइना दिखाते हो तुम

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है

हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है
मेरे कोरे दामन पर, कुछ दाग छिड़क जाती है

नसीब तो देखो इस बदनसीब दामन का
सीरत मेरी, फिर उजला कर जाती है
हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है

जितना रहो दूर, इन समाज के धब्बों से
ये मुड़ मुड़ कर आते है दामन भिगो जाते है
हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है

नफरत का दौर इस जहन में, ये कड़वाहट लाती है
मेरी पीठ थपथपा कर, हैसियत मेरी दांव लगाते है
हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है

मेरी भली सी ज़िंदगी, बुराई घोल दी जाती है
हँसते चेहरे पर, उदासी पोत दी जाती है
हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है

किसी अपने दोस्त के द्वारा, आप की चादर मैली की जाती है
हर रोज ज़िन्दगी वो ही कहानी दोहराती है

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

रॉय:- एक लेखक की कहानी

ऐसा शायद पहली बार हुआ फ़िल्म पूरी नहीं देखि और में इस बारे लिखने लगा। क्योंकि जिस विषय पर ये कहानी है वो आप शायद ही समझे। हर कोई इसे एक लव स्टोरी की तरह देखेगा। पर उस से कुछ अलग है।

जो शख्स टूटा हुआ होता है वो सदा इस तरह का व्यवहार करता है यकीं मानिए मेरे अंदर इतनी हिम्मत नहीं की में इस फ़िल्म का अंत देख सकूँ।।

शायद ये दुनिया का ही सच है और हर कोई इस से भागता है।।

scene# दूर जाने की नसीहत दे जाते हो मेरे सीने से गुजर कर

कितना आसान है नसीहत देकर चले जाना पर इंसान बनाया उस कुदरत ने और उम्मीद करते है की भावनाओ को काबू रखो और आरजू को दफ़न कर दो। यानि ज़िन्दगी बेजुबान जानवर की तरह गुजार दो।

सदियो सी लंबी दूरी लग रही इस कहानी की मुझे, हर किरदार मेरी तक़दीर से खेल रहा हो जैसे।

#कोई चुराता है ताज तो कोई तिजोरी
   मेरी जींद/दिल कौन सा खजाना था
   जो तूने अपना बना लिया

ये ख़ामोशी जो अक्सर मेरे हिस्से आकर मुझे किसी नए सफ़र पर ले जाती है वो शायद आज किसी और के हिस्से भी आ रही है

पिक्चर तो अभी बाक़ी , मेरे होंसले मूक गए

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

चुनता नहीं कांटें फिर भी ज़ख़्मी हूँ

चुनता नहीं कांटें फिर भी ज़ख़्मी हूँ

जब भी कोई फूल पसंद आया
साथ में कांटो का ताज पाया
नब्ज में भरना चाहा मोहब्बत का रंग
तो भी हिस्से नफ़रत का सैलाब आया

ख़ामोशी से सहन किया हर ज़ख़्म ज़माने का
फिर भी बदनाम हुआ बुज़दिल के नाम से
सिखाने चला था दुनिया को, इंसानियत
खुद को हैवानियत सीखा, चला आया

मेरे कुछ है अपने, जो खंजर छुपाये बैठे है
मौका लगते ही सीने से गुजार देते है

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

बेबस क्यों है दिल मेरा

मौजे और भी है जमाने भर की
मेरा दिल क्यों गम ए मोहब्बत
के आगे बेबस सा हो जाता है

कोई निशान नहीं रखता में दर्द के
मुस्कान सी रखता हूँ छुपाने को
मगर कोई इन आँखों से झाँक लेता है
मेरे दर्द भरे इस दिल को भांप लेता है

शौक हो गया अब तो दर्द में जीने का
खुशियो को देख अचानक घबराते है
ज्यों ज्यों गम आते हम फिर मुस्कराते

नफ़रत मेरी तेरी नादानियां

उनको शिकायत रहती हम से क्यों नफरत करते हो
मोहब्बत आती नहीं कि किसी का होने से डरते हो

खवाब जब आँखों से देख लेते हो तुम
फिर क्यों, खुशिया अपनाते नहीं
कदम ज़िन्दगी हर रोज बढाती नहीं
मोहब्बत हर रोज हमे बुलाती नहीं

/

क्यों नादानी भरी बातें करते हो
आग से खेलने को कहते हो
खुद तो दूर दूर रहते हो
हमे क़दम बढ़ाने को कहते हो

खुशियां महसूस अब होती नहीं
जब से अँखियाँ भी रोटी नहीं
तू बेशक अरमान को हवा दें
पर अब हसरत की ख़्वाहिश होती नहीं

सोमवार, 30 मार्च 2015

लेखक गैर जिम्मेदार

बहुत ही गैर जिम्मेदार होता है लेखक
वो अपनी बात कागज पर उतार देता है
पर जो भी पढता है उसका दर्द उधार लेता है

उसकी उदासी किसी और चेहरे को उदास कर जाती है
वो तो गुबार निकाल मुस्करा जाता है
कोई और लिखे से घबरा जाता है

उसके हर संस्करण से किसी के अरमान झलक जाते है
कोई ना कोई चेहरा, उसकी लपटो में आ ही जाता है

शायद इसीलिए वक़्त दर वक़्त लेखक के सम्मान की समाज में हानि हुयी है।। पहले लेखक को जितने सम्मानपूर्वक देखा जाता था उतना अब नहीं रहा।।

मुझे भी सुधार की आवशयकता है मुझे करना होगा की अपने अंदर के जहरीले तत्व समाहित कर सिर्फ अच्छी बातें प्रवाहित करू।। ऐसा संकल्प लेना मुश्किल है पर में भरसक पर्यत्न
करूँगा।।

सुप्रभात।।

अरमानो की बहती धारा

मुश्किल हुआ रोकना उन कदमो को
जो बहक चले थे हवा के ठन्डे झोंको से

बरसती बूंदों से भीग गया था मन मेरा
ठिठुरते मौसम से, ठण्ड हुआ था तन मेरा

धड़कते इस दिल को बहुत था समझाया
इस रास्ते पर सिवा गम किसी ने कुछ ना पाया

इस जानलेवा इश्क़ ने हर दिल को है रुलाया
मोहब्बत का हर लम्हा, दर्द ए गम से है चुकाया

अभी वक़्त है संभल जा क्यों मचलता है
ये इश्क़ है हवा के झोके से ही बदलता है
ठंडी हवा थी जो ये अग्नि बन जल उठा

शुकराना है उस रब्ब को, जिसने मुझे कमजोर बनाया
मैंने अपने अरमानो को, अक्सर है दुनिया से छुपाया

लौट आना उन राहों से आसान नहीं होता
कुछ लम्हें तो दिल भी भर भर कर यूँ रोता

आज सा दिन , ए ज़िन्दगी दोबारा ना लाना
मेरे अरमानो को उन्माद के शिखर से बचाना

रविवार, 29 मार्च 2015

ये शाम सुहानी, खो गया पुरानी यादों में

ज़िन्दगी छूट गयी कही
दस्तावेजो को बनाने में
भूल गया हूँ शायद
ये शाम सुहानी
वो बरसाती पानी
बुजर्गो के किस्से कहानी
मिटटी में सन कर जाना
कुम्हार के चक्के को घुमाना
लुक्का छुपी में घंटो छुप जाना
बंद कमरो में मकड़ी का ताना बाना
धूल से सन्ने किताबो को ढूंढ कर लाना
कहीं से कमीज़ का उधेड़ जाना
मास्टर के नामो की खिल्ली उड़ाना
नयी डाल पर, पंछी का चहचाना
मक्के के खेत से कोवे को उड़ाना
कच्ची अम्बिया तोड़ कर खाना
दूकान से इमली का टार मंगाना
बुरी नजर वाले को देख
सात बार थूक कर आना
डोंगे वाले बाबा को राम राम
कहकर वो रोज का चिढ़ाना
मंदिर की सीढ़ियों पर चप्पल बदल जाना
वो मौजो से बड़ी जोर की बदबू आना
सुबह उठते ही चिल्लाना
स्कूल में बिजली ना होने के बहाने बनाना
झूठ कह कर मास्टर जी को धीरे से मुस्काना
बोर्ड की परीक्षा में दूर कहीं साईकिल पर जाना
पंक्चर साइकिल को घसीट कर लाना
चार आना और आठ आना का हिसाब लगाना
किसी दिन शक्कर न मिलने पर रूठ जाना
छुपके से मलाई चुरा कर खाना
मेले में जाकर देर से लौट कर आना
खिलोनो की जगह, टूटी ईंट से काम चलाना
हर दिन का नया दिन और नया बहाना
कैसे भूल गया वो दिन सुहाने
ये शाम सुहानी
फिर ले आई याद पुरानी

शनिवार, 28 मार्च 2015

आज के दौर में अच्छे लोग किसी के काम के नहीं

मेरी बातें बेमतलब लगती हो चाहे ज़माने को मगर वक़्त बे वक़्त जीवन में उनको मेरी बातों के मायने समझ आ ही जाते है।। पहले अनुभव में लोग मुझे पागल से कम नहीं समझते।। पर धीरे धीरे जब वो मेरी जड़ो की और बढ़ते है एक कशिश सी खिंचती है क्योंकि में जो लिखता या कहता हूँ वो मेने जिया है यूँ ही कल्पनाओ के सागर से कोई लहर नहीं उठाता जो किसी दिल को छु जाए।

चलो खैर आज बात है अच्छे लोगो की क्या उनकी हैसियत रह गयी है समाज में
शून्य।।

जी बिलकुल सही कह रहा हूँ।
शून्य।।

यकीन नहीं आता एक बार दिल पर हाथ रखिये और कहिये कोई ऐसा काम नहीं किया आप ने जो आप के जमीर को गंवारा ना हो और आप को करना न पड़ा हो।। और जो ना करे उसे नाकारा इत्यादि पुरस्कारों से नवाज दिया जाता है।। आज के समय कमाना बहुत ही आवशयक हो गया है। और बिना जुगाड़ या गलत काम किये आप नहीं कमा सकते।। ईमानदारी के चूल्हे पर रोटिया सेकना बहुत मुश्किल हो चूका है। और जो ईमानदार नहीं उसे आप अच्छा कैसे कह सकते है।
और अच्छा व्यक्ति कभी अनैतिक तरीके से जीवन यापन की सोच भी नहीं सकता।।
और तो और ईमानदारी की नौकरी को करने में भी आप के अफसर आप से काफी गलत कार्यो की अपेक्षा रखते है। जो कि निंदनीय है। कभी किसी के हस्ताक्षर बदलना कभी कुछ कभी कुछ। और ना तो आप के पास विरोध के अधिकार होते है ना आप में इतना सामर्थ्य की आप मना कर सको।। आप का सिर्फ इतना स्वार्थ है की आप को नौकरी की आवश्यकता है।।

फिर आप सोचिये इस समाज में अच्छे लोग किसे चाहिए?

सिर्फ दो नंबरी आदमी को जरूर एक ईमानदार चाहिए उसके कमाए की रखवाली को।।

इन्तजार के पल

इन्तजार इस कदर खाता है
हर पल कुछ घटता चला जाता है

लम्हों का हिसाब लगता नहीं
हर लम्हा अरसा बन जाता है

कदमो से लगाता है वक़्त हमे
घड़िया दर घडी रुलाता है वक़्त हमे

दो पल सकूँ आ जाता
कोई अपना घर साथ निभाता
यहाँ तो खुद का भी शरीर
देख घडी हो जाता है गंभीर

आज मालूम हुआ की
अन्जान लोगो से भरा है संसार
ना उम्र का तकाजा
ना वक़्त का विचार

कैसे इन अन्जान लोगो से में बात करुँ
हर किसी के चेहरे से जाने क्यों डरु

राह ए मंजिल हो तो कट भी जाए
एक बिंदु पर कहीं सीना फट ना जाए

गुरुवार, 26 मार्च 2015

जिंदगी को संजीदा नहीं, जिन्दा दिल बना

में अपनी जिंदगी के लिए सीरियस हूँ

ये सोच हमे गर्त की और ले जाती है और लोगो के लिए हमारी ज़िन्दगी एक हंसी बन जाती है। इनको हमारी हंसी ख़ुशी से कोई मतलब नहीं होता इनका मकसद केवल स्वयं का मनोरंजन करना होता है। और हम इनकी बिना सर पैर की बात को दिल से लगा खुद के जीवन को दुभर कर देते है।।

क्यों ना खुशियो का जहाँ बनाये
दो पल खुद के संवारे
दो पल दुसरो के खुशनुमा बनाएं

कोई मेहंगी नहीं खुशिया बस थोडा सा साहस और थोड़े प्यार भरे दिल की आवश्यकता होती है।

दो ख़ुशी मुझे उधार दे
दो खुद के प्यार पे वार दें

नफ़रत का नरक ना बसा
संसार में खुशियो का फूल खिला

बुधवार, 25 मार्च 2015

एक छोटी ख्वाहिश

में सकूँ मांगता नहीं मेरा
तू सकूँ से रह ले दो पल
एक छोटी ख्वाहिश
बस मेरे वास्ते

हिंसा मुझे खा जाती है बेशक तुझ से गुजर जाती है

हिंसा का परिणाम बहुत घातक होता है
बेशक वो आप से नादानी में हुयी हो
उसके दर्द का तो अंदाजा नहीं
पर मेरा मन जिस पीड़ा से ग्रस्त हुआ
शब्द उस दर्द को जताने में असमर्थ है

अक्सर लोग बुरा समझते है जिसने हिंसा की हो
पर शायद उसका छटपटाना किसी को नजर नहीं आता

मायूसी से भर गया है मेरे ज़िन्दगी का हर पन्ना
में जीने की चाह रखता हूँ वो मौत को याद करती है

सोमवार, 23 मार्च 2015

ज़हर है जहन तेरा॥

फितूर जो पनपा तेरे जहन
वो कोई अमृत है कि जहर

किसी मासूम के दिल को कहर
तेरे लिए बस ख़ुशी का एक पहर

ज़िन्दगी लूटी जिसकी तेरे मजाक से
तेरी क्रोध की नींद न टूटी
उसकी दर्द भरी आवाज से

बदले की आग, जलाकर राख करती है
माचिस जो जलाती है
उसकी तिल्ली भी खाक करती है

मोहब्बत से भर लो, ज़िन्दगी के दिन है दो या चार
नफरत से भरा जो दिल, दुसरो की करता जिंद बेकार
खुद के जीवन में भी भर देता है सुलगते अंगार

इल्तजा खारिज कर दी तूने मेरी दोस्ती की
वादा है मुझ सा दोस्त, जीवन भर ना पायेगा
खुद के दामन को जलाकर जो
तेरे दामन की खुशिया लौटाएगा

होंठो से उफ़ ना करता है वो बेशक
दुआओ से सिर्फ तेरा ही अच्छा चाहेगा
तेरी कड़वी सुन, खुद का दिल तिलमिला हो
पर तेरे जीवन में मिठास वो भर लाएगा

क्यों अपने जहन को इस कदर चलाता है
बागीचों के रास्ते पर भी, जहर बटोर लाता है
जहाँ होती है इश्क़ की खुशबू
तू नफरत के बीज बोए जाता है

शनिवार, 21 मार्च 2015

एक villian:- दर्दनाक कहानी

वहशीपन की हद थी इस कहानी में

दर्द की इन्तहा थी इस कहानी में

में टूट टूट कर जुड़ता रहा
इसका जिक्र मुझे तोड़ता रहा
में दर्द से मुख मोड़ता रहा
पर वो ............-.--.-

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

कल हो ना हो

हम बेहतर कल की उम्मीद में अपने आज अच्छे पल को भी जी नहीं पाते।। भागदौड़ की इस दुनिया में जिसके लिए भागदौड़ करते उन्हें ही वक़्त नहीं दे पाते।।

अगर पागलो की तरह मशीन बन  जीना ही जिंदगी है तो फिर क्यों संवेदनाओ से घिरा इंसान दुखी रहता है।। मशीन की तरह ही चलते रहना हो तो मशीन सा बिंदास क्यों नहीं जीते।।

जान मेरी कोई ले ले अगर
मेरी हजार दुआए उसके सदके

घटे दिल को कैसे लिखूं
पल पल मरते सांस कैसे कहूँ

सिसकती आहें में भला कैसे भरू
पत्थर दिल से नम आँखें कैसे करुँ
हल्की सी आहट से सहमा सा में डरु
टूटते चैन को, तस्सली कैसे बख्श दूं

उड़ती नींद की अंखियो से क्या सपने बुनू
मुठी में रेत सा फिसलते लम्हों से कैसे चुनु

कोई मेरे सीने से खंजर निकाल दें
उबलते मेरे लहूँ को, कोई ठंडी आहँ ........:'(

बुधवार, 18 मार्च 2015

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Take a look at @kadwashabd's Tweet: https://twitter.com/kadwashabd/status/578189384513560576?s=09

आप से अच्छे बुरे का प्रमाण नहीं मांगता हूँ।।

दूर रहने की हिदायतें पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी क्योंकि आप एक छत के नीचे अजनबियों की तरह नहीं रह सकते। खैर छोड़िये।।

आप किसी एक व्यक्ति की परेशानी के कारण अपने जीवन के हिस्सों में घाव कर दें यह बिलकुल उचित नहीं होगा।। मेने जीवन की सार्थकता को समझने के इतने पर्यास किये है में अक्सर हर दिन से नया सबक लेने की कोशिश करता हूँ।। मेरी बातें नीरस हो सकती है पर निरर्थक नहीं है। आप जीवन को एक तो भरपूर जीने की कोशिश कीजिये।। में दिन में जाने कितने बार असहज महसूस करता हूँ।। एक दिन एक दोस्त की किसी हरकत से वो मेरे सामने असहज हो गया पर यकीन मानिए उनसे ज्यादा बुरा हाल मेरा हुआ।। मेने अपने अंतर्मन के द्वंद्व को नियंत्रण में रख कर उनको सहजता का अनुभव करवाने की को कोशिश की।। आज भी मुझे जब वो लम्हा याद आता है उस अलग सी अनुभूति को में शब्दों में ब्यान नहीं कर सकता।
मेरी इतनी हिम्मत नहीं आप मेरे सामने आकर बैठे और में आप से पहले बात शुरू कर दू, अंदर तूफ़ान उठ रहा होगा पर चेहरे के भाव से आप जान भी नहीं पाओगे। हाँ एक बार आप ने शुरुवात कर दी फिर आप को भी रोकना मुश्किल हो जाएगा।।
अच्छा और बुरा क्या है?

कुछ साल पहले जब मुझे सिर्फ अपने खोखले समाज के विचारो ने दिमाग को जकड रखा था तब मुझे भी लगता था जो ये समाज कहे वो ठीक है।। मगर धीरे अलग अलग धर्म, जाति और समुदाय के जीवन शैली को जाना तो इतना पाया की ठीक और गलत सब ने अपनी सुविधानुसार अपना रखें है।।

सब से बड़ा उदहारण आप को आजादी के वक़्त का देता हूँ तब लोगो की मानसिकता काफी संकृण् थी अगर कोई युवती किसी व्यक्ति से बात करती भी नजर आये उसका जीवन दुभर कर देते थे।। पर एक समाज के बड़े तबके की युवती अविवाहित गर्भवती हुयी तो
समाज के उन ठेकेदारो में से किसी ने उसे गोद लिया बेटी मानकर तो किसी ने उसके बच्चे का नाम दिया और इसी समाज ने स्वीकार भी किया क्योंकि वो लोग प्रभाव शाली थे।। आज ये चलन शिक्षित या उच्च मधमवर्गीय परिवारो में आ गया है । लेकिन निम्न मधम वर्ग उन्ही बंधनो में जकड़ा हुआ है।।
अरे दो इंसान आपस में एक दूसरे के विचारो से खुश है तो तीसरे को गलत क्यों लगता है।। कल को उनके फैसलो का दुष्प्रभाव या अन्य जो भी परिणाम हो वो उसके लिए उत्तरदायी है आप क्यों उन पर प्रश्न उठाते है। हाँ उनके कारण आप की निजता का कोई हनन हो तो बेशक वो गलत होगा। मेरी प्रार्थना है आप सब से खुद भी जीना सीखिये और दुसरो को जीने भी दें और जीना भी सिखाइये जिंदादिली से।।

शुक्रिया पाठको।।

मंगलवार, 17 मार्च 2015

विकृत मानसिकता

आज(कुछ क्षण पहले) एक महाशय के साथ पैदल ऑफिस से आईटीआई चौक तक आया तो उनके अंदर का दफ्तर के अन्य कर्मचारी के प्रति दुर्भावना भरे शब्दों से मेरा भी मन व्यथित हो उठा।।
वो शख्श कैसा है में ना जानने का इच्छुक हूँ ना मुझे पता।।
फिर भी मेरी इतनी हैसियत नहीं की में किसी और के जीवन
के बारे में कुछ कहूँ।।
अभी शांति दूं मन को फिर लिखूंगा।।
मुझे भी दूर रहने की हिदायतें दे डाली।।

शनिवार, 14 मार्च 2015

बुरा अक्स जिसका तेरे लिए । वो शख्स हूँ में।।

सब के लिए है जो बुरा
वो शख्स हूँ में

हर चाहत के लिए है जो अधूरा
वो शख्स हूँ में

समेट लेता है गम सारे
वो शख्स हूँ में

बंद आँखों से देख लेता है दर्द
वो शख्स हूँ में

गर्मी के मौसम में हो जाता है सर्द
वो शख्स हूँ में

बन्द कमरो में है रोशन सितारा
वो शख्स हूँ में

उम्मीदों से भरा है जिसका दामन
वो शख्स हूँ में

कुदरत से खफा है जिसका मन
वो शख्स हूँ में

मानवता से भरा है जिसका अक्स
वो शख्स हूँ में

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

खंजर सा क्यों लगता है सीने में वो,

मालूम नहीं क्यों, पर
खंजर सा लगता है सीने में वो
हलचल मचता है जीने में वो

मासूमियत से हर बात कहता है
मेरे सारे शब्दों में वो रहता है
चीखता नहीं मुझ सा कभी वो
पर चोट बहुत करता है ख़ामोशी से
खंजर सा क्यों लगता है सीने में वो,

बहुत समझाया उसको भी और खुद को भी
फिर भी जाने क्यों पास आ जाता है वो
मौसम सा तो नहीं, बर्फ सा पिघल जाता है वो

खंजर सा क्यों लगता है सीने में वो,

कोई शरारत है उसकी, या मेरा दिल ही नादाँ है
उसकी कड़वी बातों में, मिठास ढूंढ लाता है दिल
वो तो हँसता रहता है, मेरी साँसों को होती है मुश्किल

खंजर सा क्यों लगता है सीने में वो,

अब चुप ना रहेगी, मेरी सिसकियां
उसको भी सताएगी, पतंगे की तरह
शमा सी जली हूँ में, नाजो से पली हूँ में
नख़रे उसके अब मुझ से सहे जाते नहीं

खंजर सा क्यों लगता है सीने में वो,

खबर करो उनको भी कोई
उनके सपने मुझे अब आते नहीं
वक़्त ही मिलता नहीं उनको भुलाने का
ख्याल उसके मेरे ज़हन से अब जाते नहीं

खंजर सा क्यों लगता है सीने में वो,

आप तो माहिर है, शब्दों के खेल के
कोई शब्दों का बाण, निकाल सीने से
मेरे सीने के घाव पर कोई मरहम लगाते नहीं

खंजर हो अगर तुम, 
किस्सा मिटाते क्यों नहीं
एक वार में,
क्या रखा है रोज के नफरत और प्यार में

कड़वे शब्द बोलता हूँ