मंगलवार, 5 नवंबर 2024

स्वच्छता योजना नहीं आचरण हो

स्वच्छता के बारे में सभी प्रशिक्षण तकनीकी बातें तो आपको बता देंगे लेकिन तकनीक से भी अलग स्वच्छता का एक पहलू है व्यवहार परिवर्तन, आप सब को यह तो अवश्य पता होगा कुछ बरस पहले गांव की फिरनी व आसपास के खेतों में खुले में शौच के कारण मल पड़ा हुआ मिलता था लेकिन यह नहीं पता होगा कि ऐसा क्या हुआ जो आज सभी लोग खुलें में शौच की बजाए शौचालय का प्रयोग करने लगे
तो उसका बेहतरीन टूल है
 व्यवहार परिवर्तन
लोगों के आचरण में बदलाव से ही संभव हो पाया यह सब, न कोई पैसा लगा न कोई योजना , काम आया सिर्फ लोगों में जागरूकता का अभियान उनके आचरण को बदलने के टूल।

ठीक उसी तरह अब भी हमें लोगों ने इतनी जागरूकता करनी होगी कि उन्हें मालूम चले कि एक गंदगी से उनके स्वास्थ्य और जेब पर कितना असर पड़ता है, कूदे या कचरे का व्यक्तिगत अथवा घरेलू स्तर पर ही निपटान हो जाए तो सब बदल जाएगा। बाहर कूड़े के ढेर नहीं होंगे, सर्वत्र स्वच्छता का वास होगा। 
फिर सवाल उठता है करें कैसे?
तो आसान सा जवाब है गांव मोहल्ला में जब भी कोई सभा हो तो एक स्वच्छता का संदेश इफेक्टिव तरीके से दिया जाए तो जब बार बार सभी वही बात करेंगे तो आने वाली पीढ़ी और जनमानस के मस्तिष्क पटल पर स्वच्छता की छाप छूट जाएगी सभी अपने स्तर पर भागीदारी करके समाज और अपने गांव को स्वच्छ रखेंगे। 

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

टकराव स्वाभिमान का

आज अपमान का एक और अध्याय मेरे जीवन में जुड़ गया, आज पहली बार था मेने आक्रमकता के साथ विरोध जताया, उसके फलस्वरूप हुआ यह कि मुझे नौकरी छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन यह फैसला काफी दुविधा भरा है क्योंकि मेरे सिर की जिम्मेदारियां मुझे अपमानित होने को भुलाने को कह रही है। जबकि मेरी अंतरात्मा स्वाभिमान के लिए नौकरी छोड़ने को। कभी भी दो लोगो की लड़ाई में एक की गलती नहीं हो सकती लेकिन अक्सर फैसला व्यक्ति के प्रभाव के कारण होता है। आमतौर पर दफ़्तर में उस व्यक्ति जोकि सुप्रीडेंट के पद पर कार्य करता है उसकी बदतमीजी का सामने जवाब देने की बजाए लोग बाहर आकर तरह तरह की गालियों से करते है। कभी उनकी विकलांगता पर तंज कसते है तो कभी उनके गंजेपन पर, यह काफी व्यावहारिक प्रचलन है। उनकी अक्सर आदत है बिना मतलब के दूसरों की बुराइयां करने की, इस बारे मेने अपने मुख्य कार्यकारी अधिकारी को पहले ही सचेत भी किया था। मगर जाने क्यों उन्होंने इग्नोर किया। आज भी वही हुआ कि डीपीएम वीसी के लिए सेक्टर 12 जा चुके थे। उन्होंने वहां से कॉल किया कि गोवर्धन कैमला गांव का जो रिप्लाई भिजवाया था वो भेज दे। मेने उनसे फाइल पूछी तो उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप से मिल जायेगा। तब ही इंटरकॉम पर तीव्र लहजे में बोलते हुए सुप्रीडेंट ने कहा कि साहब लेटर मांग रहे है, मेने वही रिप्लाई दिया की फाइल में संधू साहब को पता वो नहीं है। उन्होंने कहा कि फाइल से ढूंढ कर लाओ। इतने में फिर से संधू सर का कॉल आया कि साहब ने वीसी के लिए सेक्टर 12 बुलाया है। मेने जल्दी में मेल से लेटर ढूंढा और संधू सर को व्हाट्सएप कर दिया। सुप्रीडेंट सर का नंबर न होने के कारण, मेरे ध्यान से निकल गया और मैं टॉयलेट चला गया। टॉयलेट से निकलते ही कमरे में एंटर होते ही विवेक डीपीएम ने कहा कि सुपरिडेंट सर बुला रहे, तो मैं तुरंत उनके पास गया तो वहां उनकी टोन वही बदतमीज लहजे वाली थी (जोकि उनके नालायक सहकर्मियों को काफी सौहार्दपूर्ण लगती है क्योंकि उनका समय उनके पास कैमरे की निगरानी से दूर चापलूसी करने में बीतता है। ) मेने कहा सर बड़ी पोस्ट होने कोई बड़ा नहीं बनता तमीज भी होनी चाहिए बात करने कि कह दीजिए सर को मेने नहीं दी। ऐसा कहते ही मैं निकल गया तो मुझे जाते हुए को कहा थप्पड़ लगेंगे तेरा, मैं वापिस आया और तैश में बोला कि मार कर दिखाना, राकेश पीओ साथ में खड़ा था उसने रोकने की एक्टिंग की, (क्या किसी तैश में आए व्यक्ति को कोई रोक सकता है आज तक तो किसी से कोई रुका नहीं) वो सिर्फ बदतमीज आदमी को एहसास कराने का तरीका था कि गलत बोलने के क्या दुष्प्रभाव भी हो सकते है। खैर ये अंग्रेजो के बनाए अधिकारी इनको कार्य लेने से ज्यादा स्वयं कि खुशामद वाले कर्मचारी पसंद होते है। सुप्रीडेंट ने फिर कहा निकल जा यहां से तो मैं निकल आया। फिर बदतमीज में कुछ बोले तो मैं जाते हुए कह गया आपका लहजा बता रहा है कि तमीज क्या है।  इतना कह कर मैं वहां से वीसी के लिए निकल गया। इसके बाद इतनी देर में मैं वीसी से आया तो सभी दफ्तर के कर्मचारियों को उन्होंने अपने संस्करण को इतना रटा दिया कि अपने शब्दों में साथ बैठे कर्मचारियों में घोल दिया। वो कहते है न एक झूठ को 100 बार दुनियां को सुनाए तो वो सच लगने लगता है। और इतने में उन्होंने वही कर दिया। मुझ से साथ वालो ने वीसी के बाद आने पर पूछा मेने सिर्फ इतना कहा कि हम तो लड़ लिए अधिकारी के लिए मुसीबत हो जायेगी फैसला करने की। क्योंकि सच अक्सर इस तरह कि लड़ाई में बाहर नहीं आता इसमें कभी एक की गलती नहीं होती एक उकसाता है तो दूसरा उग्रता दिखाता है, एक भी शांत स्वभाव का हो तो झगड़ा टल जाता है। 
खैर 4 बजे सीईओ सर का फोन आया, मेने सारा पक्ष सही से रख दिया तो उन्होंने बुजुर्ग है सॉरी बोलने को कहा सुप्रीडेंट सर को, तो मुझे पता था सॉरी बोलने जाऊंगा तो फिर वही बदतमीजी का सामना करना पड़ेगा। मेने सर को बोल दिया आपके सामने ही सॉरी कह दूंगा जी। तो यहां मेने सीईओ सर के शब्दों का मान रखने के लिए अपने को कमजोर साबित कर दिया। खैर साढ़े 4 बजे सुप्रीडेंट तो अपने सिखाए सभी कर्मचारियों को लेकर पहुंच गया। और जो पाठ उन्होंने 2 घंटे से सिखाया उन शब्दों को सीईओ सर के समक्ष उकेर दिया। मेरे मन में तब तक भी यही था कि सीईओ सर की बात का मान रखना है बुजुर्ग होने के नाते सॉरी बोलना है और निकलना है। पर जब उन सब ने चक्रव्यूह रचा तो मैं निहत्था हो गया और उन सबकी सुनता रहा, उनके झूठ में न्याय नहीं केवल पद के अहम को ठेस पहुंचने की बात थी। 

आरोप:- कि मेने उनका सम्मान नहीं किया जानबूझ को गलत कहा
जवाब:- अगर उनके पद का सम्मान नहीं करता तो क्या उनके बुलाने से जाता, वीसी के बहाने वहां से निकल भी सकता था बिना मिले, जैसा अक्सर दफ्तर में सब करते है। 
आरोप:- कि मेने सम्मान से बात नहीं कि बड़े छोटे सबसे सम्मान से बात करनी चाहिए। सभ्य नहीं है ये।
जवाब:- क्या सम्मान से बात करना बड़े अधिकारी/कर्मचारी पर लागू नहीं होता। तुझे थप्पड़ मारूंगा कहने वाले की जुबान सभ्यपन के चर्म को छू रही थी। 
आरोप :- कि मेने कहा इसके जैसे बहुत सुप्रीडेंट देखे।
जवाब :- बिलकुल कहा, क्योंकि उसका पहली बार नहीं था मुझे अपमानित करना, एक दिन निगम से DLTF की मीटिंग से आया इसने धमका कर मुझे गाड़ी से बाहर निकाला और मैं पैदल दफ़्तर आया। फिर दफ़्तर कहता फिरता जब विजिलेंस मॉनिटरिंग कमेटी की मीटिंग थी कि पत्रकार बुलाओ इसकी गाड़ी के पीछे ऑन गवर्मेंट ड्यूटी लिखा है। लेकिन इसके बावजूद मेने इनसे बचने की कोशिश की क्योंकि मेरे स्वभाव में गलत सहने की कोई गुंजाइश नहीं। अगर गाली या अपशब्द कहने कि आदत होती दूसरों के पास जाकर गाली देने से मन हल्का हो जाता। तो सबको बेहतर लगता। 

खैर फिर भी मेने सीईओ सर के कहने से 3 बार सॉरी बोला और वहां से आ गया। बाहर जिस संजीव को मैं सुपरीडेंट का खास समझता था बल्कि उसने उनकी गलती निकाली कि सुपरिडेंट अक्सर सबको गलत बोलता है। फिर भी नगर निगम से बाहर आकर मॉडल टाउन तक जाते जाते, जाने कौन से दर्द ने दिल को लपेट लिया कि फूट फूट कर एक घंटे तक रोया। दुखी मन से सीईओ व डीसी सर को मेसेज भी किया, जवाब नहीं देख 10 मिनट में डिलीट भी कर दिए क्योंकि उनकी न्याय व्यवस्था देख मन दुखी था। कहीं जॉब में निकम्मा होता या पैसा कमाया होता शायद व्यक्ति नीवा पड़ जाता है। लेकिन जिसने सिर्फ काम को ही सब कुछ माना हो उसके लिए स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं होता।

अब कैसे उस छत के नीचे काम कर सकता हूं सुप्रीडेंट के साथ , वो आगे भी वही बदतमीजी करेगा क्योंकि उसके पक्का कर्मचारी और बड़े पद होने का जो लाभ मिला है। वो और अहंकार से भर जायेगा। 
और जब गलत ही मैं निकला हूं तो मुझे अधिकारी के सम्मान में स्वयं इस्तीफा दे देना चाहिए, मेरे अनुसार सुप्रीडेंट गलत है वो कहीं जा सकता नहीं तो फिर भी मुझे ही जाना होगा, दुविधा में मेने सीईओ सर से कल की छुट्टी लेकर कोशिश तो की है कि तीन दिन में मन शांत हो जाए। लेकिन ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा तो सोमवार को पेट और स्वाभिमान में से कौन जीतता है तो देखते है। 

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

दर्द का ट्रिगर

15 मार्च 2023 का दिन मैं तो भूल गया था लेकिन आज मेरे दोस्त के दो दिन के जन्मे बच्चे की ठाकुर हॉस्पिटल करनाल में हालत देख कर, मेरा अपना दर्द भी ट्रिगर हो गया, मेरे सामने उस भयानक दिन के सारे लम्हें एक पल में आंखों के आगे से गुजर गए, 14 मार्च को बेटे की पट पर लोहे का बेंच गिरने से हड्डी टूट गई थी। डॉक्टर ने अगले दिन ऑपरेशन ही इलाज का एकमात्र विकल्प बताया, मेने भी मेडिकल विद्या के आगे नतमस्तक हो कह दिया जैसा डॉक्टर साहब आपको ठीक लगे। 
15 मार्च की सुबह 8 बजे डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर लेकर गए तकरीबन 10 बजे उन्होंने मुझे ही आईसीयू में बुलाया, वीर निरंतर रोता और सिसकता जा रहा था। एक पल भी गैप दिए बिना वो जैसे रो रहा था मेरा दिल बैठ रहा था। डॉक्टर ने उसे एक खड़तल से 3 घंटे तक पड़े रहने के निर्देश दिए। मेरा एक हाथ उसकी कमर पर स्पॉट दिए तथा दूसरा मेने उसकी मुट्ठी को अपने हाथ से पकड़ रखा था। जैसे जैसे समय बड़ रहा था उसका रोना मुझे बुरी तरह से तोड़ रहा था। शायद वो दर्द मैं बियान ना कर पाऊं लेकिन उस दर्द ने मुझे जिंदगी की अहमियत जता दी। मैं हर एक मिनट में उसे सांत्वना दे रहा था लगभग 3 घंटे उसका रोना बंद नहीं हुआ। और मैं आईसीयू में उसके पास बैठकर उस मार्मिक पलों में घुट रहा था।। मुझे एक जिम्मेदार पिता की तरह संभलना भी था और मां के दिल सा रोना भी था। रोता तो संभलता कैसे इसलिए बस उसका रोना और मेरा ये कहना कोई न बेटा बस ठीक हो जायेगा थोड़ी देर में, ये सिलसिला 3 घंटे चलता रहा। 
फिर रात के 12 बजे से उसका खाना पीना सब बंद था, जब सिसकना बंद हुआ तो उसे पानी की प्यास लगने लगी डॉक्टर का कहना था की 6 घंटे तक पानी नहीं दे सकते। मुझे लग रहा था जैसे आज कुदरत मेरे बेटे की सारी परीक्षा ले रही हो,  उसके सब्र के बांध को देख रही थी या मेरे । 
और आज दोस्त के बेटे की हालत ने वो दिन मेरी नजरों में फिर गुजार दिया। दर्द किसी भी अपने का हो तकलीफ तो देता है, हालांकि समझता वही है जिस पर गुजरती है लेकिन बेबस वो भी कम नहीं होता जो इस बुरे वक्त की घड़ी में अपनों के साथ होने के सिवा कोई मदद नहीं कर पाता। 

शनिवार, 27 मई 2023

वैवाहिक जीवन

एक ऐसा बन्धन जो अगर सामाजिक रूप से जुड़ा हो तो वैचारिक मतभेद होने के कारण जीवन अभिशाप बन जाता है। इसमें किसी एक की गलती नहीं होती बस उनकी समझ विपरीत होती है, आप यूं कह सकते हो कि एक आस्तिक होता है तो दूसरा नास्तिक।  विवाह को लगभग 14 वर्ष बीत चुके है लेकिन आज तक मुझे यह एहसास नहीं हुआ कि वैवाहिक जीवन में यह सुख है जो केवल विवाह करने उपरांत ही संभव है और ऐसा नहीं कि यह घुटन मुझे ही महसूस हो रही है और मेरी पत्नि को नहीं है, कहूं तो मेरी पत्नि को यह घुटन शायद मुझ से भी कहीं गुना ज्यादा है क्योंकि मुझे घर से बाहर जाने के कारण ध्यान थोड़ा निजी समस्याओं से हटकर कार्यालय की समस्याओं में बंट जाता है। मगर मेरी पत्नि को तो 24 घंटे उसी घुटन से गुजरना पड़ता है। और उसका मन इतना नाजुक हो चुका है कि जरा जरा सी बात उसके मन में घर कर जाती है। अब कल की बात ले लीजिए हम नॉर्मल बात कर रहे थे, मेने पूछ लिया कि वैष्णो देवी जा रहे है कोई दोस्त तो हम भी चलें, कहने लगी नहीं मुझे किसी के साथ नहीं जाना दूसरों के साथ भाग भाग रहती है मुझे आराम से अर्धकुंवारी व अन्य जगह आराम से पूजा पाठ करना है। यहां तक सब सही चल रहा था। फिर अचानक से बोल पड़ी मुझे एक और काम करना है कि छोटे बेटे के मूल शांति का पाठ दोबारा करवाना है जो पिछली बार हुआ था वो विघ्न पड़ गया। मेरे मुख से अनायास निकल गया कि इसकी क्या गारंटी है कि अगली बार जो पंडित करेगा वो सफल होगा और जो पहले किया था वो असफल है इसका तो कोई पैमाना नहीं। बस इस बहस में दोनों के मध्य तनाव हो गया। मेरी अच्छाई लगाओ या बुराई लेकिन मैं हमेशा खामोश हो जाता हूं मेरा विजन होता है कि गुस्से में कही बात कभी कभी ऐसी चुभ जाती है कि उम्र भर की रिश्ते में खटास बन जाती है। बस मेरी पत्नि को लगता है कि मैं समस्याओं से दूर भागता हूं। उनका सामना नहीं करता जबकि मुझे लगता है कलह ही वो विषय है जिसमे पीछे हट जाना सभी उपायों से बेहतर है।  
कल की वो लड़ाई उसके मन में ऐसा गुब्बार बनती रही कि उसके डिप्रेशन को दुबारा घुटन ने ट्रिगर कर दिया। मैंने माहौल सुखद बनाने हेतु कोशिश की और कहा की बच्चों का भविष्य उनकी शिक्षा, केयर और सुविधाओं से बनेगा न कि किसी पूजा पाठ से, बस यह बात सुनते ही उसने मुझे पिछले 14 वर्षों के सारे जख्मों को कुरेद कुरेद सुनाया और डिप्रेशन की अधिकता के कारण शाइवरिंग (कंपन) करने लगी। नेट पर उपाय ढूंढने के पश्चात देखा कि गर्माहट अर्थात पैरों के तलवे की मालिश या गर्म पानी पीने से आराम मिल सकता है। अब इतने क्रोध में पानी तो उसने पीना नहीं था। मेने उसके मना व बार बार पैर झटकने के बावजूद मालिश शुरू कर दी। 15 मिनट की मसाज के बाद कंपन में आराम आया। 
अब कोई समझाए इस घटना में दोष कहां था कहां इतना बड़ा मसला था कि अपनी सेहत को ही खराब कर लिया तथा दोनों की मानसिक अवस्था कमजोर हुई वो अलग, भावनाओं के ये दौर इंसान को इतना बेबस कर देते ही कि अगर थोड़ा भी दिमाग ज्यादा उत्तेजित हो जाए तो कोई भी अप्रिय घटना को बढ़ावा मिल जाता है। मेरी पत्नि की मानसिक अवस्था के लगभग पिछले साल से ज्यादा ही खराब होने के कारण मेरा भी जीवन से बिलकुल विश्वास उठ गया है। पूरी निष्ठा व मेहनत से परिवार के लिए दिन रात झूझने के बावजूद भी जब केवल तिरस्कार ही मिले तो मन व्यथित हो जाता है। असली वजह वर्तमान पीढ़ी में सहन शक्ति का कम होना तथा त्याग की भावना का कम हो जाना है। रिश्तों में अगर लम्बा चलना होता है तो समय समय पर किसी न किसी को पिसना ही होता है। कमाल की बात है हम केवल संतान के आगे तो झुक जाते है बाकी सभी रिश्तों में टकराव ले आते है। कहीं न कहीं हम सभी बुरे है क्योंकि हम निज स्वार्थ में इतने अंधे हो जाते है दूसरों के लिए कब तकलीफ बन गए हमे खुद नहीं पता चलता और रिश्तों में गहरी खाई हो जाती है। 

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

पेड़ पौधों से कर प्यार

पेड़ पौधों से कर प्यार
मनु सांसों का कर्ज उतार

जीवन बना है जिस मिट्टी से
आखिर उसमे ही मिल जाना है
जीवन भर तुझे मिट्टी का ही खाना है
सहेज ले धरा कर खुद पर उपकार

पेड़ पौधों से कर प्यार
मनु सांसों का कर्ज उतार

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

प्रेम की कीमत

यूं आसान नहीं प्रेम, प्रेम देखा जाए तो बहुत कुछ छीन लेता है तो बहुत कुछ सीखा जाता है

पहला पड़ाव

किसी बस स्टॉप/कॉलेज/दफ्तर/ट्रेन/पार्क में वो अक्सर आती थी जब पहली बार देखा था तो पहली नजर में ही सीनें में उतर गई, और ऐसी लत बन गई, रोज घंटों तक उसके आने का वक्त पता होते हुए भी पहले से इंतजार करना, जाने के बाद घंटों तक आहें भरना। उसका किसी और बात से हंसना और दिल का गदगद हो जाना। प्यार का वो अफसाना खुद से जुदा हो जाना। गहराई नही नापी जा सकती उन लम्हों की जब किसी से यूं प्यार होता है। सब छोड़ इंसान उसकी चाहत में डूब जाता है।

कुछ मोहब्बत करने वाले इसी पड़ाव तक रह जाते है और उलझी पहेली जैसी यादें लेकर उम्र गुजार देते है।

दूसरा पड़ाव

पहले पड़ाव के बाद शुरू होती है दूसरे पड़ाव की कहानी, अब इंतजार से बात आगे बढ़ने लगती है, कामकाजी वजहों से उनसे बात होने लगती है, कुछ नही कह पाते पर एक दूसरे की हदों से ज्यादा मदद करना और साइड लेने के सिलसिला शुरू हो जाता है। कभी कभी गलती से दो चाय की प्यालियां भी एक साथ हो जाती है। फिर दौर शुरू होते है गलत फहमियों के, किसी और के साथ उनका हंसना दिल को कचोट जाता है, एक दो दिन उनसे बात करने का मन नहीं करता और उनसे नाराजगी दर्शाता है, फिर इश्क का पारा जाने अंजाने जोर करता है तो वही दौर फिर शुरू हो जाता है एक दूसरे की ख्वाहिशों को अपनाने का, उसकी छोटी छोटी बातों को ध्यान रखना, उसकी पसंद नापसंद को अपनी पसंद में ढाल लेने का, और इस पड़ाव का बेहतर पल होता है कि उन दोनों को इतना पता नही होता लेकिन शहर में खबर आग की तरह फेल जाती है उनके इश्क की, क्योंकि उनको तो जाहिर करना होता नहीं, पर दुनियां उनकी नजरों को रोज पढ़ कर, नुक्कड़ वाली ख़बर का अहम हिस्सा बना देती है। 
इस पड़ाव पर अक्सर वो लोग छूट जाते है जिनका या तो शहर बदल जाता है, या उनके काम ।

तीसरा पड़ाव

दूसरे पड़ाव के दौर के बाद अचानक कभी कोई गम ऐसा आता है तो एक दूसरे के सामने वो असहाय से हो जाते है और ऐसे कमजोर वक्त जब वो एक दूसरे का साथ निभाते है तो उस वक्त जो लगाव पैदा होता है उसकी भीनी भीनी खुशबू दो दिलों को एक कर देती है। खुलकर वो दिल एक दूसरे के सामने बेपर्दा कर देते है। ऐसे पल बेहद नाजुक हो जाते है। यहां दोनों में वो डर पैदा हो जाता है कहीं हमसे कोई गलती न हो जाए और हम सामने वाले को खो न दें। प्रेम की चर्म सीमा होती है तीसरा पड़ाव, यहां एक दूसरे की रूह में उतर जाते है प्रेम करने वाले, उन्हें एक दूसरे के सिवा जमाने में कुछ नजर नहीं आता, सिवाए एक दूसरे को प्रेम करने के

इस पड़ाव में अक्सर वो रिश्ते छूट जाते है जिनका सामाजिक भेद के कारण मिलन संभव नहीं हो पाता, और इस मोड़ पर जो रिश्ता छूटता है वो ताउम्र एक खलिश बन यादों में बस जाता है और बार बार ये एहसास करवाता है कि काश ऐसा हो जाता काश हम ये कदम उठा लेते काश....बन रही जाती है भावनाए।

चौथा पड़ाव

इश्क का सबसे बड़ा इम्तिहान वाला पड़ाव है इश्क रूहों में उतर जाने के बाद, जिस्मों की आड़ में लिपटने को आतुर रहता है रोकती है तो बस उन्हें वो तंग निगाहें या सामाजिक शिक्षा जो उन्हें बचपन से बेड़ियों की तरह पहना दी जाती है कि ये किया तो वो गलत हो जायेगा ये गलत हो जायेगा। प्रेम को इज़्जत के भंवर में उलझा दिया जाता है। इस पड़ाव को सिर्फ वही पार कर पाते है जो या तो सामाजिक शिक्षा को कभी गंभीरता से नहीं लेते या जिन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण करके उतना बड़ा ओहदा मिल चुका होता है कि समाज उनके निजी जीवन पर प्रश्न करने की बजाए उनकी कामयाबी को नतमस्तक हो जाता है। पड़ाव पार करने के बाद जब जिस्मों की दीवारें लांघ ली जाती है तो उसके बाद प्रेम का असली चेहरा सामने आता है या कहूं तो सामने आता है कि वो प्रेम था या आकर्षण, यह इस पड़ाव में तय हो पाता है। जो कमजोर होता है प्रेम में वो जिस्मानी जरूरतों के बाद दूसरे को तन्हा छोड़ कर हमेशा के लिए सीने में नासूर जख्म बन कर दूसरे के लिए प्रेम को महज भ्रम की तस्वीर जहन में छोड़ जाते है। और जो साथ रहता है वो जिम्मेदारी से उम्र भर के लिए खूबसूरत रिश्ता बन जाता है। विश्वास की गहरी नींव उनके रिश्ते में मजबूती ले आती है। 

पांचवा पड़ाव
चार पड़ाव से गुजर गया जो पांचवा पड़ाव उसकी जिंदगी में बस शुद्ध प्रेम और समर्पण ही लाता है, उनके जीवन में एक दूसरे की बेहतर समझ और एक दुसरे का अनमोल साथ होता है। वो प्रेम के आदर्श बन जाते है। 

मैं इतना कहना चाहूंगा कि नफरतों को जीवन में जगह मत दीजिए, गलती सब से होती है, भाव से इंसान को पहचानना सीखिए, स्वभाव का पहली नजर में पता चल जाता है, कभी अपने स्वार्थ में किसी को न परखिए, एक सामरिक नजर से इंसान को जानिए और प्रेम से रहे, किसी के लिए द्वेष आपको ही जलाएगा एक बदनीयत इंसान बनाएगा। प्रेम रखोगे दिल में तो आप खूबसूरत व्यक्तित्व के इंसान बनोगे और सदा आंतरिक खुशी के मालिक बन जाओगे। 


सोमवार, 26 सितंबर 2022

रूह से रूबरू

बहुत हो गई दुनियाँ की बातें कभी कुछ खुद से भी पूछ लिया कीजिये, क्या चाहिए था तुम्हे और क्या चाहने लगे हो तुम। एक आसमान के परिंदा थे और पिंजरे की बन कर रह गए। 
मैं नही जानता पर स्कूल से ज्यादा मुझे कहानियों की किताबें पढ़ने का शौक था। और जाने अनजाने दिल की बातें दिल मे रखने की वजह से , बोझ बढ़ने लगा तो दिल की बातों को कागज पर उतारने लगा। और तब से आजतक लिखने के माध्यम तो बदल गए पर लिखता गया। और इसका सबसे बड़ा फायदा हुआ कि खुद को दुनियाँ को समझने का मौका भी मिला। जब आप खुद के लिखे को पढ़ते है तो पता चलता है कि आपके आसपास जो चल रहा होता है वो आपको कितना प्रभावित करता है। 

नफ़रत भी खूब आई इस दिल में और मोहब्बत भी खूब, लोग आते है जिन्दगी में जब उन्हें आपकी जरूरत होती है। और जब उनका वो खालीपन कहीं और पूरा हो जाता है तो वो आपको छोड़ जाते है। पहले बुरा लगता था पर धीरे धीरे समझ आया कि जीवन में निरन्तरता के लिए बदलाव आवश्यक है। इस बुरा लगने की वजह से मैने जीवन मे काफी अवसर गंवाए, बीएससी के लिए शामली जाना था प्लस टू के बाद मगर जा नही पाया पारिवारिक माहौल को  छोड़कर। फिर गुरुग्राम में अच्छी नौकरी माँ के बीमार होने की दुहाई पर। और ऐसा बहुत बार किया मैने जीवन मे लगाव की वजह से बहुत कुछ खो दिया। और मैं समझता था सब ऐसे है पर धीरे धीरे समझ मे आया कि हम सब मुसाफ़िर है कोई आ रहा है कोई जा रहा है। बस ये बात समझने में मेरी जिन्दगी बीत गई। 
ख़ैर मैं तो यही कहना चाहूंगा कि अपनी रूह को कैद मत कीजिए वही काम कीजिये जिसमें आपको सकूँ मिलता हो। लोग आपको प्रभावित करने की कोशिश करते है उनकी इच्छाओं के अनुरूप, मगर आपने खुद की सुननी है और जो आपको सही लगता है वही करना है। बस हर फैसले में इतना ध्यान रखना चाहिए कि किसी के हितों का नुकसान नहीं होना चाहिए। अपने सभी रिश्तों को इतना स्पेस देना चाहिए कि आप किसी पर बोझ न बनो। हालांकि इसका थोड़ा नुकसान ये है कि कुछ रिशतें बोझ में लगाव महसूस करते है पर फिर भी उन्हें आजाद रखने की जिम्मेदारी आपकी होनी चाहिए। रूहें जिस्म में एक उम्र तक ही कैद अच्छी लगती है हमेशा के लिए नहीं। 

चुपके से रोया वो

चुपके से रोया वो
आँसू नही थे आँख में
पर नमी बहुत थी

कहने को तो सब थे
दिल की समझे कोई
वो कमी बहुत थी

चुपके से रोया वो
मजबूत थी शख्सियत तो
पर दिल में नरमी बहुत थी

किसे कहता चोट कहाँ थी
जब मरहम वाले कातिल हो
फिर भी चुपके से रोया वो
अपनों में गैरों से निशानी जो थी

हर दूसरी रात भीग जाती है पलकें
किस से दोष दें किसे अपना कहें
जब साँस ही न जिस्म में रहें

चुपके से रोया वो
बन्द दीवारों में
रात के अँधियारों में
उदास गलियारों में
चुपके से रोया वो...



रविवार, 22 मई 2022

खुश और अन्य विचारधारा

जिन्दगी में काले बादलों का असली कारण आसपास के व्यक्तियों से उम्मीदें लगाना होता है जिसकी वजह से आमतौर पर दुख ही मिलता है। अगर आप खुश लोगो पर नजर डालोगे तो उनका व्यवहार किसी से अपेक्षा की बजाए जहां जो मिला उसी से काम चला लिया अथार्त वो किसी पर निर्भर नही होते न ही उन लोगो का किसी से समर्पण होता है। जीवन जीने के लिए उन्हें जो संसाधन जहां से मिल जाये वो उनका स्वागत करते है। अच्छाई व बुराई दोनों ही जीवन का हिस्सा है तो कुछ बुराई भी है ऐसे जीवन में, सबसे बड़ी बुराई ये लोग किसी के नही होते तथा इनके लिए रिश्तों से ज्यादा स्वयं मायने रखता है। अक्सर देखते है दोस्तों की टोली में ऐसे अलग अलग विचारों के लोग मिलते है। जब खुश रहने वाले दोस्त आगे बढ़ जाते है यो अन्य विचारधारा वाले मित्रों को ठगा सा महसूस होता है। लेकिन खुश रहने वाले कि इसमें कोई गलती नही होती क्योंकि उसने जीवन मे बहती हवा सा जीना सीख लिया है। उसे मालूम है खुश रहने का तरीका मौकों का उपभोग करना होता है चाहे वो मौका किस व्यक्ति या किसी अनैतिक तरीके से ही क्यों न मिल रहा हो। अब कुछ लोग इस उधेड़ बुन में रहते है कोई बुरा करेगा यो भगवान देखेगा। उनको बताना चाहूंगा ये शब्द केवल अच्छे लोगो की पैरों में बेड़िया डालने के लिए ही बनाये गए है। जीवन का मूल मंत्र है कर्म, अगर आपके कर्म उचित दिशा से किया है तो सफलता आपकी है। किसी का बुरा न करना निज विचार है लेकिन उसके लिए कोई कुदरत सजा देने नहीं आती।  आज के लिए इतना ही फिर बात करेंगे

सोमवार, 1 नवंबर 2021

पानी का महल

तुम आये थे
बंजर जमीन पर
पानी का महल लेकर

तुम चले गए
बंजर जमीन से
पानी का महल लेकर

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

बिखरी जिन्दगी के निखरे रंग

अपने कार्य के प्रति अंध प्रेम ने सामाजिक दुनिया से दूर कर दिया। पिछले महीने अपनों द्वारा चोट के उपरांत दफ्तर में अकेला रह गया था। सभी कार्यों से मुझे दूर कर दिया गया। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए बिल्कुल खाली बैठे रहना सजा से कम नहीं था। धीरे धीरे खाली रहने की आदत तो हो गई साथ ही कुछ रोचक बदलाव भी आ गए। समय से घर जाने लगा जिस कारण से शाम को सैर का समय मिलने लग गया। गाँव के बचपन के रिशतें फिर से हरे हो गए , बन्जर से रिश्तों में जैसे जान आ गई। अब वो सभी पुराने दोस्त खेतो की मेढ़ पर हर सप्ताह मिलने लगे है। शहर की अंधी चकाचौंध दुनियाँ से गाँव की अनपढ़ मिट्टी में खुशियाँ मिलने लग गई। जैसे कॉटन बोझ था मेरे दिल पर सारा उतर गया है। और अब दूर से शहर के उन लोगो को देखता हूँ तो उनका जीवन आजभी उन उलझनों से उलझा है वही सियासती चाल कभी वो चलते कभी उनके विरोधी। दुर्भावना वाले मन से कभी किसी पर दोषारोपण तो कभी किसी पर। खैर अभी जीवन सुखद व भरपूर है। देखते है आगे क्या रंग दिखलाता है जीवन फिर उसे शेयर करूँगा। अलविदा।। 

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

एक मौसम आता है

एक मौसम आता है
हर कोई दीवाना हो जाता है
उम्र का वो लम्हा ही तड़पता है
इंसान पागल सा हो जाता है

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

अधूरा

पत्थरो से लिखा किरदार मेरा,
सख़्त बड़ा है फिर भी रिसता है
अकड़ से खड़ा है अभिमान मेरा
रिश्तों की ख़ातिर अक्सर पिसता है

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

खुशियाँ

बिखर गया था मैं, रिश्तों की धार से
सिमट गया हूँ मैं बन्ध के एक तार से

तुम से ही निकलेगी अब हर राह मेरी
खुशियाँ तुझ से, तकदीर बंधी जो मेरी

सोमवार, 11 नवंबर 2019

पीड़ा

जिस्म नोच लिया है तुमनें, यक़ीन नहीं होता होगा तुम्हे तो क्योंकि अन्धे हो चुके हो ख़्वाहिशों के स्वार्थ में और झूठी शोहरत की आस में, मग़र मेरा जिस्म का कतरा कतरा रोज तुम्हारी बर्बरता की भेंट चढ़ रहा है। मेरा दिल समझ नही पा रहा कि उसे सजा ख़्वाहिशों की मिली है या उसकी नेकदिली की जो एक रंग बदलते व्यक्तित्व पर उसने आँख बंद कर भरोसा कर लिया और फिर एहसास ऐसा दिलाया कि ग्लानि से मेरा मन भर दिया जैसे मुझ से बुरा व्यक्ति इस धरती पर न कोई हुआ है न कोई होगा। कमाल का व्यक्तित्व है उनका कि सभी कर्तव्य मेरे लिए छोड़ दिए और अधिकारों का हक स्वयं के लिए सुरक्षित रख लिया।
वास्तव में समय हाँ जी की हामी का है, काश मुझे भी ये गुण मिल गया होता तो मैं भी रिश्तों में सफल हो पाता मग़र मुझे उसूलों और अपनों को सही रास्ते पर चलाने की पुरातन विचारधारा सबसे अलग कर देती है। आज कोई भी अपनी बुराइयों को नही सुन सकता, और मुझे बुरी आदत है सब साफ साफ कह देने की, भला फिर कौन मुझे पसंद करता। ख़ैर छोड़िए समस्या यह नहीं है समस्या है जो कल मेरे साथ थे उनमें हजार बुराइया थी आज जब उन्होंने ने हाथ थाम लिया तो सब पवित्र हो गए। अजीब दास्तान है वर्तमान के छलावे की। आज की तिथि में मेरा न कोई उद्देश्य, न कोई मित्र, न कोई ध्येय है। जीवन उसके दुष्चक्र में इतना प्रभावित हुआ रोज मानसिक रूप से क्षीण होता जा रहा हूँ। कोशिश रोज करता हूँ इस प्रताड़ना से बाहर आने के लिए अच्छे बुरे सभी विकल्प तलाश रहा हूँ। मग़र अंधकार की इस दुनियाँ में कोई आशा की किरण नजर नहीं आती। शायद मैं आवश्यकता से अधिक सोच रहा हूँ क्योंकि जिनके लिए सोच रहा हूँ उन्हें तनिक भी प्रभाव नही पड़ता। वैसे पड़ना भी नही चाहिए उनका मकसद और उद्देश्य तो सार्थक हुआ है वो अपनी जगह शत प्रतिशत सही है। जीवन में वो सब व्यवहारिक रहे मुझे ही मित्रता व अपनेपन का शौक चढ़ा था अब ठगा हुआ सा दोष उनमे ढूंढ था हूँ जबकि ख़ुद कुल्हाड़ी पर पैर मार दिया मेने, और अब इन जख्मों का कोई इलाज नहीं क्योंकि घाव इतने गहरे जो हो गए अब तो मृत्यु शैय्या ही इन सब व्यर्थ के विचारों से मुक्ति दिला सकती है। वो हालांकि हमारे हाथ नहीं मगर तब तक ये जिस्म सिवाए लाश और कुछ नहीं। गुनाहगार हूँ किस किस दिल का, जो वक़्त नहीं कट रहा मुश्किल का ,
न कोई मित्र
न कोई शत्रु
जरूरत से बंधे है रिश्ते आजकल

शनिवार, 17 अगस्त 2019

अन्तःकरण

पिछले कुछ दिनों से दफ्तर में काफी उठा पटक के बाद जिसको जो चाहिए था वो मिल गया, सता के चाहने वालों को कुर्सी, दौलत के पसंद करने वालों को अधिकार और तन्हा रहने वालों को तन्हाई, कुल मिलाकर सब खुश है अपनी जगह। ईश्वर करें यह स्थिति बनी रहे ताकि सब खुशी खुशी अपनी नौकरी कर ले क्योंकि नौकरी की आवश्यकता सबको है। बस कुछ लोगो को नौकरी से भी ज्यादा बहुत कुछ चाहिए, और ईश्वर उनको वो सब दे भी दे, मगर किसी का अहित न हो। और मेरी भी प्रार्थना है कि मुखोटों से भरे सँसार से दूर रखना मुझे ईश्वर अगर वास्तविकता में आपका वजूद है तो जो कि मुझे लगता नहीं। क्योंकि सामाजिक परिवेश में सफल वही है जिसका निशाना सही है।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

जल सरंक्षण नीति (पीढ़ी बचाओ समृद्धि लाओ)

हरियाणा प्रदेश में जिला करनाल एक खास ही पहचान रखता है, देश व प्रदेश की राजधानी से समान दूरी पर स्थित इस शहर का नाम महाभारत के अहम पात्र कुन्ती पुत्र कर्ण के नाम पर पड़ा था। जिला करनाल को ऐतिहासिक पहचान के अतिरिक्त भी धान की अधिक पैदावार के कारण से जाना जाता है धान के कटोरे के रूप में पहचान वाला अभिमान ही अभिशाप बन गया है। धान की अधिक बुआई के कारण घटता जलस्तर जिला करनाल के स्वर्णिम इतिहास पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है कि आने वाली पीढ़ी को हम समृद्धि की और ले जा रहे है कि विनाश की और। गहराया जल संकट गाँव शहर प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर गहन चिन्ता का विषय बन चुका है। केंद्र सरकार द्वारा जल शक्ति अभियान की शुरुआत हुई तो जिला प्रशासन द्वारा भी इस कड़ी में ठोस कदम उठाए जाने के लिए सयुंक्त सचिव व उपायुक्त महोदय की अध्यक्षता में अहम बैठकों का आयोजन किया गया। प्रारंभिक बैठकों में जल संकट के निम्न कारण निकल कर सामने आए।
1. भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन
2. प्राकृतिक जल संचय स्त्रोतों पर अतिक्रमण
3. जनमानस में जल संकट के प्रति जागरूकता की कमी
4.
5.

उक्त कारणों के  चिन्हित करने के उपरांत अब बैठकों में चर्चा का विषय था कि समस्यायों का निदान कैसे हो। तो जिला प्रशासन ने जन जागृति प्राथमिक तौर पर मुख्यतः निम्न समाधानों पर बल दिया

I. वर्षा जल संग्रहण
II. जन जन जागृति अभियान
III. जल संचय संसाधनों का निर्माण व जीर्णोद्धार
IV. अनाधिकृत बोरवेल पर प्रतिबंध
V. पौधरोपण

उक्त सभी समाधान के लिए आगामी 2 माह में निम्न कार्य करवाये जाने के लिए रूपरेखा तैयार की।

1 प्राकृतिक संसाधनों की पुनःस्थापना:- जिला करनाल में कुल 382 ग्राम पंचायतों के 435 गांवों में कुल 987 तालाब है जिनका प्रयोग पशुओं के पानी व कृषि कार्यों के लिए किया जाता था। आधुनिकता वाद के दौर में बोरवेल के अत्याधिक इस्तेमाल से यह तालाब जल प्लावन व पशुओं के मल व अन्य गीले कचरे के कारण गांवों की भयंकर समस्या बन गए है। जिला करनाल ही था जिसने देश प्रथम स्तर पर तीन तालाब की संकल्पना की शुरुआत की जिसको पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा काफी सराहना की गई व पूरे देश में इसे लागू करने के निर्देश भी जारी किए गए। जिसके तहत जिला करनाल में जुलाई 2019 तक कुल ........ तीन/पंच ताल का निर्माण हो चुका है तथा .......तक कुल .........पंच ताल का लक्ष्य रखा गया है। जिसकी अनुमानित लागत रुपये.....है। उक्त पंच ताल की वजह से जलप्लावन की समस्या का पूर्ण रूप से निदान हो गया है।

2. वर्षा/छत जल का संचयन करना:- अक्सर बरसात के दिनों में पानी का सड़कों पर भराव देखा गया है। जिसके लिए वाटर रिचार्ज पिट का निर्माण करके निदान किया  जा सकता है। जिला करनाल में जुलाई 2019 माह तक कुल .... रिचार्ज पिट का निर्माण सार्वजनिक भवन पर तथा कुल .... का निर्माण निजी भवनों में किया जा चुका है जिससे ..... क्यूबिक मीटर पानी का संचय किया जा चुका है। जिसका कुल खर्च रुपये ....था व अगले दो माह के लिए कुल .....रिचार्ज पिट के नवीकरण का लक्ष्य रखा गया है जिसकी अनुमानित लगता .....रुपये है तथा .....क्यूबिक मीटर पानी का संचय किया जा सकता है।

3. छोटी नदी व नालों की पुनः स्थापना:- अतिक्रमण के चलते काफी नदी व नालों पर कब्जा कर लिया गया अथवा देखरेख के अभाव में उनका मूलभूत ढांचा धूमिल होने के कगार पर है। इसलिए प्रशासन ने आगामी दिनों में कुल ....नदियों के पुनः स्थापना का लक्ष्य रखा गया है जिसके लिए अनुमानित लागत रुपये...का पूर्वानुमान है।
4. सोक पिट का निर्माण:- जिला करनाल में अधिकांश क्षेत्र रेतीली भूमि है जिसपर सोक पिट का निर्माण के द्वारा दूषित जल का निपटान किया जा सकता है तथा भूमिगत जल के स्तर में सुधार किया जा सकता है। जिला करनाल में अब तक कुल ....सामुदायिक सोक पिट व कुल ...निजी सोक पिट का निर्माण किया जा चुका है जिस पर कुल ....रुपये की राशि खर्च की गई है। .....माह तक जिला करनाल में कुल .....सोक पिट के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है जिसकी अनुमानित लागत ....रुपये है।

गुरुवार, 27 जून 2019

तमाशबीन ज़िन्दगी

एक हफ्ता हो गया घुटते घुटते पर किस से कहें ये समझ नही आ रहा, ऐसा लग रहा है कि जैसे सारी दुनियाँ ही मेरे खिलाफ हो गई है, शायद इसलिए लग रहा है जिस दफ्तर में 6 साल से बिना उफ्फ तक किए जिन लोगों के लिए काम किया वो आज विरोध में आ खड़े हुए है उन्हें निज स्वार्थ में अच्छे बुरे का फर्क नजर नही आ रहा, मेने जब जॉइन किया था तब से लेकर आजतक अपने इंचार्ज की कभी किसी बात से मना नही किया, यहाँ तक वो सारा काम मुझ पर छोड़ अपनी पार्टियों में मशरूफ़ रहते और आज उन्हें मुझ में खामियाँ नजर आ रही वो भी सिर्फ उनकी किसी खास कर्मचारी की परेशानियों की वजह से, अब अधिकारी कोई फैसला लें, ये उनका अधिकार है मगर स्थायी कर्मचारियों को वक़्त के साथ इतना घमंड हो जाता है कि वो स्कीम और उनमें लगे अनुबंध कर्मचारियों को अपनी जायदाद समझने लगते है, मेरी खामी यह कि मैने किसी को पलट कर जवाब देना नही सीखा, अकेले घुटता रहता हूँ।
बात नई नही है पिछले अधिकारियों के समय भी दो बार ऐसा हो चुका है कोई भी जिम्मेदारी भरे कार्य आते है तो काम के लिए सबसे आगे कर देते है जब अपनी सूझबूझ से उस कार्य में सफलता मिलने पर अधिकारी का प्रोत्साहन मिलता है तो सबके सीने पर साँप लौटने लगे जाते है, चुनाव  के दौरान ऐसा कोई कार्य नही जो न किया हो एक ऑपरेटर, ड्राइवर, स्टेनों व अन्य कई कार्य जो शायद मेरी क्षमताओं से परे थे पर मैने माथे पर शिकन आए बिना सब बखूबी निभाने की कोशिश की, लेकिन उस दौरान भी बरसो से काम कर रहे मेरे सहकर्मियों ने भी एक प्रतिशत सहयोग नही दिया, उनसे अधिकारी के कहने पर कोई रिपोर्ट मांगने चला जाता तो उनके क्रोधाग्नि से अपमान के घूंट पीते हुए भी चुनाव का कार्य पूर्ण करवाया। हालांकि मैं ऐसी कड़ी नही था कि मेरे बिना चुनाव में कोई  फर्क पड़ता क्योंकि अधिकारी द्वारा होमवर्क इतना बेहतर था कि वो सब सामंजस्य बिठा लेते,  चलो किसी तरीके से चुनाव तो निबट गया लेकिन उसके बाद एक मीटिंग के दौरान अधिकारी द्वारा तारीफ किये जाने से सभी के मुँह और मुझ से चिढ़ गए, इस दौरान तो वो भी लोग चिढ़ गए जो सहकर्मी के साथ दोस्त होने का भी दावे कर रहे थे, सब भुला दिया यह सोचकर कि चलो इंचार्ज और अधिकारी के मापदंडों/आशाओं पर तो खरा उतरा हूँ मुझे कार्य करने में खुशी मिलती है और उसकी पहचान हो जाए तो खुशी दुगनी हो जाती है। लेकिन पिछले सप्ताह कमर में अचानक दर्द हो गया तो इंचार्ज के पास छुट्टी भिजवाई तो उसने साफ मना कर दिया यह कहकर कि इसका तो रोज का काम है मैं नही मंजूर करता सीधे अधिकारी से करवा लें, अब ये बात कमर दर्द से भी ज्यादा दर्द दे रही थी, यार जिस व्यक्ति के एक इशारे पर दिन रात काम किया, कभी यह नही सोचा कि काम मेरा है या नहीं, आज उसने यह बात कह दी। किसी भी तरह एक दिन की छुट्टी काटने के बाद, दफ्तर आ गया, अभी भी कमर से सीधा खड़े होकर चला नही जा रहा था तो एक और नया खंजर सीने में चला दिया, अधिकारी द्वारा छुट्टी वाले दिन इंचार्ज के खास कर्मचारी को एक अन्य कार्य की जिम्मेदारी दी दी गई और शायद इंचार्ज की अधिकारी से इस बारे बहस भी हो गई हो लेकिन वो सारा गुस्सा कमरे में आकर मुझ पर और एक सहायक अकाउंटेंट पर उतार दिया। और रोज छोटी छोटी बातों पर तानों जैसा व्यवहार करने लगे। जैसे कि मैं कोई बड़ा ही गुनाह कर आया हूँ, जब इतनी परेशानी होती है इनको फिर अधिकारी के सामने मत भेजे, इनको आराम भी चाहिए और फिर सम्मान भी और शायद और कुछ भी जो उन्हें अधिकारी विश्वास में न होने के कारण मिल नही पाता। मन यो करता है छोड़ दूँ नौकरी पर सामाजिक ढांचा ऐसा है कि परिवार की सुख सुविधाओं के लिए काम तो करना पड़ता है, और समस्याएं तो सब जगह है पर मेरा शायद रिएक्ट करना कुछ ज्यादा हो, पर घुटन को दूर करने के लिए लिखना भी जरूरी था।
बल्कि दफ्तर में चल रही समस्याओं के कुछ समाधान भी थे मेरे मन में, मेने तो इस डर से अधिकारी से एक भी सुझाव शेयर नही किया कि कल को मेरे पीछे और पड़ जाएंगे कि जो हो रहा है सब मेरी मर्जी से हो रहा है। कभी कभी इनकी विकृत मानसिकता पर हंसी भी आती है।
बस ईश्वर से यह ही प्रार्थना करता हूँ मेरी सहनशक्ति को बरकरार रखें ताकि कभी किसी से मैं दुर्व्यवहार न करूं क्योंकि जब क्रोध के पल चले जाते है तब इंसान को ज्यादा पछतावा होता है। कोशिश करूँगा कि लिखने के पश्चात कल स्वच्छ मन से अच्छा कार्य कर सकूँ क्योंकि अशांत मन से सब गलत ही होता है।

शुक्रवार, 21 जून 2019

उम्मीद का टुकड़ा

NDTV पर अभी एक रिपोर्ट आ रही थी कि 45 दिन पहले उड़ीसा में फोनी तूफान आया जिसमें ज्यादा दर्शाया गया कि ज्यादा जीवन को हानि न होने के कारण राष्ट्रीय स्तर से यह मुद्दा गायब हो गया कि जान कि हानि न हो पर मॉल की जो हानि हुई उसकी आपूर्ति नही आज तक हुई। लोग अब भी जद्दोजहद कर रहे है दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए, रिपोर्ट में कुछ दृश्य थे कि घर की लकड़ी की छत थी जिस से कुछ लकड़ी की बल्लियों का हिस्सा नीचे गिर गया, कोई दीवार का हिस्सा कच्चा था तो वो गिर गया। ऐसे छोटे छोटे विषय थे जिस से रिपोर्टर ने दर्शाया कि उनका जीवन कितना कष्टदायी है स्वभाविक है वो उनके जीवन की तुलना अपने वातानुकलित कमरे के जीवन से कर रहा था।
सरकार से मदद नही मिली, इनको राशन नही आया, पैसे नही मील इत्यादि।
मेरा वर्शन सुनने से पहले इतना समझ लीजिए कि मेरी नकारात्मक बातों में दूरगामी सकारात्मकता है जो व्यक्ति को तब समझ आती है जब वह अपनी महत्वकांक्षी सोच की वजह से सब खो चुका होता है।
अब वो पत्रकार दिखा रहा था कि उन लोगों के पास झोपड़ी या कच्चे मकान थे तो जायज है तूफान से पहले भी वैसे ही मकान थे बस उनकी छत और दीवार सलामत थी। जाहिर है कि ऐसे गरीब परिवार के लोग काफी मेहनतकश होंगे, उनका जीवन कड़े परिश्रम से जुड़ा होगा। तो क्या वो मेहनतकश आदमी 45 दिन में अपने झोपड़े की 4 बल्लियों को ऊपर रख दोबारा उनपर घास फूस नही रख सकता, बिल्कुल रख सकता है मगर कुछ महत्वकांक्षी लोग उन्हें सिखाते है कि मत बनाओ नही तो कोई सरकारी मदद नही आएगी इत्यादि प्रोलोभनो से उसकव भ्रमित कर देते है। ये तो थी गरीव परिवारों की बात जिन्हें न शिक्षा मिली न दीक्षा।
उस से थोड़ा ऊपर जाते है निम्न मध्यम वर्गीय परिवार जिनका गुजारा दो कमरों के मकान में बेहतर हो रहा होता है कि अचानक उनका कोई समृद्ध रिश्तेदार आता है जो उन्हें महसूस करवाता है कि इतने गर्मी के मौसम में तुम कैसे रह लेते हो हम तो अपने घर कूलर और ac चलाकर रखते है, ऐसे नुकीले व्यंग्य चलाकर उन्हें हीनता का बोध कराएगा कि उनको लगेगा वास्तविकता में उनके पास तो भौतिक सुख ही नही है। ऐसी भ्रांतियां समाज में असंतोष व दिशाहीनता पैदा करती है। 
अच्छा कभी आप ध्यान देना कुछ क्षेत्रों में लोगों के मकानों से बेहतर वहाँ का मंदिर/मस्जिद/चर्च मिलते है, जबकि वह भी उन लोगो द्वारा बनाया गया है जो कि बेहतर घरों में नही रहते है । जानते हो कैसे?
क्योंकि बचपन से उन्हें शिक्षा मिली कि भगवान का स्थान सबसे ऊंचा है और उसका घर भी तुमसें बेहतर ही होगा जिसके लिए वो सब मिलकर दान व श्रम से भव्य निर्माण करते है।
70 वर्ष पूर्व इस देश में कोई सरकार नहीं थी जो मदद करती थी लेकिन तब भी लोग भव्य मकान बनाकर व बेहतर जीवन जीते थे। मदद के लिए वो एक दूसरे का हाथ बनते थे। क्योंकि जब व्यक्ति समाजिक प्राणी था। उसे भरोसा उस सामुदायिक ढाँचे पर था जहाँ वो सब मिलकर सभी समस्याओं का स्थानीय हल निकालते थे किसी करिश्में का इंतजार नही करते थे।
खैर छोड़िए बात हो रही थी फैनी तूफान की और उसकी तबाही की, रिपोर्टर आगे दिखाता है कि एक संस्था कब्बडी टीम लोगों को रोज 2 समय का खाना वितरित कर रही है और लोग सभी एक स्थान पर खाना खा रहे है। सभी कहेंगे कि बड़ा पुण्य का काम कर रहे है इसके लिए उनकी सराहना होनी चाहिए। जैसे वो रिपोर्टर कर भी रहा था।
लेकिन यहाँ तस्वीर कुछ अलग भी हो सकती थी, शहर से एक व्यक्ति आया गाँव में उसने लोगो को इकठ्ठा किया कि गाँव में सरकार की मदद आएगी , जो करना है हम सब लोगो को मिलकर करना है, उसने सभी संसाधनों पर गौर किया और पाया कि गाँव में  आजीविका के लिए पर्याप्त संसाधन थे लेकिन मनोबल, ज्ञान और दिशा के अभाव में सभी किस्मत को कोस रहे है। घर तैयार करने को सभी जरूरी सामान था लेकिन बनाने की कोई शुरुआत नही कर रहा था वजह थी किसी घर में कुछ युवा नही थे तो किसी घर में पर्याप्त समान नही था। हर घर में मवेशी व अन्य जरूरतों के समान थे जो कि शहर में उचित दामों पर मिलते है। तूफान ने तो तबाही शहर में भी मचाई थी लेकिन वहाँ के लोग कैसे जल्दी संभल गए सरकार तो वहाँ भी कोई सहायता लेकर नहीं पहुँची थी। लेकिन उनके पास एक ही लक्ष्य था कि खुद मेहनत से ही बेहतर जीवन बन सकता है।
शहर के उस व्यक्ति ने गाँव के लोगो को संगठित किया, और आकलन किया कि क्या संसाधन उपलब्ध है और कितनों की आवश्यकता है। कहाँ से धन एकत्रित हो सकता है और कहां से श्रम। गाँव में पशुओं की कमी नहीं थी और न पशुओं के लिए घास की, तो एक सीमा तक दूध जरूरतों से ज्यादा था जिसको शहर में बिक्री कर धन कमाया जा सकता था जिसके लिए उसने चयनित युवाओं की टीम बनाई। फिर कुछ युवाओं की टीम घरों के ढांचे परिवर्तन के लिए बनाई। इस तरह से सभी कार्यों को दिशा प्रदान करते हुए वहाँ के लोगों को स्वालम्बी बना दिया। और सीमित समय की भीख से छुटकारा दिला दिया।

बुधवार, 15 मई 2019

माथे की लकीरें

विकास एवं पंचायत विभाग में कार्य करने के कारण अक्सर ग्रामीण क्षेत्र में दौरा करने का अवसर मिलता रहता है, कल इंद्री के गाँव गढ़ी जाटान का दौरा किया वहां पर पंचायत भूमि की पट्टे पर देने के लिए नीलामी थी। गाँव के काफी इच्छुक लोग बोली देने हेतू पंचायत भवन के प्रांगण में मौजूद थे, बोली का कार्य सुचारू रूप से चल रहा था लोग मखौल करते हुए बोली लगा रहे थे, तब मेरी नजर एक अधेड़ उम्र के धूप में झुलसे हुए, माथे पर शिकन की लकीरें लिए व्यक्ति पर पड़ती है, वह कुछ बोल नही रह था मगर 2 से 3 कश में लगातार बीड़ी फूंक रहा था। प्लाट दर प्लाट बोली लग रही थी और उसकी काया बीड़ी से सुलग रही थी , कुछ समय पश्चात एक 20 बीघे प्लॉट की बोली आई तो उसकी भौहें तन गई, पिछले वर्ष की अपेक्षा में 1000 अधिक राशि से बोली शुरू की गई तो सबसे पहले बोली लगाने वाला व्यक्ति वही था, प्रतीत होता था कि जैसे उसे कोई चाभी मिलने वाली है जिस से उसकी जीवन की सभी परेशानियां खत्म होने वाली हो, खैर जैसे जैसे मेरे जहन में द्वंद्व चल रहा था वैसे बोली कि प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी अब 20 प्रतिशत बढ़ोतरी के उपरान्त बोली मात्र 100-100 रुपये कि सुस्त चाल से चलने लगी थी, उधर मेरा मन सवाल कर रहा था कि उसकी कौन सी ऐसी समस्या है जिसका अंत ये 20 बीघा जमीन करने वाली थी, गाँव में मुख्य समस्या बच्चों के विवाह की होती है। सामाजिक परिवेश को ध्यान रखते हुए सबके खानपान व दहेज के लिए अच्छी रकम जुटाने की जुगत लगानी पड़ती है। ज़िन्दगी के कुछ बरसो की कमाई विवाह में तो कुछ बरस की मकान बनाने में ही लग जाती है। समय के साथ शिक्षा बढ़ने के कारण, ग्रामीण पैसा शिक्षा पर भी खर्च करने लगे है मगर इसकी वजह से मकान और शादी में पैसा पहले की अपेक्षा में और ज्यादा लगने लगे गया है। बच्चें जितने शिक्षित चकाचौंध के दौर में उतना ही खर्च करना पड़ता है। खैर बोली का दौर चल रहा था कि वह जेब टटोलने लगा कि देखा बीड़ी का मंडल खत्म हो गया, बेचैनी भरे चहेरे से उसने साथ वाले ग्रामीण से गुहार लगाई तो उसने उसे एक सिगरेट थमा दी, सिगरेट की अग्नि थी कि उसकी जरूरतों की बोली कि दरों में 100 रुपये से 1000 रुपये का उछाल आया गया, अब उसने आवेश में आकर, पिछले वर्ष से 40 प्रतिशत अधिक राशि पर जमीन पट्टे पर ले ली। अब उसके चेहरे के भाव खुशी के नहीं  बल्कि भय व आशंकाओं के थे, उसने एक समस्या को दूर करने के लिए जीवन में दूसरी समस्या को पाल लिया था। अब नीलामी की राशि का भी इंतजाम बैंक अथवा किसी आढ़ती की चौखट पर अंगूठा लगाकर करना था। खुद के पास इतनी राशि होती तो एक समस्या तो खत्म हो ही जाती।
मेरे जीवन में तो उसका किरदार कल तक ही था लेकिन मेरे जहन में उसकी चिन्ता हमेशा के लिए घर कर गई, कि जाने वो कौन सी समस्या होगी जिसके लिए उसने अपने जीवन को तपते तेल की कड़ाही जैसे गर्म खोलते तेल में छोड़ दिया, अब मौसम की मार, औने पौने दाम का डर, कुदरत का कहर, ब्याज का पहर इत्यादि विषैले फनों से बचकर, उसकी परेशानियों का हल सुगम हो पाएगा या एक और किसान अगले बरस पेड़ पर लटक जाएगा। ✍️👁️👁️

कड़वे शब्द बोलता हूँ