रविवार, 7 अक्टूबर 2018

ज़िन्दगी:- उलझे सवालों की किताब

हम में से ज्यादातर व्यक्ति पारिवारिक अथवा सामाजिक रिश्तों में असमंजस की स्थिति में रहते है, हमें मालूम नही होता कि हमारा कौन सा रास्ता सही है कौन सा गलत? इस कमोबेश में हम अक्सर उन लोगों से सलाह की अपेक्षा रखते है जिनको हम अपना शुभचिंतक या सुलझा हुआ व्यक्तित्व समझते है। जबकि ज्यादातर इन बातों में हम किसी दूसरे की सोच या समझ अपने जीवन में थोप लेते है।
उदारहण के तौर पर एक कुँवारा व्यक्ति जब किसी शादीशुदा से सलाह लेता है तो शादीशुदा आदमी उसकों अपने अनुभव बताने की बजाए जो कुंठा उसके जीवन में अथार्त जो खामी राह जाती है उन्हें उसके माध्यम से पूरा करवाना सुनिश्चित करें। वो कहेगा शादी का कोई फायदा नहीं शादी नरक होती है अकेले जीवन व्यतित करो, जबकि वो शादीशुदा जीवन के वो भावनात्मक पहलू बताना भूल जाता है या नजरअंदाज करता है जोकि अक्सर सभी महसूस करते है। शादी की वो रस्मे पहली बार हल्दी लगना, सभी रिश्तेदारों के केंद्र बिंदु बन खास अनुभव करना, जीवन में एक बार उम्मीद से बेहतर वस्त्रों को पहनना, घर में उसका एक अलग महत्व बढ़ जाना, नए रिश्तों का अपनापन इत्यादि बहुत से लम्हें वो नही बताता क्योंकि खुशियाँ हम जल्दी भूल जाते है और गमों का शरीर में घर बना देते है। विचारों के इस मंथन में हमेशा कोशिश करता हूँ अच्छे बुरे हर पहलू पर विचार करूँ। मेरी नजर में रिशतें बहुत मायने रखते है, लेकिन समाज कहता है कि रिश्तों में कुछ छिपा नही होना चाहिए जबकि मुझे लगता है हर व्यक्ति की निजता का स्थान होना आवश्यक है। पति पत्नि पर व पत्नि पति पर गिध्द की तरह नजर जमाते है और इस व्यवहार का परिणाम हमेशा उल्टा आता है, किसी एक को लगता है कि मेरे इतने त्याग के बावजूद मुझ पर भरोसा नहीं और वो वही गलती दोहराएगा, जबकि भरोसे की सूरत में किसी एक को लगेगा कि अपनी भावनाओं को नियंत्रण कर मुझे अपने हमसफ़र के भरोसे को कायम रखना है।

शेष फिर कभी अभी काम है कुछ.....

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2018

जिला करनाल को आज दिनांक 2 अक्टूबर 2018 को गांधी जयंती के शुभअवसर पर सम्मानित किया गया। यह गौरव जिला करनाल ने 1 अगस्त से 31 अगस्त 18 तक चलाये गए सर्वे में तय मापदंडों में बेहतरीन कार्य के लिए दिया गया
कैसे हुआ संभव?

सरकार द्वारा निर्देशानुसार 28 जुलाई 2018 को माननीय श्रम व रोजगार मंत्री श्री नायव सिंह सैनी द्वारा किताब का विमोचन तथा स्वच्छता शपथ दिलाकर, स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2018 का जिला करनाल में शुभारंभ किया गया।
डगर आसान न थी, भारत सरकार द्वारा तय मापदंडों में जिला करनाल 70 प्रतिशत कार्य में अव्वल था लेकिन उसका 30 प्रतिशत प्राप्त करना भी चुनौती का कार्य था जिसमें जिला प्रशासन द्वारा रणनीति तय कर 14 बिंदुओं को चिन्हित किया गया। सबसे पहले सभी गाँव में स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2018 के बैनर को ग्राम सचिवालय/पंचायत घरों में लगवाकर गाँव स्तर पर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया, इसके पश्चात जिला कार्यालय से 3 स्वच्छता रथों को माननीय उपायुक्त महोदय द्वारा हरी झंडी देकर रवाना किया गया, जिन्होंने सभी 382 ग्राम पंचायतों का भ्रमण कर सर्वेक्षण की जानकारी पहुंचाई। इन बिंदुओं में मुख्यतः गन्दा पानी न खड़ा हो उसके लिए सोखते गड्डो का निर्माण, कचरे के उचित निपटान के लिए गार्बेज पिट बनाना जिस दौरान यह ध्यान दिया गया कि गीले कचरे जैसे रसोई का कचरा, फसलों के अवशेष तथा गोबर के लिए हर गांव में कम्पोस्ट पिट का निर्माण करवाना सुनिश्चित किया गया। जिन घरों में आँगन में जगह थी उनको किचन गार्डन बनाने के लिए प्रेरित किया तथा रसोई का गीला कचरा खाद के रूप में इस्तेमाल करने को प्रेरित किया गया।
सभी सार्वजनिक स्थलों पर सूखे कचरे के लिए नीले व गीले कचरे के लिए हरे कूड़ेदान का प्रयोग या स्थानीय संसाधनों को जुटाकर  टीन के कनस्तर जैसे   सामान का कूड़ेदान के रूप में प्रयोग करने की मुहिम शुरू की गई। सभी सार्वजनिक स्थलों जैसे आंगनवाड़ी, स्कूल, चौपाल, हाट बाजारों पर श्रमदान करके  सफाई अभियान चलाया गया। लगभग एक सप्ताह तक गाँवोँ में मुनियादी द्वारा स्वच्छता सर्वेक्षण ग्रामीण 2018 बारे जागरूक किया गया। स्कूलों में विद्यार्थियों द्वारा स्वच्छता रैली निकालकर गांव गाँव जन जन तक स्वच्छता संदेश पहुँचाया गया। इसके साथ साथ नुक्कड़ नाटक, मोहल्ला सभा व निगरानी समितियों द्वारा सुबह शाम खुले में शौच मुक्त की निरंतरता बनाये रखने को ठीकरी पहरा दिया गया तथा सुनिश्चित किया गया गाँव में कोई भी व्यक्ति खुले में शौच न जाता हो। ग्राम स्तर पर जिला प्रशासन कि सभी इकाई जैसे आंगनवाड़ी वर्कर, आशा वर्कर, ग्राम सचिव, चौकीदार, सफाईकर्मी, स्वयं सहायता समूह आदि ने ग्रामीणों को जागरूक करने में अहम योगदान दिया। कुछ गांवों मरीन स्वयंसेवी व निजी संस्थाओं ने भी बढ़ चढ़ कर अभियान में हिस्सा लिया। ग्राम पंचायतों द्वारा भी गाँव में स्वच्छता स्लोगन की पेंटिंग करवाई गई। स्वच्छता में अहम योगदान कर लिए स्वच्छग्रहियों को सम्मानित किया गया। इसके साथ ऑनलाइन एप्प पर ग्रामीणों को सिटीजन फीडबैक भरने के लिए जागरूक किया गया जिसमें सक्षम युवा, आंगनवाड़ी वर्कर, आशावर्कर, जन प्रतिनिधियों, स्वयं सहायता समूह, व कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों ने अहम योगदान दिया।
इन सब कार्यों के उचित किर्यान्वयन हेतु अतिरिक्त उपायुक्त महोदय द्वारा पर्त्येक खण्ड के लिए नोडल अधिकारी बनाये गए जिनके द्वारा सभी गाँवों में तय मापदंडों पर कार्य की समीक्षा व करवाना सुनिश्चित किया गया। समय समय पर कि जाने वाली गतिविधियों की मीडिया रिपोर्टिंग द्वारा जन चेतना का कार्य किया गया। सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहकर, ग्रामीणों से  संपर्क बनाया गया।

जिला करनाल के लिए जनवरी 2017 में खुलें में शौच मुक्त का अचूक लक्ष्य, अगस्त 2017 में स्वच्छता पखवाड़ा में अग्रणी स्थान, इसी कड़ी में ग्राम स्वराज अभियान में बेहतर प्रदर्शन और अब स्वच्छता सर्वेक्षण ग्रामीण 2018 में अवार्ड मिलना मील का पत्थर साबित हुआ।

बुधवार, 26 सितंबर 2018

भावुक पल जिंदगी के

कौन कैसा है
अच्छा या बुरा

इस बात पर नहीं बात करनी , आज बात कहनी है एक व्यक्तिगत भावनाओं की, अक्सर हम कहते है कि केवल  बेटी जब बाबुल का घर छोड़ती है तो वो पल गम और खुशी एकमात्र पल होता है, मैं इसके पूर्णत विरोध में हूँ।

ऐसे भावुक पल जिंदगी में बहुत बार आते है बस कुछ महसूस करते है कुछ हल्के में गुजर देते हैं।

मेरे लिए ये पल बहुत बार आए, मुझे जब अपने दोस्त छोड़ने पड़े, वो हालांकि अपने उम्दा भविष्य के लिए आगे बढ़ जाते है। उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना तो होती है ख़ुशी का पल होता है, ठीक वहीं दिल में जोर से कसक उठती भी है। और लगता है सब छूट रहा है। और ये बात आपके दिल में ही घर कर जाती है, कुछ लम्हों बाद दिल उन दोस्तों की अच्छी यादों को नसीब मानकर एक मन मंदिर में तस्वीर बना देता है।

बस यूँ दिल भावुकता के पल को सँजो लेता है।

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

शिक्षक

शिक्षक

मेरे लिए उस दिए के समान है जो aghyanta के अंधकार में शिक्षा रूपी रोशनी से सृजन करता है।

शिक्षक

मेरे लिए उस कुम्हार के सामान है जो मुझ माटी को एक आकार में ढालकर, समाज में दिशा और दशा प्रदान करता है।

शिक्षक

मेरे लिए वो रास्ता है जो मेरे जीवन को मंजिल तक पहुँचाता है

शिक्षक

और क्या कहूँ
शिक्षक ही वो स्तम्भ है जिसपर मुझे रचने का भार है, शिक्षक ही मेरे जीवन का सार्थक आधार है

रविवार, 15 जुलाई 2018

चॉकलेट की जैसी हो तुम

चॉकलेट की जैसे हो तुम

घुल जाती हो, होंठो से लगाते ही
ख़ुमारी छा जाती है नशे सी
चॉकलेट की जैसे हो तुम

कभी कभी कड़वी भी लगती हो
पर आदत है कि छूटती नही तुम्हारी
चॉकलेट की जैसे हो तुम

महँगी भी बहुत हो,
इसलिए अक्सर ख़्वाहिश मिटा देता हूँ
खुशबू से महक लेता हूँ
चॉकलेट जैसे हो तुम

बर्दशात नहीं होता, जब तुम किसी के पास हो
मेरी आँखों में नमी होती जब उदास हो तुम
खुशी को तेरी दूर चला जाता हूँ
यादों में खुद को भी भूल जाता हूँ
बिल्कुल
चॉकलेट जैसे हो तुम

लिखता तुम से हूँ, तो औरों की क्यों बात करते हो
इरादे तुम बदल लेते हो, मौसमी समाज से डरते हो
फिर मेरी खामोशी पर आहें भरते हो
चॉकलेट जैसे हो तुम

मालूम नहीं कब पढ़ते हो मेरे अल्फाज़
तुमसे बात कहने का एक ये ही है अंदाज
मेरी पहुँच से दूर हो गए हो तुम
चॉकलेट जैसे हो तुम

महंगे और शौकीन
खुशबू और हसीन
चॉकलेट जैसे हो तुम

कभी कड़वे तो कभी मीठे
नशा वन रगों में बस जाते हो
हाँ तुम ही तो
चॉकलेट जैसे हो तुम

#दोस्त #दुश्मन

बुधवार, 11 जुलाई 2018

माँ के दिल से

प्रिय हो तुम,
मेरे श्वास से भी ज्यादा
#कड़वाशब्द
माँ शब्द ....माना कि सँसार है
पर शिशु ही ममता का आधार है
#कड़वाशब्द
तेरी अठखेलियों से खिलती हूँ,
तुझ से ही, मैं खुद से मिलती हूँ
#कड़वाशब्द
शिकन तेरी, मेरी बेचैनी बढ़ाती है
माँ की मुस्कान, तेरी हँसी से लौट आती है
#कड़वाशब्द
रोज तेरी नई लीला, माँ का आनंद बन जाती है
शिशु की किलकारी, माँ के आंगन की बाती है
#कड़वाशब्द
ममता के चिराग में, रोशनी भर भर आती है
जब माँ की गोद एक नन्हें फूल से महक जाती है
#कड़वाशब्द
माँ की बात आज तुम्हें एक माँ ही सुनाती है
ममता रूपी दिए कि शिशु से अलख जग पाती है
#कड़वाशब्द
तुम बिन हर शब्द ममता का अधूरा है
मेरे शिशु से ही मेरा परिवार भरा पूरा है
#कड़वाशब्द
तो माँ की ममता के बखान में याद रखना जरूर
हर माँ के लिए उसका शिशु होता है उसका ग़ुरूर
#कड़वाशब्द
तेरे माथे को चूम कर जो सकूँ मिल जाता है
वो एहसास ही मुझे, माँ होने का हक़ दिलाता है

एक माँ की कहानी ....उसकी जुबानी

गुरुवार, 21 जून 2018

सन्त बनाम मानव

सन्त एक शब्द अगर आप किसी के लिए प्रयोग करते है तो अनायास एक सम्मान की भावना उमड़ पड़ती है परंतु समय के साथ भ्रांतियां जुड़ने लगी और हमने ऋषि, धर्मगुरुओं, समाजसेवियों व अन्य गणमान्य पुजारी इत्यादि लोगो को सन्त कहना शुरू कर दिया। उसका वास्तविक कारण आधुनिकता के दौर में असली संतों का न मिलना है।

सन्त है क्या?

वो मनुष्य जो ग्रहस्थ जीवन को त्याग , गृहस्थी में लीन लोगों के कल्याण के लिए निकल पड़ता है। नही समझें? कुछ आधुनिक युग के हिसाब से कहुँ तो वो अनुभवी व्यक्ति जो मनोदशाओं और परिस्थितियों के
ज्ञान से पारंगत , सामान्य व्यक्तियों को उनके समाधान या कल्याण के लिए अपने ज्ञान का संचार करता है। उनका मकसद कभी एक स्थान पर रहकर डेरा जमाना नहीं होता था वो निरंतर ज्ञान के प्रकाश से रोशन करते हुए आगे बढ़ जाते थे, उन्हें किसी समस्या या तकलीफ़ का ज्ञान होता था क्योंकि भ्रमण से से उनके ज्ञानकोष में निरंतर वृद्धि होती रहती थी, भावनाओं पर नियंत्रण कर वो एक मशीन की भांति कार्य करते थे ,

उदाहरण के तौर पर किसी की मृत्यु हो जाती है तो हम काफी विलाप करते है परंतु हमारे जानकर व रिश्तेदार हमे सांत्वना देते है कि प्रकृति का नियम है, क्योंकि वो भली भाँति परिचित कि किसी के जाने से कभी संसार नहीं रुकता। ठीक वैसे सन्त इन भावनाओं को दूसरे के माध्यम से साध कर स्वयं को इतना परिपक्व बना लेता है कि दुख और सुख के समय मनुष्य कुछ पल को अधीर हो जाता है, सन्त जानता है कि जब उसके मानसिक पटल से वह आघात पहुँचाने वाली बात वक़्त के साथ धूमिल हो जाएगी तो फिर वह मुख्यधारा में लौट आएगा, इसलिए वह उस वक़्त संजीवनी की भांति अन्य उदाहरणों से,  युक्तियों से उसका समाधान कर देता है। मेरी नजर में दो महापुरुष है जिनको मेने जाना है एक बाबा नानक और दूसरा गौतम बुद्ध , जिन्होंने सन्त शब्द को पूर्ण रूप से परिभाषित किया है। हालांकि मेरे ज्ञान से बाहर अन्य भी काफी सन्त हुए है।

आप कहेंगे कष्ट निवारण तो डॉक्टर भी करता है तो वह भी एक सन्त हुआ, एक वकील भी कानूनी समस्याओं से बाहर निकालता है वो भी सन्त हुआ, एक शिक्षक भी अज्ञानता के अंधेरे से ज्ञान के प्रकाश में ले आता है तो वह भी सन्त हुआ, पर मैं खंडन करता हूँ क्योंकि सन्त सांसारिक सुखों के लिए कार्य नही करता कि आपके गृहस्थ समस्याओं या जीवन यापन के लिए कुछ समाधान करेगा, उसका कार्य आपको आध्यात्मिक रूप से समग्र बनाना होता है वह चंचल मन को बांधने की प्रक्रिया पर बल देता है, वह यह फर्क समझाता है कि डॉक्टर कहता है ये दवा लो आपका रोग ठीक हो जाएगा, सन्त कहते है ये नियम अपनाओ रोग ही नही आएगा। वकील कहता है भाई से जायदाद किस तरह से हासिल होगी, सन्त कहता है कि भाई को हासिल करलो जायदाद का मोह ही छूट जाएगा, शिक्षक कहता है इस ज्ञान को प्राप्त करने से , तुम सांसारिक सुखों को प्राप्त कर सकते हो जबकि वो नही कहता उन सुखों के साथ दुख भी साथ आते है, दुख भी एक प्रक्रिया है और सुख भी लेकिन सन्त इन दोनों परिक्रियाओं में स्थिर रहने का भाव सिखाता है, सन्त हिंसक समाज को अहिंसा का मूल्य सिखाता है। सन्त समाज को व्यर्थ के तनाव से दूर रहने का मार्ग दिखाता है, सन्त को क्रोध नही आता वो मुस्कराने की कला में पारंगत होता है उसे आभास होता है कि क्रोध के पल मिटने पर, मनुष्य को जो पश्चाताप अनुभव होगा वह इस क्रोध से भी भयावह है जब वह स्वयं ग्लानि के भाव से गुज़रेगा। सन्त जीवन को संजीवनी देता है , बस कोई सन्त आपको मिल जाये तो आपका जीवन भी महक उठेगा।

गुरुवार, 14 जून 2018

तुम हाँ तुम

तुम हाँ तुम
प्रेरणा बनी थी मेरे कलम की

बड़े फ़रेबी अंदाज से, मुझे समझाया था
खुद के दासी होने पर मुझे मालिक बताया था

तुम हाँ तुम
जिसने मुझे हँसना सिखाया था

एक राह दिखाई थी, कि दुनिया बड़ी हसीन है
ऐसा उड़ा था मैं, जैसे तू ही मेरा मोहिसिन है

तुम हाँ तुम
जिसके खातिर उसूलों को छोड़ दिया

उतर गए मेरे कोरे मन में, जैसा चाहा लिख डाला
मोहब्बत होने लगी थी ज़िन्दगी से, तो बदल गया

तुम हाँ तुम
जिसने मेरी शराफ़त को निचोड़ दिया

मासूमियत भरी मेरी सीरत को, फ़रेब से रूबरू कर दिया
तन्हाई में बहने वाली तन्हा रगों को, जुदाई के दर्द से भर दिया

तुम हाँ तुम
जिसने मुझे तन्हा से रुसवा कर दिया

शिकवा करते है मुझ पर लिखते नहीं वो
जिनकी तारीफ़ से, मेरी कलम ही रूठ गई

तुम हाँ तुम
जिसकी वजह से जीने की वजह ही छूट गई
😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢

शनिवार, 9 जून 2018

सक्षम युवा:- एक कदम हुनर की और

गत दिनों सरकार द्वारा योजना चलाई गई, 'सक्षम'

इस योजना का मकसद बेरोजगार शिक्षित युवाओं को रोजगार का प्लेटफॉर्म मुहैया करवाकर हुनरमंद बनाना था। इस योजना से कर्मचारियों की कमी झेल रहे विभागों को भी फायदा मिला। कुछ विभागों के लिए यह योजना संजीवनी साबित हुई ठीक वैसे उन युवाओं के लिए भी जो लग्न से कार्य करना चाहते थे उनको संबंधित विभागों द्वारा नियमित कार्य दिया जाने लगा, प्रारम्भ में जो कार्य माह तक सीमित था वह अब 6 माह व उससे अधिक दिया जाने लगा।

मुझे भी गत सप्ताह सक्षम युवाओं के साथ काम करने का मौका मिला, मुझे अपना वो समय याद आया जब लगभग 6 वर्ष पूर्व मेने भी सरकारी कार्यालय में कार्य करना प्रारम्भ किया था। मेरे संकोची स्वभाव के कारण मैं कभी किसी कार्य से किसी अधिकारी को मना नही कर पाया शायद उसका परिणाम मुझे समय समय पर नए चुनौतीपूर्ण कार्य करने को मिले, जिसके पश्चात अनुभव में बढ़ोतरी होती गई।

सक्षम युवाओं के साथ जो मेरा अनुभव रहा वो इस प्रकार था:-

सामान्य:- कुछ युवाओं के लिए ये योजना मात्र थी जिनका मकसद केवल सरकारी योजना का आर्थिक लाभ उठाना होता है वो युवा या तो कार्य की कठिनता से घबरा छोड़ जाते है या बेहतर युवाओं के सहारे समय पूरा कर लेते है।

मध्यम:- कुछ युवा जोशीले होते है कार्य करने में उत्साहित रहते है पर इन युवाओं से कार्य करवाने के लिए एक सूझबूझ वाले प्रबंधक की आवश्यकता होती है। जिसके मार्गदर्शन में ये बेहतर युवा बन सकते है।

बेहतर:- इन युवाओं में गजब की क्षमता भरी होती है, केवल कौशल प्रशिक्षण की कमी के कारण , विभाग इनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल नही कर पाते, इन युवाओं में अपने कार्य को करने की गजब की लगन होती है। ये तय समय मे कार्य पूरा कर लेते है।

निजी अनुभव के आधार पर सक्षम युवाओं के लिए कुछ सुझाव:-

1. अनुशासन :- अक्सर सक्षम युवाओं में अनुशासन की कमी देखने को मिलती है, हमे स्कूलों में भी बचपन से सबसे पहला सबक अनुशासन का सिखाया जाता है जोकि अक्सर वक़्त के साथ अव्वल की होड़ में हम भूल जाते है। अनुशासन से अभिप्राय समय की पाबंदी, ईमानदारी से कार्य व आदेशो की पालना है। अधिकारी हो सकता है कि अपने कार्य की गर्ज में आपके व्यवहार को नजरअंदाज करदे, लेकिन ये आपके भविष्य को प्रभावित करने का प्रथम कारक साबित होगा।

2. अधिगम कौशल (सीखने की लग्न):- हर व्यक्ति सभी क्षेत्र में निपुण हो ये आवश्यक नही, लेकिन जब किसी क्षेत्र में हमे अनुभव न हो तो हमे उस क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के कार्य के तौर तरीकों को गंभीरता से सीखना चाहिए, ये समझ कि यह तो मेरा कार्य नही आपकी संकीर्ण सोच को दर्शाता है आगे बढ़ने के लिए जीवन मे फूलों की सेज नही कांटों के भंवर से गुजरना पड़ता है। इसलिए जब कभी कठिन कार्य मिले तो उसके सरल उपायों(शॉर्टकट) की बजाए निपुण व्यक्तियों के सानिध्य में  तय मापदंडों के अनुसार कार्य करना चाहिए।

3. ऊर्जावान:- रास्ते कठिन होंगे तो तय है कि ऊर्जा का भी क्षय होगा, तो उस स्थिति में स्वयं को नकारात्मक ऊर्जा से बचकर स्वयं को सकारात्मक ऊर्जा से आगे बढ़ना चाहिए । किसी भी कार्य की सफलता आपके हाथ नही है लेकिन कोशिश पर आपका नियंत्रण है,  न हार मानने का जज़्बा एक दिन सफलता को अवश्य प्राप्त करता है।

सक्षम योजना आपके लिए कार्य सीखने का प्लेटफॉर्म है न कि जीविका का साधन, इसलिए अपने को हुनरमंद बनाये और योजना के माध्यम से बने अवसरों से आगे बढ़ने की कोशिश करें।

सोमवार, 21 मई 2018

पराकाष्ठा जिल्लत की

जिल्लत भरी है उसकी बातें , रोज जलता हूँ

सहनशक्ति की भी सीमा होती है, खुद की जुबान पर नियंत्रण न कर, अक्सर दूसरों को कोसते है कि वो ऐसा वो वैसा, क्यों भूल जाते है कि जब तुम्हारी खँजर जैसी बातें किसी के दिल को लगेगी कुछ तो फर्क पड़ेगा, बस एक क्रिया पर प्रतिक्रिया तुरन्त कर, मसलें को वही बराबर कर लेता है जबकि अन्य सीने में दर्द पाल उस राह से दूरियाँ कर लेते है।
महफिलों में अक्सर आपको यूँ ताने कसने वाले मयल जाएंगे जिनको सिर्फ निज स्वार्थ या इच्छापूर्ति की विफलता के कारण बस औरों को निशाना बनाना होता है।
अब दलित शब्द को ही ले लो, वो होता है जो समाज में कुचला गया हो जिसका शोषण हुआ ये जाति से सम्बंधित नही होता जबकि समाज में होता उल्टा है, एक जाति पर दलित का लेबल लगा देंगे, जबकि कुछ जगह अक्सर देखा गया कि उसी जाति का सम्पन्न व्यक्ति अपनी ही जाति के निर्बल का शोषण करता है।

पहले आप रिश्ता बनाते हो
फिर रिश्तों की दुहाई से रिश्ता तोड़ देते हो...
फिर आपके फैसले के सम्मान में कोई पीछे हट जाता है
तो फिर आपको लगता है कि आपका ये भी अपमान हुआ, मतलब आपकी सुविधाओं के अनुसार सँसार नही तो आप सब राख कर दोगे, इसी मानसिकता के आधार पर कुछ लोग अक्सर दूसरों के जीवन में ज़हर डालते है।

जबकि असली रिश्ता एक बार जुड़ गया तो आप चाह कर भी उस इंसान का बुरा सोच भी नही सकते, कहना तो दूर ....और जो सर्वनाश की बातें करें तो आप उनकी मानसिकता का अंदाजा लगा सकते है,

सभी दोस्तों से निवेदन है कि बेशक़ आप निभा न पाओ दोस्ती के अन्य मायने, मगर उसके शुभचिंतक बन हमेशा रह सकते है बशर्ते आपके पास एक सुंदर दिल हो।

रविवार, 20 मई 2018

मैं विकास हूँ

मैं विकास हूँ
नाम से विकास हूँ
पर बौद्धिक विकास नही

क्यों.....

बचपन में बुजर्गों के पास बैठता था
अच्छी बातें सुन, अच्छाई डालता गया

फिर स्कूल गया, किताबो में भी कुछ ऐसा ही था
अच्छाई की जीत होती है झूठ की हार होती है

स्कूल हुआ, कॉलेज हुआ अब वो वक़्त आया
जब मैने पहली बार,..... जिंदगी हो था छुआ

कर्म करने को, मेने जैसे ही पहला कदम बढ़ाया
कर्म से पहले, जी हजूरी ने मुझे थप्पड़ लगाया

उम्दा और बेहतरीन है हुनर तुम्हारा, जो चलता नहीं
पकड़ बनाओ, झूठ पर....सच है कहीं बिकता नहीं

जो बिक जाता है वो ही बाज़ार में टिक जाता है
उसूलों और सिद्धांतों को, किताबों में बन्द कर दिया

पेट की भूख और काया के शौक ही नज़र आते है
सच की राह चलने वालों के बच्चे भूख से बिलबिलाते है

ये तो सबक थे व्यापार के, फिर रिशतें मिले प्यार के
सुहावने थे, मिश्री भी फ़ीकी पड़ गई उनके अंदाज से

क़ायदे सुविधा से बनाए, दिल किया तो भगवान समझा
उसी दिल ने ली करवट तो तीखें खँजर सीने में चुभाये

वाह री दुनियां, कब्र बना दी , जिन्दा इंसानों की
ज़रूरत से बने व्यापार, जरूरत से किया प्यार

विकास तो मखौल हो गया...भीड़ की दौड़ में

अच्छाई से मेरा भी दामन छुड़ा दो
जिन्दा कंकालों से मेरा भी रिश्ता बना दो

#जसजसजककसब्सब्जसजसम्सम्सब्ज़बजकजज़्सब

बुधवार, 2 मई 2018

शुभचिंतक vs मैं अथार्त गुनाहगार।

बात शुरू कहाँ से करूँ समझ नही आ रहा, उनके वक्तव्य से नजर आ रहा है कि जहां में सबसे बड़ा दोस्त का दुश्मन में ही हूँ। मैं शायद इस वजह से भी मुझ में खामियां हो क्योंकि मैं में ज्यादा रहता हूँ, मेने अक्सर दोस्तों को समझाने की कोशिश कि कौन अच्छा है कौन बुरा, तुम्हारे सामने जो अच्छे बनते है वही पीठ पीछे आपकी बुराई करते है, बस मेरा ये गुनाह ही था कि मैं गुनाहगार हो गया। या तो वो उनके इतने प्यारे थे कि मेरी बातें महत्वहीन हो गयी या फिर उनको भी अच्छे से पता है पीठ पीछे बुराई होती है मगर किसी का कुछ किया नही जा सकता , मानव प्रवृति ऐसी है। जो भी है पर मुझे चोट बहुत लगती है, एक सत्य ये भी है कि मेरी चोट का मूल्य वहां नही हो सकता जहां दोस्त को खुद की असुविधा हो। कोशिश जारी करने लगा हूँ कि अब किसी को भी किसी के पीठ पीछे के कथन को न दोहरा सकूँ। दोस्ती के पैमाने पर में जीरो हो चुका हूँ, क्योंकि चुनिंदा दोस्तों में से आज कोई मेरे पास नही, एक इल्जाम ये भी आया कि मैं दोस्त लाभ के लिए बनाता हूँ ह्म्म्म मानता हूँ  अकेलेपन को दूर करने के सिवा कोई ऐसा स्वार्थ न था जिसके लिए मेने दोस्त बनाया हो, फिर भी आज कठघरे में खड़ा कर दिया गया।

इतना सत्य है कि दोस्तों से मेरा मोहभंग भी जब हुआ मुझे उनकी सख्त जरूरत थी और वहां न मिले, इसके कारण तो सही भी है मुझे लाभ के लिए दोस्त चाहिए था पर जो नराज है वो भी समझे क्या उनका कोई लाभ या स्वार्थ न था। मेरा तो कल भी वही व्यवहार था और आज भी वही है, जो प्रेम से बोले तो कभी ख़ामोश नही रहता पर जब आप तानों के बाण से बतियाओगे तो कहां से शब्द निकलेंगे, जब दिल ही घायल हो चुका होगा, फिर इल्जाम आएगा तुम शब्दो के माहिर हो,अरे वो शब्द भी तो दिल से निकलते है वो भी तो मेरे है, जब दिल दुखाने वाले शब्द मेरे है तो मरहम वालों पर क्यों यकीन नही करते दोस्त। मेने जिसे दोस्त माना आज तक उसका बुरा न चाहा, हां जो खामियां मुझे लगती शायद उनपर विचार किया हो लेकिन कभी बुरा नहीं चाहा, पर मेरे दोस्त कुंठित होकर इतना बुरा कह देते कि रब्ब से मौत ही मांगना बेहतर लगता है किसी एक का भी दिल दुखाया तो जीवन किस काम का....

लाख बुरा हूँ मैं... पर तेरी बुराई न चाहूँगा
तुम बेशक़ कत्ल कर दो मेरा...उफ़्फ़ न होगी

कड़वे शब्द बोलता हूँ