बुधवार, 26 सितंबर 2018

भावुक पल जिंदगी के

कौन कैसा है
अच्छा या बुरा

इस बात पर नहीं बात करनी , आज बात कहनी है एक व्यक्तिगत भावनाओं की, अक्सर हम कहते है कि केवल  बेटी जब बाबुल का घर छोड़ती है तो वो पल गम और खुशी एकमात्र पल होता है, मैं इसके पूर्णत विरोध में हूँ।

ऐसे भावुक पल जिंदगी में बहुत बार आते है बस कुछ महसूस करते है कुछ हल्के में गुजर देते हैं।

मेरे लिए ये पल बहुत बार आए, मुझे जब अपने दोस्त छोड़ने पड़े, वो हालांकि अपने उम्दा भविष्य के लिए आगे बढ़ जाते है। उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना तो होती है ख़ुशी का पल होता है, ठीक वहीं दिल में जोर से कसक उठती भी है। और लगता है सब छूट रहा है। और ये बात आपके दिल में ही घर कर जाती है, कुछ लम्हों बाद दिल उन दोस्तों की अच्छी यादों को नसीब मानकर एक मन मंदिर में तस्वीर बना देता है।

बस यूँ दिल भावुकता के पल को सँजो लेता है।

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

शिक्षक

शिक्षक

मेरे लिए उस दिए के समान है जो aghyanta के अंधकार में शिक्षा रूपी रोशनी से सृजन करता है।

शिक्षक

मेरे लिए उस कुम्हार के सामान है जो मुझ माटी को एक आकार में ढालकर, समाज में दिशा और दशा प्रदान करता है।

शिक्षक

मेरे लिए वो रास्ता है जो मेरे जीवन को मंजिल तक पहुँचाता है

शिक्षक

और क्या कहूँ
शिक्षक ही वो स्तम्भ है जिसपर मुझे रचने का भार है, शिक्षक ही मेरे जीवन का सार्थक आधार है

रविवार, 15 जुलाई 2018

चॉकलेट की जैसी हो तुम

चॉकलेट की जैसे हो तुम

घुल जाती हो, होंठो से लगाते ही
ख़ुमारी छा जाती है नशे सी
चॉकलेट की जैसे हो तुम

कभी कभी कड़वी भी लगती हो
पर आदत है कि छूटती नही तुम्हारी
चॉकलेट की जैसे हो तुम

महँगी भी बहुत हो,
इसलिए अक्सर ख़्वाहिश मिटा देता हूँ
खुशबू से महक लेता हूँ
चॉकलेट जैसे हो तुम

बर्दशात नहीं होता, जब तुम किसी के पास हो
मेरी आँखों में नमी होती जब उदास हो तुम
खुशी को तेरी दूर चला जाता हूँ
यादों में खुद को भी भूल जाता हूँ
बिल्कुल
चॉकलेट जैसे हो तुम

लिखता तुम से हूँ, तो औरों की क्यों बात करते हो
इरादे तुम बदल लेते हो, मौसमी समाज से डरते हो
फिर मेरी खामोशी पर आहें भरते हो
चॉकलेट जैसे हो तुम

मालूम नहीं कब पढ़ते हो मेरे अल्फाज़
तुमसे बात कहने का एक ये ही है अंदाज
मेरी पहुँच से दूर हो गए हो तुम
चॉकलेट जैसे हो तुम

महंगे और शौकीन
खुशबू और हसीन
चॉकलेट जैसे हो तुम

कभी कड़वे तो कभी मीठे
नशा वन रगों में बस जाते हो
हाँ तुम ही तो
चॉकलेट जैसे हो तुम

#दोस्त #दुश्मन

बुधवार, 11 जुलाई 2018

माँ के दिल से

प्रिय हो तुम,
मेरे श्वास से भी ज्यादा
#कड़वाशब्द
माँ शब्द ....माना कि सँसार है
पर शिशु ही ममता का आधार है
#कड़वाशब्द
तेरी अठखेलियों से खिलती हूँ,
तुझ से ही, मैं खुद से मिलती हूँ
#कड़वाशब्द
शिकन तेरी, मेरी बेचैनी बढ़ाती है
माँ की मुस्कान, तेरी हँसी से लौट आती है
#कड़वाशब्द
रोज तेरी नई लीला, माँ का आनंद बन जाती है
शिशु की किलकारी, माँ के आंगन की बाती है
#कड़वाशब्द
ममता के चिराग में, रोशनी भर भर आती है
जब माँ की गोद एक नन्हें फूल से महक जाती है
#कड़वाशब्द
माँ की बात आज तुम्हें एक माँ ही सुनाती है
ममता रूपी दिए कि शिशु से अलख जग पाती है
#कड़वाशब्द
तुम बिन हर शब्द ममता का अधूरा है
मेरे शिशु से ही मेरा परिवार भरा पूरा है
#कड़वाशब्द
तो माँ की ममता के बखान में याद रखना जरूर
हर माँ के लिए उसका शिशु होता है उसका ग़ुरूर
#कड़वाशब्द
तेरे माथे को चूम कर जो सकूँ मिल जाता है
वो एहसास ही मुझे, माँ होने का हक़ दिलाता है

एक माँ की कहानी ....उसकी जुबानी

गुरुवार, 21 जून 2018

सन्त बनाम मानव

सन्त एक शब्द अगर आप किसी के लिए प्रयोग करते है तो अनायास एक सम्मान की भावना उमड़ पड़ती है परंतु समय के साथ भ्रांतियां जुड़ने लगी और हमने ऋषि, धर्मगुरुओं, समाजसेवियों व अन्य गणमान्य पुजारी इत्यादि लोगो को सन्त कहना शुरू कर दिया। उसका वास्तविक कारण आधुनिकता के दौर में असली संतों का न मिलना है।

सन्त है क्या?

वो मनुष्य जो ग्रहस्थ जीवन को त्याग , गृहस्थी में लीन लोगों के कल्याण के लिए निकल पड़ता है। नही समझें? कुछ आधुनिक युग के हिसाब से कहुँ तो वो अनुभवी व्यक्ति जो मनोदशाओं और परिस्थितियों के
ज्ञान से पारंगत , सामान्य व्यक्तियों को उनके समाधान या कल्याण के लिए अपने ज्ञान का संचार करता है। उनका मकसद कभी एक स्थान पर रहकर डेरा जमाना नहीं होता था वो निरंतर ज्ञान के प्रकाश से रोशन करते हुए आगे बढ़ जाते थे, उन्हें किसी समस्या या तकलीफ़ का ज्ञान होता था क्योंकि भ्रमण से से उनके ज्ञानकोष में निरंतर वृद्धि होती रहती थी, भावनाओं पर नियंत्रण कर वो एक मशीन की भांति कार्य करते थे ,

उदाहरण के तौर पर किसी की मृत्यु हो जाती है तो हम काफी विलाप करते है परंतु हमारे जानकर व रिश्तेदार हमे सांत्वना देते है कि प्रकृति का नियम है, क्योंकि वो भली भाँति परिचित कि किसी के जाने से कभी संसार नहीं रुकता। ठीक वैसे सन्त इन भावनाओं को दूसरे के माध्यम से साध कर स्वयं को इतना परिपक्व बना लेता है कि दुख और सुख के समय मनुष्य कुछ पल को अधीर हो जाता है, सन्त जानता है कि जब उसके मानसिक पटल से वह आघात पहुँचाने वाली बात वक़्त के साथ धूमिल हो जाएगी तो फिर वह मुख्यधारा में लौट आएगा, इसलिए वह उस वक़्त संजीवनी की भांति अन्य उदाहरणों से,  युक्तियों से उसका समाधान कर देता है। मेरी नजर में दो महापुरुष है जिनको मेने जाना है एक बाबा नानक और दूसरा गौतम बुद्ध , जिन्होंने सन्त शब्द को पूर्ण रूप से परिभाषित किया है। हालांकि मेरे ज्ञान से बाहर अन्य भी काफी सन्त हुए है।

आप कहेंगे कष्ट निवारण तो डॉक्टर भी करता है तो वह भी एक सन्त हुआ, एक वकील भी कानूनी समस्याओं से बाहर निकालता है वो भी सन्त हुआ, एक शिक्षक भी अज्ञानता के अंधेरे से ज्ञान के प्रकाश में ले आता है तो वह भी सन्त हुआ, पर मैं खंडन करता हूँ क्योंकि सन्त सांसारिक सुखों के लिए कार्य नही करता कि आपके गृहस्थ समस्याओं या जीवन यापन के लिए कुछ समाधान करेगा, उसका कार्य आपको आध्यात्मिक रूप से समग्र बनाना होता है वह चंचल मन को बांधने की प्रक्रिया पर बल देता है, वह यह फर्क समझाता है कि डॉक्टर कहता है ये दवा लो आपका रोग ठीक हो जाएगा, सन्त कहते है ये नियम अपनाओ रोग ही नही आएगा। वकील कहता है भाई से जायदाद किस तरह से हासिल होगी, सन्त कहता है कि भाई को हासिल करलो जायदाद का मोह ही छूट जाएगा, शिक्षक कहता है इस ज्ञान को प्राप्त करने से , तुम सांसारिक सुखों को प्राप्त कर सकते हो जबकि वो नही कहता उन सुखों के साथ दुख भी साथ आते है, दुख भी एक प्रक्रिया है और सुख भी लेकिन सन्त इन दोनों परिक्रियाओं में स्थिर रहने का भाव सिखाता है, सन्त हिंसक समाज को अहिंसा का मूल्य सिखाता है। सन्त समाज को व्यर्थ के तनाव से दूर रहने का मार्ग दिखाता है, सन्त को क्रोध नही आता वो मुस्कराने की कला में पारंगत होता है उसे आभास होता है कि क्रोध के पल मिटने पर, मनुष्य को जो पश्चाताप अनुभव होगा वह इस क्रोध से भी भयावह है जब वह स्वयं ग्लानि के भाव से गुज़रेगा। सन्त जीवन को संजीवनी देता है , बस कोई सन्त आपको मिल जाये तो आपका जीवन भी महक उठेगा।

गुरुवार, 14 जून 2018

तुम हाँ तुम

तुम हाँ तुम
प्रेरणा बनी थी मेरे कलम की

बड़े फ़रेबी अंदाज से, मुझे समझाया था
खुद के दासी होने पर मुझे मालिक बताया था

तुम हाँ तुम
जिसने मुझे हँसना सिखाया था

एक राह दिखाई थी, कि दुनिया बड़ी हसीन है
ऐसा उड़ा था मैं, जैसे तू ही मेरा मोहिसिन है

तुम हाँ तुम
जिसके खातिर उसूलों को छोड़ दिया

उतर गए मेरे कोरे मन में, जैसा चाहा लिख डाला
मोहब्बत होने लगी थी ज़िन्दगी से, तो बदल गया

तुम हाँ तुम
जिसने मेरी शराफ़त को निचोड़ दिया

मासूमियत भरी मेरी सीरत को, फ़रेब से रूबरू कर दिया
तन्हाई में बहने वाली तन्हा रगों को, जुदाई के दर्द से भर दिया

तुम हाँ तुम
जिसने मुझे तन्हा से रुसवा कर दिया

शिकवा करते है मुझ पर लिखते नहीं वो
जिनकी तारीफ़ से, मेरी कलम ही रूठ गई

तुम हाँ तुम
जिसकी वजह से जीने की वजह ही छूट गई
😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢

शनिवार, 9 जून 2018

सक्षम युवा:- एक कदम हुनर की और

गत दिनों सरकार द्वारा योजना चलाई गई, 'सक्षम'

इस योजना का मकसद बेरोजगार शिक्षित युवाओं को रोजगार का प्लेटफॉर्म मुहैया करवाकर हुनरमंद बनाना था। इस योजना से कर्मचारियों की कमी झेल रहे विभागों को भी फायदा मिला। कुछ विभागों के लिए यह योजना संजीवनी साबित हुई ठीक वैसे उन युवाओं के लिए भी जो लग्न से कार्य करना चाहते थे उनको संबंधित विभागों द्वारा नियमित कार्य दिया जाने लगा, प्रारम्भ में जो कार्य माह तक सीमित था वह अब 6 माह व उससे अधिक दिया जाने लगा।

मुझे भी गत सप्ताह सक्षम युवाओं के साथ काम करने का मौका मिला, मुझे अपना वो समय याद आया जब लगभग 6 वर्ष पूर्व मेने भी सरकारी कार्यालय में कार्य करना प्रारम्भ किया था। मेरे संकोची स्वभाव के कारण मैं कभी किसी कार्य से किसी अधिकारी को मना नही कर पाया शायद उसका परिणाम मुझे समय समय पर नए चुनौतीपूर्ण कार्य करने को मिले, जिसके पश्चात अनुभव में बढ़ोतरी होती गई।

सक्षम युवाओं के साथ जो मेरा अनुभव रहा वो इस प्रकार था:-

सामान्य:- कुछ युवाओं के लिए ये योजना मात्र थी जिनका मकसद केवल सरकारी योजना का आर्थिक लाभ उठाना होता है वो युवा या तो कार्य की कठिनता से घबरा छोड़ जाते है या बेहतर युवाओं के सहारे समय पूरा कर लेते है।

मध्यम:- कुछ युवा जोशीले होते है कार्य करने में उत्साहित रहते है पर इन युवाओं से कार्य करवाने के लिए एक सूझबूझ वाले प्रबंधक की आवश्यकता होती है। जिसके मार्गदर्शन में ये बेहतर युवा बन सकते है।

बेहतर:- इन युवाओं में गजब की क्षमता भरी होती है, केवल कौशल प्रशिक्षण की कमी के कारण , विभाग इनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल नही कर पाते, इन युवाओं में अपने कार्य को करने की गजब की लगन होती है। ये तय समय मे कार्य पूरा कर लेते है।

निजी अनुभव के आधार पर सक्षम युवाओं के लिए कुछ सुझाव:-

1. अनुशासन :- अक्सर सक्षम युवाओं में अनुशासन की कमी देखने को मिलती है, हमे स्कूलों में भी बचपन से सबसे पहला सबक अनुशासन का सिखाया जाता है जोकि अक्सर वक़्त के साथ अव्वल की होड़ में हम भूल जाते है। अनुशासन से अभिप्राय समय की पाबंदी, ईमानदारी से कार्य व आदेशो की पालना है। अधिकारी हो सकता है कि अपने कार्य की गर्ज में आपके व्यवहार को नजरअंदाज करदे, लेकिन ये आपके भविष्य को प्रभावित करने का प्रथम कारक साबित होगा।

2. अधिगम कौशल (सीखने की लग्न):- हर व्यक्ति सभी क्षेत्र में निपुण हो ये आवश्यक नही, लेकिन जब किसी क्षेत्र में हमे अनुभव न हो तो हमे उस क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के कार्य के तौर तरीकों को गंभीरता से सीखना चाहिए, ये समझ कि यह तो मेरा कार्य नही आपकी संकीर्ण सोच को दर्शाता है आगे बढ़ने के लिए जीवन मे फूलों की सेज नही कांटों के भंवर से गुजरना पड़ता है। इसलिए जब कभी कठिन कार्य मिले तो उसके सरल उपायों(शॉर्टकट) की बजाए निपुण व्यक्तियों के सानिध्य में  तय मापदंडों के अनुसार कार्य करना चाहिए।

3. ऊर्जावान:- रास्ते कठिन होंगे तो तय है कि ऊर्जा का भी क्षय होगा, तो उस स्थिति में स्वयं को नकारात्मक ऊर्जा से बचकर स्वयं को सकारात्मक ऊर्जा से आगे बढ़ना चाहिए । किसी भी कार्य की सफलता आपके हाथ नही है लेकिन कोशिश पर आपका नियंत्रण है,  न हार मानने का जज़्बा एक दिन सफलता को अवश्य प्राप्त करता है।

सक्षम योजना आपके लिए कार्य सीखने का प्लेटफॉर्म है न कि जीविका का साधन, इसलिए अपने को हुनरमंद बनाये और योजना के माध्यम से बने अवसरों से आगे बढ़ने की कोशिश करें।

सोमवार, 21 मई 2018

पराकाष्ठा जिल्लत की

जिल्लत भरी है उसकी बातें , रोज जलता हूँ

सहनशक्ति की भी सीमा होती है, खुद की जुबान पर नियंत्रण न कर, अक्सर दूसरों को कोसते है कि वो ऐसा वो वैसा, क्यों भूल जाते है कि जब तुम्हारी खँजर जैसी बातें किसी के दिल को लगेगी कुछ तो फर्क पड़ेगा, बस एक क्रिया पर प्रतिक्रिया तुरन्त कर, मसलें को वही बराबर कर लेता है जबकि अन्य सीने में दर्द पाल उस राह से दूरियाँ कर लेते है।
महफिलों में अक्सर आपको यूँ ताने कसने वाले मयल जाएंगे जिनको सिर्फ निज स्वार्थ या इच्छापूर्ति की विफलता के कारण बस औरों को निशाना बनाना होता है।
अब दलित शब्द को ही ले लो, वो होता है जो समाज में कुचला गया हो जिसका शोषण हुआ ये जाति से सम्बंधित नही होता जबकि समाज में होता उल्टा है, एक जाति पर दलित का लेबल लगा देंगे, जबकि कुछ जगह अक्सर देखा गया कि उसी जाति का सम्पन्न व्यक्ति अपनी ही जाति के निर्बल का शोषण करता है।

पहले आप रिश्ता बनाते हो
फिर रिश्तों की दुहाई से रिश्ता तोड़ देते हो...
फिर आपके फैसले के सम्मान में कोई पीछे हट जाता है
तो फिर आपको लगता है कि आपका ये भी अपमान हुआ, मतलब आपकी सुविधाओं के अनुसार सँसार नही तो आप सब राख कर दोगे, इसी मानसिकता के आधार पर कुछ लोग अक्सर दूसरों के जीवन में ज़हर डालते है।

जबकि असली रिश्ता एक बार जुड़ गया तो आप चाह कर भी उस इंसान का बुरा सोच भी नही सकते, कहना तो दूर ....और जो सर्वनाश की बातें करें तो आप उनकी मानसिकता का अंदाजा लगा सकते है,

सभी दोस्तों से निवेदन है कि बेशक़ आप निभा न पाओ दोस्ती के अन्य मायने, मगर उसके शुभचिंतक बन हमेशा रह सकते है बशर्ते आपके पास एक सुंदर दिल हो।

रविवार, 20 मई 2018

मैं विकास हूँ

मैं विकास हूँ
नाम से विकास हूँ
पर बौद्धिक विकास नही

क्यों.....

बचपन में बुजर्गों के पास बैठता था
अच्छी बातें सुन, अच्छाई डालता गया

फिर स्कूल गया, किताबो में भी कुछ ऐसा ही था
अच्छाई की जीत होती है झूठ की हार होती है

स्कूल हुआ, कॉलेज हुआ अब वो वक़्त आया
जब मैने पहली बार,..... जिंदगी हो था छुआ

कर्म करने को, मेने जैसे ही पहला कदम बढ़ाया
कर्म से पहले, जी हजूरी ने मुझे थप्पड़ लगाया

उम्दा और बेहतरीन है हुनर तुम्हारा, जो चलता नहीं
पकड़ बनाओ, झूठ पर....सच है कहीं बिकता नहीं

जो बिक जाता है वो ही बाज़ार में टिक जाता है
उसूलों और सिद्धांतों को, किताबों में बन्द कर दिया

पेट की भूख और काया के शौक ही नज़र आते है
सच की राह चलने वालों के बच्चे भूख से बिलबिलाते है

ये तो सबक थे व्यापार के, फिर रिशतें मिले प्यार के
सुहावने थे, मिश्री भी फ़ीकी पड़ गई उनके अंदाज से

क़ायदे सुविधा से बनाए, दिल किया तो भगवान समझा
उसी दिल ने ली करवट तो तीखें खँजर सीने में चुभाये

वाह री दुनियां, कब्र बना दी , जिन्दा इंसानों की
ज़रूरत से बने व्यापार, जरूरत से किया प्यार

विकास तो मखौल हो गया...भीड़ की दौड़ में

अच्छाई से मेरा भी दामन छुड़ा दो
जिन्दा कंकालों से मेरा भी रिश्ता बना दो

#जसजसजककसब्सब्जसजसम्सम्सब्ज़बजकजज़्सब

बुधवार, 2 मई 2018

शुभचिंतक vs मैं अथार्त गुनाहगार।

बात शुरू कहाँ से करूँ समझ नही आ रहा, उनके वक्तव्य से नजर आ रहा है कि जहां में सबसे बड़ा दोस्त का दुश्मन में ही हूँ। मैं शायद इस वजह से भी मुझ में खामियां हो क्योंकि मैं में ज्यादा रहता हूँ, मेने अक्सर दोस्तों को समझाने की कोशिश कि कौन अच्छा है कौन बुरा, तुम्हारे सामने जो अच्छे बनते है वही पीठ पीछे आपकी बुराई करते है, बस मेरा ये गुनाह ही था कि मैं गुनाहगार हो गया। या तो वो उनके इतने प्यारे थे कि मेरी बातें महत्वहीन हो गयी या फिर उनको भी अच्छे से पता है पीठ पीछे बुराई होती है मगर किसी का कुछ किया नही जा सकता , मानव प्रवृति ऐसी है। जो भी है पर मुझे चोट बहुत लगती है, एक सत्य ये भी है कि मेरी चोट का मूल्य वहां नही हो सकता जहां दोस्त को खुद की असुविधा हो। कोशिश जारी करने लगा हूँ कि अब किसी को भी किसी के पीठ पीछे के कथन को न दोहरा सकूँ। दोस्ती के पैमाने पर में जीरो हो चुका हूँ, क्योंकि चुनिंदा दोस्तों में से आज कोई मेरे पास नही, एक इल्जाम ये भी आया कि मैं दोस्त लाभ के लिए बनाता हूँ ह्म्म्म मानता हूँ  अकेलेपन को दूर करने के सिवा कोई ऐसा स्वार्थ न था जिसके लिए मेने दोस्त बनाया हो, फिर भी आज कठघरे में खड़ा कर दिया गया।

इतना सत्य है कि दोस्तों से मेरा मोहभंग भी जब हुआ मुझे उनकी सख्त जरूरत थी और वहां न मिले, इसके कारण तो सही भी है मुझे लाभ के लिए दोस्त चाहिए था पर जो नराज है वो भी समझे क्या उनका कोई लाभ या स्वार्थ न था। मेरा तो कल भी वही व्यवहार था और आज भी वही है, जो प्रेम से बोले तो कभी ख़ामोश नही रहता पर जब आप तानों के बाण से बतियाओगे तो कहां से शब्द निकलेंगे, जब दिल ही घायल हो चुका होगा, फिर इल्जाम आएगा तुम शब्दो के माहिर हो,अरे वो शब्द भी तो दिल से निकलते है वो भी तो मेरे है, जब दिल दुखाने वाले शब्द मेरे है तो मरहम वालों पर क्यों यकीन नही करते दोस्त। मेने जिसे दोस्त माना आज तक उसका बुरा न चाहा, हां जो खामियां मुझे लगती शायद उनपर विचार किया हो लेकिन कभी बुरा नहीं चाहा, पर मेरे दोस्त कुंठित होकर इतना बुरा कह देते कि रब्ब से मौत ही मांगना बेहतर लगता है किसी एक का भी दिल दुखाया तो जीवन किस काम का....

लाख बुरा हूँ मैं... पर तेरी बुराई न चाहूँगा
तुम बेशक़ कत्ल कर दो मेरा...उफ़्फ़ न होगी

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

महिला सशक्तिकरण

चारों तऱफ बात तो सब करते है महिलाओं के सशक्तिकरण की, पर करते क्या है? सुरक्षा के नाम पर चंद दीवारें और महिलाओं के लिए खड़ी कर देते है। तुम्हें ये नहीं करना, वो नहीं करना इत्यादि बन्धनों में बांध दिया जाता है।
महिला सशक्तिकरण? महिलाओं को इतना सक्षम बनाना कि उनकी निर्भरता चाहे वो आर्थिक हो या सामाजिक किसी अन्य व्यक्ति विशेष पर न निर्भर हो। उसके आत्मविश्वास को इतना सृदृढ़ बनाना कि उसे किसी भी कार्य को करने में अक्षमता का अनुभव न हो।

पर हम लोग सशक्तिकरण के नाम पर करते क्या है,
कॉलेज के बाहर लड़कियों को लड़के छेड़ते है, वहां पुलिस लगा दो
दफ़्तर में महिलाओं को शोषण होता है, वहाँ भी किसी कमेटी का गठन कर दीजिए।
बेटी को स्कूल जाना है तो बड़े भाई व अन्य को कवच बना जिम्मेदारी उसे सौंप दी।
शादी कर रहे है तो बेटी को अगले घर परेशानी न हो, तो दहेज के बड़ा सा टोकरा लाद दिया।

इन बैसाखियों के सहारे दे दिए ताकि वह अपना जीवन सुखद बना सके। क्या ये ही है महिला सशक्तिकरण।
कल कोई बैसाखी नहीं हुई तो वह महिला फिर स्वयं को असहाय महसूस करें।
सहारा चाहे पुरुष हो या औरत उसे केवल कमज़ोर बनाता है सशक्त नहीं। आपका पुत्र क्यों सशक्त बनता है क्योंकि बचपन से उसके जहन एक ही बात डालते हो ये तो लड़का है कर लेगा बस वह फूक जिंदगी भर उसे उड़ाए रखती है और उस लड़की जिसे कहते है ये तो लड़की है उसको सोने के पिंजरे में कैद कर देते है। कोमलता के नाम पर उसे परिवार की सबसे कमजोर कड़ी बना दिया जाता है। जिसने सही बात कर दी तो उसका मुँह चंद खोखली मिसालों से बन्द कर देंगे कि नारी तो मजबूत है जो बच्चों को जन्म देती है सर परिवार संभालती है इत्यादि बड़ी बड़ी बातों से उसके वजूद को, भावनात्मक परत से ढक दिया जाता है।

महिलाओं को अगर सक्षम बनाना है तो वास्तविकता में बचपन से उनके साथ वही व्यवहार करना होगा जो एक पुरुष के साथ होता है कोई भी ऐसा विन्रम व्यवहार कि वो लड़की है नहीं कर सकती उसके अंदर हीनता को जन्म देना है। अगर परिवार का पुरुष ही उसका सरंक्षक होता तो महिलाओं पर अत्याचार के ज्यादातर मामले में पुरुष परिवार से या रिश्तेदार नहीं होता।

कानून का फायदा भी वो तब उठा सकती है जब उसमें पुरुष के विरुद्ध जाने कि आत्म शक्ति का एहसास होगा।

मेरी उक्त बातें सब निर्रथक है अगर अब भी आप लड़की या महिला को मजबूत बनाने की बजाए उसे सरंक्षण की बैसाखी देना चाहते है। भगवान द्वारा ऐसी कोई कमज़ोरी नहीं दी गई कि महिला पुरुष की ताकत का मुकाबला नहीं कर सकतीं। समाज में अनेक ऐसे उदारहण है जा महिलाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया उसका मुख्य कारण उनकों बढ़ने के लिए सामान अवसर प्रदान करना था।

औरत को सम्मान के साथ होंसला दीजिए, सहारे की बैसाखी कमज़ोर बनाती है इंसान को असली पहचान उसकी समाज में लड़ने की हैसियत दिलाती है।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

बजट 2018: युवाओं का देश और युवा ही नहीं।

न मैं कोई अर्थशास्त्री हूँ , न कोई राजनीतिज्ञ
हाँ एक ऐसा देशवासी हूँ जिसकी उम्मीद होती है कि ख़ुशहाली सबके हिस्से आए, और उसका एक ही रास्ता होता है सबके जीवन यापन हेतु रोज़गार, नोटबन्दी, GST इत्यदि ऐतिहासिक फैसलों के बावजूद सरकार रोज़गार के अवसर देने में पूर्णतः विफल रही। इस आख़िरी बजट से उम्मीद थी शायद युवाओं के लिए कोई सौगात आएगी।

हालांकि सरकार ने गत वर्षों में स्किल इंडिया (ddukgy) नाम की योजनाओं से नए रोजगार सृजन की कोशिश की लेकिन अंतिम चरण में वो भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह लक्ष्य पूरा करने की होड़ में केवल खानापूर्ति बन कर रह गई। युवाओं को रोजगार के नाम पर मार्केटिंग कंपनीयों के शोषण के बाजार में झोंक दिया गया जोकि 5000 से 7000 के वेतन के रूप में लॉलीपॉप साबित हुई।
सरकार को चाहिए कि योजनाओं का किर्यान्वयन करते हुए लक्ष्य पूरा करने की होड़ की बजाए गुणवत्ता पर ध्यान दें। वोटबैंक की राजनीति देश को आगे बढ़ाने की बजाए खोखला बनाती जा रही है। आरक्षण जैसे मुद्दों की वजह से पहले ही समाज में युवाओं में नई खाई बनती जा रही है। एक शोषण को ख़त्म करने के रास्ते हम नए शोषण को जन्म दे रहे है। वो दिन दूर नहीं कब इस देश में आरक्षण को ख़त्म करने के लिए व्यापक आंदोलन होने के आसार है। युवाओं को भी कुछ मुद्दों पर निज हित को भुलाकर सामूहिक हितों को प्राथमिकता देकर फैसले लेने होंगे। शायद तब ही इनके लिए कोई सरकार संजीदगी से फैसले ले।

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

जन्मदिन की शुभकामनाएं

आपके ज़िन्दगी का नया पन्ना,
जो शुरू हुआ, आज नई भोर से

मेरी और से, आपको शुभकामनाएं
जीवन में नई दिशा और ऊर्जा आये

क़ामयाबी कदम चूमें, रिशतें साथ निभाए
रुकावटों के हल मिलें, रास्ते सुगम हो जाए

बरसों के आपके अनुभव में, नए हुनर आयें
नवसृजन व रचनात्मक सोच कीर्तिमान बनाए

होंठों की मुस्कान को उदासी छू भी न पाए
बढ़ते पल, बढ़ते लम्हें, बढ़ते दिवस और बढ़ते साल
शौर्य चढ़कर बोले, बनो दुनियां में एक नई मिसाल

# जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

#सुदामा के चावल की भांति, मेरी पंक्तियों को ही समझना भेंट, आपके लिए हजार अधीनस्थ कर्मचारियों
सा हूँ मैं, पर मेरे लिए चिन्हित गौरवमय अधिकारियों में से हो आप, ईश्वर सदैव आपका गौरव बनाए रखे।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस आने वाला हो तो सभी स्कूल और में रिहर्सल शुरू हो जाती है। गणतंत्र दिवस को भव्यता से मनाने के लिए पुरजोर प्रयास करते है। मगर शिक्षण संस्थानों से बाहर क्या होता है क्या आप जानते है?

कर्मचारियों के लिए 26 जनवरी एक छुट्टी का दिन होता है, आप लोगो के लिए भी 26 जनवरी सरकारी छुट्टी है पूछोगे किस बात कि तो कहेंगे 26 जनवरी की, आधे से ज्यादा लोग इतना भी नहीं बता पाएंगे कि गणतंत्र दिवस है उसका महत्व तो दूर की बात।

टुकड़ों में बंटे इस भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोने के लिए बना था भारत का सविंधान, जिसका मकसद था यहां रहने वाले लोग एक समान है चाहे वो किसी जाति, रंग, क्षेत्र या समुदाय से सम्बंध रखता हो। सबको समान अधिकार दिए गए। आज आधुनिक समाज उस मूल भावना को खो चुका है। तरक्की की अंधी दौड़ में सामूहिक हितों के एवज में निज हिट सर्वोपरि हो गए है। अब लोग सामाजिक कुरूतियों की बजाए , किसी एक समाज या व्यक्ति के हितों के लिए हिंसक प्रवृति से आंदोलन कर रहे है। हम जाने अनजाने उसी पथ की और भाग रहे है जिस पथ पर प्राचीन समय में अलग अलग रियासतों के राजा महाराजा करते थे।

मेरी नजरों में हमे गणतंत्र दिवस के समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ कुछ नवीनकरण भी करना होगा। संविधान की मूल भावना को जनमानस के पटल पर बिठाने के लिए, स्कूल कॉलेज के प्रांगण से निकलकर, नुक्कड़ नाटकों से लोगो को जागरूक करना होगा ताकि सही मायनों में संविधान की महत्ता को आमजन तक पहुंचाया जा सके। जय हिंद।

कड़वे शब्द बोलता हूँ