शनिवार, 3 सितंबर 2016

खुलें में शौच मुक्त बनाना है

ना ख़ुद खाना है
ना औरो को खिलाना है
बस सोच है ये
अब हमारी
गाँव को
खुले में शौच मुक्त बनाना है

शौच से फ़ैलने वाले रोगों को
जड़ से ही मिटाना है
नन्हें बाल रूपी फूलो को
मुरझाने से बचाना है
मुझे अपने गाँव में
स्वच्छता का पौधा लगाना है
खुले में शौच मुक्त बनाना है

दादा और दादी
चाचा और चाची
माँ और पिता
भैया और बहना
सबको है समझाना
मुझे अपने गाँव के
इस कोढ़ को है मिटाना
खुले में शौच मुक्त बनाना है

#
मानसिकता बदलने की जरुरत है
मेरे गाँव की भी तस्वीर खूबसूरत है
#kadwashabd on Facebook
#@kadwashabd on twitter

शनिवार, 27 अगस्त 2016

रिश्तों की गुलामी या आजादी

महत्वकांशी होता है मनुष्य बढ़ा जब उसे अपनी इच्छाओं  की पूर्ति होते दिखाई नहीं देती तो उसे रिश्तों में घुटन अथार्थ आजादी का सवाल खड़ा हो जाता है उसके जहन में

मेरी भी ज़िन्दगी है जैसे कई सवाल उसे जकड लेते है। इस क्रिया को दोहराते हुए वो पुराने रिश्तों जिन्हें गुलामी समझ बैठता है उन्हें छोड़ फिर नए रिश्तों की गुलामी में चला जाता है। वो ये भूल कर बैठता है कि रिश्ता गुलामी नहीं उसकी जरुरत है। क्योंकि मानव अकेले रह नहीं सकता कुदरत ने उसकी सरंचना इस तरह की बनाई की उसे दूसरे मानव के बिना रहना असंभव है बेशक वो रिश्ता माँ बाप । भाई बहन। पति पत्नी। अथवा कोई दोस्त हो। दुसरो से हम जो अपेक्षा करते है वो ही गलतिया खुद के जीवन में दोहरा लेते है। मनुष्य के मन की अवस्था बहुत ही अधिक चंचल होती है वो ना चाहते हुए भी उन राहों को चुनता है जिन्हें उसका मस्तिष्क तो जवाब दे रहा होता है पर चंचल मन ले जाता है। फिर जब दोष की बात आती है तो मन पल्ला झाड़ मस्तिष्क के ऊपर ठीकरा फूट जाता है। क्या तुम्हें समझ नही थे जैसे सवाल उसकी बौद्धिक क्षमता को सवालिया निशान लगा दिए जाते है।
हम गुलाम इस शरीर और चंचल मन के है ये मन कभी भी हमारी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है। वास्तविकता को जानते हुए भी अवास्तविक संसार की कल्पना कर जीना चाहता है।
उदारहणतय देश आजाद हुआ 1947 में अंग्रेजो से तो आज यहाँ के लोगो को खुद के सविंधान से गुलामी नजर आने लगी कभी आरक्षण की आग तो कभी गरीबी की आग गुलाम होने का एहसास दिला जाती है। न्याय न मिलने पर कहीं आपराधिक बोध से त्रस्त विचारो की लहर आंदोलन बन जाती है। मेरे कहने का सिर्फ इतना मतलब है कि विसंगतिया हर ढांचे में होती है। बशर्ते दूर जाने की हमें उन विसंगतियों से जूझने की कोशिश करनी चाहिए।

#मैंने ईश्वर से भी आजतक ये ही माँगा

हे ईश्वर मुझे सद्बुद्धि दीजिये अन्य किसी भी वस्तु का लोभ निरर्थक है।।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

रुक जा ए दिल यहाँ

सुहाने सपनें से शुरू होती राहें अक्सर
मीलों की गहराई वाली मंज़िल को ले जाती है
रुक जा ए दिल यहाँ क्यों कागज के फूल भरमा गये

जब मालूम है तुझे, हवा के झोंको से सहम जाता है
फिर क्यों तूफानों की राह पर तू चल दिया
रुक जा ए दिल यहाँ क्यों छुईमुई सा तू खिल गया

वजूद तेरा मिट गया उनकी नजरों में
जिन्हें तुझ में रब्ब नजर आते थे
रुक जा ए दिल यहाँ क्यों काँटों से मिल गया तू

#
सावन की बारिश है ये मोहब्बत
जब तक बरसे तो ठंडक
नहीं तो उफ्फ़ ये गर्मी

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

ज़िन्दगी के रंग

समाज के सम्मान का तमगा था जिसके पास
उसे अन्धकार से दिखा कर रौशनी की आस

फिर धकेल दिया पहले से भी गहरे अन्धकार में
उसी सम्मान के नाम मुझे कर शहर में बदनाम
खुद का दामन छुड़ा गये, रूह मेरी रुला गये

समझ नहीं पाया, क्यों मुझे वो रास्ता क्यों दिखाया
शायद वो ही अपने कायदों को मुझ पर थोप गया
मुझे दुविधा की आग में तनहा ही झोंक गया

शुक्र है फिर भी , साँसों को कुछ पल ही रोक गया
ज़िन्दगी थी दांव पर, मुझे कम से कम ज़िंदा छोड़ गया

#
रिश्तों से खेलना छोड़ दे जिंदगी
मेने छोड़ दी तो ना रिश्ते होंगे ना तुम

बुधवार, 22 जून 2016

दो उदास दिल

उदास था मन
और ख़ाली भी था
जीवन भी बेरंग था
और लम्हें भी उदास

फिर

एक और खाली मन मिला
दोनों के खालीपन को
कोई नया जीवन मिला
जी उठा वो हर उदास लम्हा

मन चंचल भी खिल उठा
साँसों को धड़कनें की वजह मिली
आँखें भी उनके नूर से खिली
तक़दीर भी आज ज़िन्दगी से मिली

#
जी कर वो लम्हा कोई भी उदास ना था
मन को ऐसी ख़ुशी मिलेगी विश्वास ना था
सकूँ के इन लम्हों को सहेजना तुम भी
अक्सर मीठी यादें ही जीवन को खूबसूरत बनाती है

शनिवार, 21 मई 2016

वियोग की पीड़ा

तिनका तिनका जोड़ बुना था आशियाना
घर का एक चिराग बुझते ही उजड़ गया

वियोग की पीड़ा से माँ का दिल रो पड़ा
हाय रे किस्मत, अधेड़ उम्र में बाँझ हो गई
हंसती खेलती मेरी कोख़, काल ग्रस्त हो गई

किसे सुनाओ पीड़ा, ऐसा छुआ कोई कीड़ा
अमृत भरे जीवन में, जहर कोई खोल गया
पुत्र के वियोग में, माँ का दिल रो पड़ा

अँखियों में उम्र भर की बेबसी ने डेरा है डाला
23 बरस की ममता आज क्यों ढेर हो गई
किसकी नजर लगी मेरी गोद जो सुनी हो गई

रोती बिखलाती पूछती है आज वो माँ
किस के सहारे जिंदगी की लौ जगाऊँ में
सुनी दहलीज पर किसको लाल बुलाऊ में

वियोग की पीड़ा देख उस माँ की आज
जग सारा टूट पड़ा, दिलासा बांधने को
मगर गांठ बंधे कैसे जब धागा ही खो गया

कुदरत के इस लेख पर हर कोई घबराया है
जाने किस घड़ी माँ ने अपना लाल गंवाया है
हर पत्थर दिल ने, अपना सर झुकाया है

#
बदनसीबी का ये आलम
मंजर है जो बेबसी का
किसी के जीवन में ना आए
जगमगाती कोख क्यों बुझ जाए

गुरुवार, 19 मई 2016

बस दिल है मेरा, मेरा ही हो गया

जग की रीत ऐसी निराली
जो सुनी एक बार दिल की बात
सब का गुनहगार मैं हो गया
बस दिल है मेरा, मेरा ही हो गया

कुछ हुआ आज, जो पहली बार था
ज़मीर था मेरा जो आज साकार हुआ
पर दुनिया की नजर में ये गुनाह हो गया
बस दिल है मेरा, मेरा ही हो गया

धड़कनें मेरी कुछ इस कदर, बहक गई
उसके प्यार की खुशबू से ज़िन्दगी महक गई
फिर क्यों ज़माने में हाहाकार हो गया
बस दिल है मेरा, मेरा ही हो गया

#
शुक्रिया उस दिल का,
मेरी भावना जो दिल की
सरांखों पे बिठा गया
इनकार कर के भी
इक़रार से कह गया
उसका तो पता नहीं
मेरा दिल दिल रह गया

#
उम्र भर ज़िन्दगी कठपुतली बनी रही
जो दिल की सुनी तो अपनी हो गई

मंगलवार, 17 मई 2016

शब्दों के आंसू

पत्थर से भी वजनदार हो गया
उसके जीवन में मेरा किरदार

अब मेरी हर कहानी उसके लिए
सिर्फ एक लफ़्ज भर हो गई है

कुछ ओह आह की दाद दिया करता है
मेरी हर बात पे इरशाद किया करता है

मायने नहीं उसको मेरी कविताओं के
एक भूली बिसरी याद समझ भुला देता है

मेरी बातें दिल से ना लगे, इसलिए रो देता है
जितनी भी आरजू करूँ, आंसुओ से धो देता है

जब हूँ ही नहीं, उसके जीवन का किरदार
फिर क्यों तानों से जख़्म दिया करता है

जब भी कोशिश करता हूँ आगे बढ़ने की
फिर उस दोराहे पर, ला दिया करता है

कुछ दर्द बांटने की थी जिस से ख्वाहिश
वो ही आंसुओ में डुबो दिया करता है

कमजोर दिल/जिगर भी क्या चीज है
समझने को तो सबके लिए अजीज है

पर ये भी इस समाज की ही तमीज़ है
व्यवहारिक दुनिया में हम सिर्फ नाचीज है

रविवार, 15 मई 2016

सन्तान।।

माँ और बाप दोनों की
आन होती है सन्तान
बेटी हो या बेटा
दोनों पर होता है मान

जगत चाहे भेद करे हज़ार
माँ बाप का होता एक सा दुलार

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

उसूलों की भेंट

बचपन की सीख
कि ज़िन्दगी उसूलों पे चलती है
मेने भी कुछ बनाये थे

पर जब किताबों से बाहर
व्यावहारिक दुनिया आये थे
उसूलों ने कुछ यूँ थपेड़े खाये थे

वो ही लूटेरे निकलेे जिसने कायदे बनाये थे
खुद की सीख के चीथड़े करते हुए ना शरमाये
मेरे उसूल झूठी शान की भेंट चढ़ाये थे

अब कैसे बदलता खुद को
बचपन में घोट कर पिलाये थे
उनकी आदत थी बदल जाने की
हमने तो एक जीवन के उसूल बनाये थे

ज़मीर से जुड़ा था मेरा हर उसूल
फिर समाज के कुछ कायदे कबूल
ये ही थी जीवन की सबसे बड़ी भूल

हर किसी ने उसूलों के कतरे बहाए है
किसी ने लहू पिया किसी ने टुकड़े चबाये है
फिर क्यों मेने उसूलो के ख़ातिर
ज़िन्दगी के हसीन पल गंवाए है

उसूलो की भेंट मैने सुखद पल खो दिए
दुनिया से लड़ते लड़ते होंसले भी रो दिए

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

बला का खूबसूरत।।

बला का खूबसूरत है वो
मुझे तो नाकाफी था
#
शिकायत है उनको रब्ब ना समझा
#

है चीज कुछ ऐसी ज़िन्दगी
जिसको माना हो भगवान
जागा है उसका अहम का शैतान
न बना भगवान, ना रह पाया इंसान

बला का खूबसूरत है वो
मगर दिल खूबसूरत रख ना पाया
रेत सा फिसलती है रोज ज़िन्दगी
कोई रिश्ता ना उससे सम्भल पाया

#
अहम को जो मिटटी में मिलाया होता
#

बला का खूबसूरत है वो
खूबसूरत दिलों का साथ पाया होता
पलकों पर ना सही बेशक़
दिल में बिठाया होता
ज़िन्दगी का सलीका सिखाया होता

#
वजूद है कुछ ऐसा मेरा
दिल में रखता हूँ अच्छाई
अच्छो की तमन्ना है दिल की
बस ये ही मुझ में एक बुराई

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

चिंता

सबको खाती है
कुछ बात हुई न
कि चली आती है
हँसते खेलते जीवन में
कौन सी आग लगाती है

बुधवार, 30 मार्च 2016

कशमकश में हूँ मैं

कश्मकश में हूँ मैं
वो मेरा है
दिल कहता है
हो सकता नहीं

भुलाना भी चाहूँ गर उसे
मेरी साँसे क्यों टूटती है
एक पल को लगे
पीछे दुनिया छूटती है
कश्मकशम मे हूँ मैं

वो बेशक़ भूला सा लगता है मुझे
कहीं राहों पर फिर मिल जाता है
मेरा उदास चेहरा खिल जाता है
वो नजरें क्यों फिर चुराता है
कशमकश में हूँ मैं

मंगलवार, 22 मार्च 2016

मैं औरत हूँ

काँच की तरह रोज टूट जाती हूँ
अपने ही वजूद से पीछे छूट जाती हूँ

हर दिन नया ज़ख्म, मेरे जिस्म पर उकेर देता है
अपनी हवस और क्रोध से, मेरी रूह हर लेता है

बेबसी का ये मंजर, दशको से मेने ही झेला है
खुशियो को जब भी चाहा, पीछे ही धकेला है

बर्बरता का आलम तो देखो उस वहशी का
नफ़रत भी हमसे, और मोहब्बत का तकाजा भी

अस्तित्व की लड़ाई मैं हार गई मैं लड़ते लड़ते
नोच गया मेरा जिस्म वो, बेजान मानकर

मेरी रूह  को तार तार कर गया, जबरदस्ती मोहब्बत से
कौन सा सकूँ मिल गया उसे, मेरी बंजर सी धरती से

सोमवार, 14 मार्च 2016

मैं ही हूँ बस, ए दिल

हक़ जताना छोड़ दें ए दिल
कोई साथ नहीं निभाता
है ज़िन्दगी जब तलक
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

पल दो पल को मिलते है लोग
अपने हिसाब से दुनिया बनाते
गम छोड़ उन लोगो के जाने का
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

दिमाग ने भी बहुत समझाया तुझे ए दिल
तेरी बनाई दुनिया में जीना है मुश्किल
पत्थर रख ले अरमानो की गठरी पर तू
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस

समझ जरा तेरे लिए कोई दिल न बना ए दिल
बस आंसुओ पर खत्म होती है तेरी हर मंजिल
छोड़ दे और जान ले, चाहे  आज हो या कल
मैं ही हूँ बस, मैं ही हूँ बस



शनिवार, 12 मार्च 2016

कांटा बन चुभता हूँ मैं

जिनके दिलों के गुलाब होते थे
अब कांटा बन चुभता हूँ मैं

जिनके ख़्वाबों में हुआ करते थे हम
दूस्वप्न बन नासूर बन गया हूँ मैं

ख़ुदा की इबादत थे जिनकी नजरों में हम
आज उन क़दमों की ठोकर बन गया हूँ मैं

उम्र भर कड़वे शब्दों के जाम की बात करते थे जो
आज कागज के टुकड़े समझने लगे है वो

बस कुछ इस तरह ही दुखता हूँ मैं
अब कांटा बन चुभता हूँ मैं

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

एक दोस्त

एक दोस्त
मिलता है
वादा करता
जिंदगी के
गुर सिखाने का

एक दोस्त
एक नदी में
तैरने की कला
वो सिखाने ले चला
जाने फिर क्या हुआ
हाथ छुड़ाया
अनजानों से मिलाया
छूमंतर हो गया

एक दोस्त
उम्मीदें जगाता है
होंसला बढ़ाता है
फिर क्यों
एक दिन
सब तोड़
सब छोड़
निकल जाता है
एक दोस्त एक दोस्त

गुरुवार, 3 मार्च 2016

औरत के समर्पण की पहचान है वो

हर कदम लड़ती है
तब ही साहसी लगती है

ज़िन्दगी उसके लिए मुश्किलें चुनती है
वो बस हर मुसीबत का हल बुनती है

हर गम ने आकर उसको घेरा है
पर उसके दिल में रौशनी का बसेरा है

मोतियों सा चमकता रहता है वो
बेशक मायूसी का उम्र भर साया हो

होंठो से खुशियों को बांटता है हर पल
बेशक़ उदासी से भरा है उसका हर पल

हौंसलों की उड़ान है वो
मजबूती की पहचान है वो

औरत के समर्पण की पहचान है वो

बुधवार, 2 मार्च 2016

ओह सजन रे

मोतियों सा चमके है तू
अँखियो में दमके है तू
ओह सजन रे

धड़कनो का साज हो गया तू
मेरा कल और आज हो गया तू
ओह सजन रे

पलकों के तले रहने लगा है तू
साँसों संग बहने लगा है तू
ओह सजन रे

रगों में बहता है दर्द बनकर तू
ज़िन्दगी में हो शामिल दवा बनकर तू
ओह सजन रे

ज़िन्दगी भर की जागीर तो नहीं तू
बस दो पल का सुखद मिलन बन जा तू
ओह सजन रे

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

खुश है वो अपनी दुनिया में

एहसास हुआ
भ्रम था जो
आज टूट गया
जब उसका साथ
मुझ से छूट गया
लगता था कोई
मेरी खुशिया
लूट गया
खुश हो गया
वो अपनी दुनिया में
इतना बहुत है
हक़ जताना मुझे
कभी आया नहीं
इसलिए कोई भी रिश्ता
निभाया नहीं
वक़्त ही कुछ ऐसा है
हक़ जताये बिना
कुछ मिलता नहीं
सुखी जमीं पर
फूल खिलता नहीं

कड़वे शब्द बोलता हूँ