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सोमवार, 26 सितंबर 2022

रूह से रूबरू

बहुत हो गई दुनियाँ की बातें कभी कुछ खुद से भी पूछ लिया कीजिये, क्या चाहिए था तुम्हे और क्या चाहने लगे हो तुम। एक आसमान के परिंदा थे और पिंजरे की बन कर रह गए। 
मैं नही जानता पर स्कूल से ज्यादा मुझे कहानियों की किताबें पढ़ने का शौक था। और जाने अनजाने दिल की बातें दिल मे रखने की वजह से , बोझ बढ़ने लगा तो दिल की बातों को कागज पर उतारने लगा। और तब से आजतक लिखने के माध्यम तो बदल गए पर लिखता गया। और इसका सबसे बड़ा फायदा हुआ कि खुद को दुनियाँ को समझने का मौका भी मिला। जब आप खुद के लिखे को पढ़ते है तो पता चलता है कि आपके आसपास जो चल रहा होता है वो आपको कितना प्रभावित करता है। 

नफ़रत भी खूब आई इस दिल में और मोहब्बत भी खूब, लोग आते है जिन्दगी में जब उन्हें आपकी जरूरत होती है। और जब उनका वो खालीपन कहीं और पूरा हो जाता है तो वो आपको छोड़ जाते है। पहले बुरा लगता था पर धीरे धीरे समझ आया कि जीवन में निरन्तरता के लिए बदलाव आवश्यक है। इस बुरा लगने की वजह से मैने जीवन मे काफी अवसर गंवाए, बीएससी के लिए शामली जाना था प्लस टू के बाद मगर जा नही पाया पारिवारिक माहौल को  छोड़कर। फिर गुरुग्राम में अच्छी नौकरी माँ के बीमार होने की दुहाई पर। और ऐसा बहुत बार किया मैने जीवन मे लगाव की वजह से बहुत कुछ खो दिया। और मैं समझता था सब ऐसे है पर धीरे धीरे समझ मे आया कि हम सब मुसाफ़िर है कोई आ रहा है कोई जा रहा है। बस ये बात समझने में मेरी जिन्दगी बीत गई। 
ख़ैर मैं तो यही कहना चाहूंगा कि अपनी रूह को कैद मत कीजिए वही काम कीजिये जिसमें आपको सकूँ मिलता हो। लोग आपको प्रभावित करने की कोशिश करते है उनकी इच्छाओं के अनुरूप, मगर आपने खुद की सुननी है और जो आपको सही लगता है वही करना है। बस हर फैसले में इतना ध्यान रखना चाहिए कि किसी के हितों का नुकसान नहीं होना चाहिए। अपने सभी रिश्तों को इतना स्पेस देना चाहिए कि आप किसी पर बोझ न बनो। हालांकि इसका थोड़ा नुकसान ये है कि कुछ रिशतें बोझ में लगाव महसूस करते है पर फिर भी उन्हें आजाद रखने की जिम्मेदारी आपकी होनी चाहिए। रूहें जिस्म में एक उम्र तक ही कैद अच्छी लगती है हमेशा के लिए नहीं। 

चुपके से रोया वो

चुपके से रोया वो
आँसू नही थे आँख में
पर नमी बहुत थी

कहने को तो सब थे
दिल की समझे कोई
वो कमी बहुत थी

चुपके से रोया वो
मजबूत थी शख्सियत तो
पर दिल में नरमी बहुत थी

किसे कहता चोट कहाँ थी
जब मरहम वाले कातिल हो
फिर भी चुपके से रोया वो
अपनों में गैरों से निशानी जो थी

हर दूसरी रात भीग जाती है पलकें
किस से दोष दें किसे अपना कहें
जब साँस ही न जिस्म में रहें

चुपके से रोया वो
बन्द दीवारों में
रात के अँधियारों में
उदास गलियारों में
चुपके से रोया वो...



शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

बिखरी जिन्दगी के निखरे रंग

अपने कार्य के प्रति अंध प्रेम ने सामाजिक दुनिया से दूर कर दिया। पिछले महीने अपनों द्वारा चोट के उपरांत दफ्तर में अकेला रह गया था। सभी कार्यों से मुझे दूर कर दिया गया। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए बिल्कुल खाली बैठे रहना सजा से कम नहीं था। धीरे धीरे खाली रहने की आदत तो हो गई साथ ही कुछ रोचक बदलाव भी आ गए। समय से घर जाने लगा जिस कारण से शाम को सैर का समय मिलने लग गया। गाँव के बचपन के रिशतें फिर से हरे हो गए , बन्जर से रिश्तों में जैसे जान आ गई। अब वो सभी पुराने दोस्त खेतो की मेढ़ पर हर सप्ताह मिलने लगे है। शहर की अंधी चकाचौंध दुनियाँ से गाँव की अनपढ़ मिट्टी में खुशियाँ मिलने लग गई। जैसे कॉटन बोझ था मेरे दिल पर सारा उतर गया है। और अब दूर से शहर के उन लोगो को देखता हूँ तो उनका जीवन आजभी उन उलझनों से उलझा है वही सियासती चाल कभी वो चलते कभी उनके विरोधी। दुर्भावना वाले मन से कभी किसी पर दोषारोपण तो कभी किसी पर। खैर अभी जीवन सुखद व भरपूर है। देखते है आगे क्या रंग दिखलाता है जीवन फिर उसे शेयर करूँगा। अलविदा।। 

कड़वे शब्द बोलता हूँ