सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

महिला सशक्तिकरण

चारों तऱफ बात तो सब करते है महिलाओं के सशक्तिकरण की, पर करते क्या है? सुरक्षा के नाम पर चंद दीवारें और महिलाओं के लिए खड़ी कर देते है। तुम्हें ये नहीं करना, वो नहीं करना इत्यादि बन्धनों में बांध दिया जाता है।
महिला सशक्तिकरण? महिलाओं को इतना सक्षम बनाना कि उनकी निर्भरता चाहे वो आर्थिक हो या सामाजिक किसी अन्य व्यक्ति विशेष पर न निर्भर हो। उसके आत्मविश्वास को इतना सृदृढ़ बनाना कि उसे किसी भी कार्य को करने में अक्षमता का अनुभव न हो।

पर हम लोग सशक्तिकरण के नाम पर करते क्या है,
कॉलेज के बाहर लड़कियों को लड़के छेड़ते है, वहां पुलिस लगा दो
दफ़्तर में महिलाओं को शोषण होता है, वहाँ भी किसी कमेटी का गठन कर दीजिए।
बेटी को स्कूल जाना है तो बड़े भाई व अन्य को कवच बना जिम्मेदारी उसे सौंप दी।
शादी कर रहे है तो बेटी को अगले घर परेशानी न हो, तो दहेज के बड़ा सा टोकरा लाद दिया।

इन बैसाखियों के सहारे दे दिए ताकि वह अपना जीवन सुखद बना सके। क्या ये ही है महिला सशक्तिकरण।
कल कोई बैसाखी नहीं हुई तो वह महिला फिर स्वयं को असहाय महसूस करें।
सहारा चाहे पुरुष हो या औरत उसे केवल कमज़ोर बनाता है सशक्त नहीं। आपका पुत्र क्यों सशक्त बनता है क्योंकि बचपन से उसके जहन एक ही बात डालते हो ये तो लड़का है कर लेगा बस वह फूक जिंदगी भर उसे उड़ाए रखती है और उस लड़की जिसे कहते है ये तो लड़की है उसको सोने के पिंजरे में कैद कर देते है। कोमलता के नाम पर उसे परिवार की सबसे कमजोर कड़ी बना दिया जाता है। जिसने सही बात कर दी तो उसका मुँह चंद खोखली मिसालों से बन्द कर देंगे कि नारी तो मजबूत है जो बच्चों को जन्म देती है सर परिवार संभालती है इत्यादि बड़ी बड़ी बातों से उसके वजूद को, भावनात्मक परत से ढक दिया जाता है।

महिलाओं को अगर सक्षम बनाना है तो वास्तविकता में बचपन से उनके साथ वही व्यवहार करना होगा जो एक पुरुष के साथ होता है कोई भी ऐसा विन्रम व्यवहार कि वो लड़की है नहीं कर सकती उसके अंदर हीनता को जन्म देना है। अगर परिवार का पुरुष ही उसका सरंक्षक होता तो महिलाओं पर अत्याचार के ज्यादातर मामले में पुरुष परिवार से या रिश्तेदार नहीं होता।

कानून का फायदा भी वो तब उठा सकती है जब उसमें पुरुष के विरुद्ध जाने कि आत्म शक्ति का एहसास होगा।

मेरी उक्त बातें सब निर्रथक है अगर अब भी आप लड़की या महिला को मजबूत बनाने की बजाए उसे सरंक्षण की बैसाखी देना चाहते है। भगवान द्वारा ऐसी कोई कमज़ोरी नहीं दी गई कि महिला पुरुष की ताकत का मुकाबला नहीं कर सकतीं। समाज में अनेक ऐसे उदारहण है जा महिलाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया उसका मुख्य कारण उनकों बढ़ने के लिए सामान अवसर प्रदान करना था।

औरत को सम्मान के साथ होंसला दीजिए, सहारे की बैसाखी कमज़ोर बनाती है इंसान को असली पहचान उसकी समाज में लड़ने की हैसियत दिलाती है।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

बजट 2018: युवाओं का देश और युवा ही नहीं।

न मैं कोई अर्थशास्त्री हूँ , न कोई राजनीतिज्ञ
हाँ एक ऐसा देशवासी हूँ जिसकी उम्मीद होती है कि ख़ुशहाली सबके हिस्से आए, और उसका एक ही रास्ता होता है सबके जीवन यापन हेतु रोज़गार, नोटबन्दी, GST इत्यदि ऐतिहासिक फैसलों के बावजूद सरकार रोज़गार के अवसर देने में पूर्णतः विफल रही। इस आख़िरी बजट से उम्मीद थी शायद युवाओं के लिए कोई सौगात आएगी।

हालांकि सरकार ने गत वर्षों में स्किल इंडिया (ddukgy) नाम की योजनाओं से नए रोजगार सृजन की कोशिश की लेकिन अंतिम चरण में वो भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह लक्ष्य पूरा करने की होड़ में केवल खानापूर्ति बन कर रह गई। युवाओं को रोजगार के नाम पर मार्केटिंग कंपनीयों के शोषण के बाजार में झोंक दिया गया जोकि 5000 से 7000 के वेतन के रूप में लॉलीपॉप साबित हुई।
सरकार को चाहिए कि योजनाओं का किर्यान्वयन करते हुए लक्ष्य पूरा करने की होड़ की बजाए गुणवत्ता पर ध्यान दें। वोटबैंक की राजनीति देश को आगे बढ़ाने की बजाए खोखला बनाती जा रही है। आरक्षण जैसे मुद्दों की वजह से पहले ही समाज में युवाओं में नई खाई बनती जा रही है। एक शोषण को ख़त्म करने के रास्ते हम नए शोषण को जन्म दे रहे है। वो दिन दूर नहीं कब इस देश में आरक्षण को ख़त्म करने के लिए व्यापक आंदोलन होने के आसार है। युवाओं को भी कुछ मुद्दों पर निज हित को भुलाकर सामूहिक हितों को प्राथमिकता देकर फैसले लेने होंगे। शायद तब ही इनके लिए कोई सरकार संजीदगी से फैसले ले।

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

जन्मदिन की शुभकामनाएं

आपके ज़िन्दगी का नया पन्ना,
जो शुरू हुआ, आज नई भोर से

मेरी और से, आपको शुभकामनाएं
जीवन में नई दिशा और ऊर्जा आये

क़ामयाबी कदम चूमें, रिशतें साथ निभाए
रुकावटों के हल मिलें, रास्ते सुगम हो जाए

बरसों के आपके अनुभव में, नए हुनर आयें
नवसृजन व रचनात्मक सोच कीर्तिमान बनाए

होंठों की मुस्कान को उदासी छू भी न पाए
बढ़ते पल, बढ़ते लम्हें, बढ़ते दिवस और बढ़ते साल
शौर्य चढ़कर बोले, बनो दुनियां में एक नई मिसाल

# जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

#सुदामा के चावल की भांति, मेरी पंक्तियों को ही समझना भेंट, आपके लिए हजार अधीनस्थ कर्मचारियों
सा हूँ मैं, पर मेरे लिए चिन्हित गौरवमय अधिकारियों में से हो आप, ईश्वर सदैव आपका गौरव बनाए रखे।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस आने वाला हो तो सभी स्कूल और में रिहर्सल शुरू हो जाती है। गणतंत्र दिवस को भव्यता से मनाने के लिए पुरजोर प्रयास करते है। मगर शिक्षण संस्थानों से बाहर क्या होता है क्या आप जानते है?

कर्मचारियों के लिए 26 जनवरी एक छुट्टी का दिन होता है, आप लोगो के लिए भी 26 जनवरी सरकारी छुट्टी है पूछोगे किस बात कि तो कहेंगे 26 जनवरी की, आधे से ज्यादा लोग इतना भी नहीं बता पाएंगे कि गणतंत्र दिवस है उसका महत्व तो दूर की बात।

टुकड़ों में बंटे इस भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोने के लिए बना था भारत का सविंधान, जिसका मकसद था यहां रहने वाले लोग एक समान है चाहे वो किसी जाति, रंग, क्षेत्र या समुदाय से सम्बंध रखता हो। सबको समान अधिकार दिए गए। आज आधुनिक समाज उस मूल भावना को खो चुका है। तरक्की की अंधी दौड़ में सामूहिक हितों के एवज में निज हिट सर्वोपरि हो गए है। अब लोग सामाजिक कुरूतियों की बजाए , किसी एक समाज या व्यक्ति के हितों के लिए हिंसक प्रवृति से आंदोलन कर रहे है। हम जाने अनजाने उसी पथ की और भाग रहे है जिस पथ पर प्राचीन समय में अलग अलग रियासतों के राजा महाराजा करते थे।

मेरी नजरों में हमे गणतंत्र दिवस के समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ कुछ नवीनकरण भी करना होगा। संविधान की मूल भावना को जनमानस के पटल पर बिठाने के लिए, स्कूल कॉलेज के प्रांगण से निकलकर, नुक्कड़ नाटकों से लोगो को जागरूक करना होगा ताकि सही मायनों में संविधान की महत्ता को आमजन तक पहुंचाया जा सके। जय हिंद।

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

दोस्ती का पोस्टमॉर्टम।

वक़्त की समझ थी, कि फिल्मों का असर, या कमज़ोर दिल, मुझे नही पता मग़र बचपन से मेरी एक टैगलाइन होती थी
देश
दोस्ती
फिर दुनियां

मेरे लिए अपना परिवार इत्यादि भी दुनियां में आते थे पर  देश और दोस्ती सर्वोपरि थी । जिस कड़ी में 1997 में मैने गांव के सरकारी स्कूल में नोवीं कक्षा में दाखिला लिया था तो गांव का एक लड़का मेरा दोस्त बना, दोस्ती का आलम देखिए पूरा गांव हमारी दोस्ती की बात करता था। स्कूल में तो हम सारा दिन साथ होते थे शाम को भी हम नहर किनारे वक़्त बिताते थे। 2001 में मैने उसकी खातिर सरकारी कॉलेज में नंबर पढ़ने के बावजूद , उसके नंबर कम होने के कारण अन्य निम्न दर्जे के कॉलेज में दाखिला लिया। उसकी समस्या उस से पहले मुझ से होकर गुजरती थी। मैं अपनी पॉकेट मनी को भी स्वयं पर खर्च न करके उसकी जरूरतों में खर्च कर देता था। वर्ष 2002 में उसने कॉलेज छोड़ दिया तो मैने भी कॉलेज छोड़ दिया। उसने तो प्राइवेट दवाइयों की कंपनी में नौकरी शुरू कर दी तो मैं भी दिल्ली कोर्स करने चला गया। अब हमारा मिलना सिर्फ एक या दो महीने में हो पाता था पर दोस्ती में कहीं कमी न थी। वर्ष 2003 में जब मेरा कंप्यूटर कोर्स खत्म हुआ तो मैने करनाल कैफ़े में नौकरी कर ली। उस दोस्त में गरीबी देखने के कारण पैसे कमाने की भूख थी। मुझे भी लगता था कि जरूरतों के कारण उसे सही लगता है। मेरा ऐसा हाल था उसके काम कहीं भी जाना हो उसकी एक आवाज पर मैं चला जाता था। उसने बहुत जगह इंटरव्यू दिए, वो पिछली कंपनियों की बढ़ी सैलरी स्लिप बनवाता था और आगे बढ़ता गया, वर्ष 2010 में मेरा तो वेतन 4500 था और उसका 20000 के आसपास फिर भी मेने अपनी पल्सर बाइक उसे दे दी और उसकी स्प्लेंडर ले ली। उस वक़्त तक मेरे दिमाग में उसके लिए कभी तेरा या मेरा न था।

अब वक्त आया वर्ष 2011 जब मैने 1 मई मजदूर दिवस को त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद का समय मेरे जीवन में अमूल्य परिवर्तन लेकर आया, जब बेकारी के समय घर वालों ने भी ताने मारने शुरू किए। भगवान में अत्यंत विश्वास रखने वाले को जब उसके दरवाजों से भी न उम्मीदी मिली तो मन के द्वार बंद होने लगे और मस्तिष्क के द्वार खुलने लगे। पता चल गया कि ये संसार चलता तो दिमाग से है, दिल वाले तो बेवकूफ बनाने के लिए होते है उनके सहारे तो मस्तिष्क वाले आगे बढ़ते है। घर और भगवान तो 2011 में ही मन से निष्काषित हो गए। अब बारी थी दोस्त की, कुछ आवारा लगा लीजिये, या मेरी तरह बेकार दोस्त जिनके साथ मैं घूमने लग गया। तब मैंने उस दोस्त को काफी बार फ़ोन किया तो वो दरकिनार सा करने लग गया, मैने सोचा शायद मेरे नए दोस्त पसंद नही इसलिए करता होगा। पर यहां से नींव पड़ चुकी थी दोस्ती में खटास की वर्ष 2015 तक इस दोस्ती में छोटी छोटी बातों से बड़ी दरारें आने लगी, अब बारी मेरे दरकिनार करने की थी। उसकी हर खुशियों पर जब हम मनाने की बात करते तो वो बहाने से बनाने लग जाता था। जो बाकी के सहपाठी
थे वो मुझे ताने देते ये है तेरा परम् मित्र फिर वो भी जब लालच से भरी बातें करने लग गया तो मेरा मन समझने लगा की शायद कुछ ठीक नही। और वर्ष अप्रैल 2016 में मैने अपनी तरफ़ से उस से रिश्ता तोड़ दिया और आज मेरा कोई दोस्त नही, और न बनाने का दिल है। जानकार तो होते है पर परम् मित्र नहीं होते सब, और उम्मीद है आगे बनाऊ भी नहीं।

मगर शायद किसी कोने में अब भी मन जिंदा था, मस्तिष्क पर मन भारी था।

....आगे की कहानी फिर कभी

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

भ्रांतियों का समाज

जीवन में कभी ये भ्रांति न पाले कि आपकी समस्या या आपके विचारों से किसी को भी कोई सरोकार है। इस समाज का केवल एक ही धर्म है वो है मतलब, जब तक हम एक दूसरे से जुड़े है तो केवल मतलब ही है। इसमें समाज गलत नही क्योंकि ये वास्तविक जीवन की जरूरत  और परंपरा बन चुका है। हाँ जिस काल के विचार मेरे जहन में कौंधते है वो विचार आज के युग में केवल किताबों में धरोहर बन गए है। आप के समक्ष सब आप के उन विचारों को सुनकर , पीठ पीछे खंडन व हास्य का पात्र बनाएंगे। यहाँ सवाल उनके गलत होने का नही क्योंकि सामाजिक नियम है जो विचार बड़े हिस्से को लाभप्रद लगे वो ही पालना में होना चाहिए,

समस्या ये है मुझे किसी से कोई भी वैचारिक, सामाजिक या व्यापारिक संबंध रखने में रुचि नही लेकिन पेट को पालने के लिए नौकरी, और नौकरी को चलाने के लिए समन्वय आवश्यक है, बेशक़ वो आपके विरुध चलता हो। मैंने समाज को वो कार्य करते देखा है जिनके लिए मुझे अक्सर टोका गया और खुद वो शौक से उन कार्यो को अंजाम देते है। इतनी दोहरी हो गई है जिंदगी नियमो का दोहन निजी आवश्यकताओं के आधार पर होने लगा है। भविष्य में कोशिश करूंगा अपने विचारों को किसी पर न थोपने की बजाए, उन्हें ग्रहण करूँ।

गुरुवार, 15 जून 2017

ODF➕

ODF ➕ है क्या?

खुलें में शौच मुक्त होने के पश्चात गाँव में स्वच्छता के अगले चरण की और बढ़ना ही odf प्लस है। जिसके दौरान मुख्यतः पांच तत्वों पर कार्य किया जाता है
1. खुलें में शौच मुक्त की निरंतरता
2. ठोस कचरा प्रबंधन
3. तरल कचरा प्रबंधन
4. ग्राम स्वच्छता:- साफ सफाई
5. व्यक्तिगत स्वच्छता

1. खुलें में शौच मुक्त की निरंतरता बनाये रखना प्रमुख चुनौती है क्योंकि खुलें में शौच मुक्त एक अभियान से हुआ जा सकता है लेकिन बरसों के खुलें में शौच जाने की आदत में परिवर्तन लाने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक है, जिसके लिए निगरानी समिति के सदस्यों का इस तरह से प्रबंधन किया जा सके कि दैनिक निगरानी हो सके। उदारहणतय अगर आपके पास निगरानी समिति में 50 सदस्य है तो रोज केवल 10 सदस्य निगरानी करें ताकि 5 स्थानों पर 2-2 व्यक्ति पहरा दे ताकि हर किसी को 5 दिन पश्चात पहरा देना पड़े जिस से निगरानी निर्बाधित चलती रहे।

2. ठोस कचरा प्रबंधन विस्तृत रूप से देखा जाए तो इसमें गलनशील व अगलनशील कचरे के दो प्रकार होते है। गलनशील में रसोई के अपशिष्ट पदार्थ, मवेशियों के चारा व गोबर इत्यादि आते है जिनका गांव में लोगो द्वारा प्रबंधन तो कर लिया जाता है मगर उनकी तकनीक में सुधार की आवश्यकता होती है
जैसे गांव में पुराने समय से गोबर की खाद के गड्ढे होते है, लेकिन उन गड्ढो में निरंतर गोबर डालते हुए उनको बेसिक बातें बता दी जाए कि समय पर मिट्टी व पत्तो की परतें बनाई जा सके जिससे बढ़िया कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकें।

अगलनशील में दोबारा इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं तो आमतौर पर ग्रामीण कबाड़ी को बेच देते है मगर पॉलीथिन, टेट्रा पैक इत्यादि कचरा जिसके निपटान का कोई स्थायी समाधान नही है एक गंभीर समस्या है, इसका वजन के हिसाब से उत्पादन प्रति घर साप्ताहिक 100 ग्राम भी नही होता, हाँ अगर हम इसका प्रयोग कलात्मक वस्तुएं बनाने के लिए कर सकते है जिनका ज्ञान स्वयं सहायता समूह प्रशिक्षण देकर, ग्राम स्तर पर सुगमकर्ता तैयार किये जा सकते है।

इसी कड़ी में स्वच्छता प्रेरक को वर्मी कम्पोस्ट व बायोगैस का इतना ज्ञान नही होता तो संवंधित कृषि सहायक को भी योजना के साथ जोड़ा जा सकता है ताकि लोगो को सटीक जानकारी दी जा सके।

3. तरल कचरा प्रबंधन एक ऐसी समस्या है जो आधुनिकरण के नाम पर संसाधनों का दिशा निर्देश की कमी में इस्तेमाल के कारण उत्पन्न हुई है। इसमें चाहे सेप्टिक टैंक वाले शौचालय का प्रयोग ले लीजिए, चाहे पानी के लिए सबमर्सिबल का प्रयोग व नालियों के निर्माण में इंजीनियर विंग का ध्यान न देना। इस समस्या को दूर करने के लिए लोगो के व्यवहार परिवर्तन के लिए व्यापक अभियान की आवश्यकता है, चाहे वो पोस्टर, रेडियो, पेंटिंग, घर घर जाकर इत्यादि सप्रेषण के माध्यमो से लोगो के मानसिक पटल पर चित्र अंकित करना। ताकि वह घरेलू स्तर पर सोखता गड्ढा बनाकर व रसोई के दूषित पानी को पेड़ पौधों में इस्तेमाल करके, वाश बेसिन के इस्तेमाल पानी का कनेक्शन टॉयलेट के फ्लश के साथ करके आंशिक सुधार किए जा सकते है।

4. ग्रामीण स्वच्छता:- बढ़ती जनसंख्या के कारण, जगह की कमी के कारण सार्वजनिक स्थलों पर ग्रामीणों द्वारा निजी कचरा व गोबर डालने से गांव की सुंदरता पर ग्रहण लग गया है, जगह जगह गलियों में पशुओं की खोर बना, पशु बांधने से भी समस्या गंभीर बनी हुई है, इसका समाधान समुदाय को ट्रिगर करके ही किया जा सकता है क्योंकि राजनीति करण की वजह से स्थानीय पंच व सरपंच इन विषयों पर गंभीरता नही दिखाते है। इसके लिए सामुदायिक स्वभाविक नेताओ की मदद ली जा सकती है। नालियों को ढकने के पश्चात उनके ऊपर सौंदर्यकरण को बढ़ावा देने के लिए फूल पौधे लगाए जा सकते है।

5. व्यक्तिगत स्वच्छता:- आमतौर पर सभी व्यक्ति गत स्वच्छता के प्रति जागरूक होते है, लेकिन फिर भी स्कूल में सेमिनार करके बच्चों को जागरूक करने से उनमें बचपन से व्यक्तिगत स्वच्छता को व्यवहार में लाया जा सकता है, क्योंकि बच्चें परिवार में बदलाव के कारण बन सकते है। इसमें साथ आंगनवाड़ी वर्करों, आशा वर्कर द्वारा घर घर जाकर महिलाओ को भी खाना बनाने व खाने से पहले, शौच पश्चात हाथ धोने की आदत में शामिल करने के लिए जागरूक किया जा सकता है।
उपरोक्त सभी कार्यों को आकार देने के लिए, एक दृढ़ इच्छाशक्ति व निर्देशन की आवश्यकता है, क्योंकि कोई भी योजना विफ़लता का कारण निर्देशन में ढील भी पाया जाता है, योजना के प्रारम्भ में जो दिशा निर्देश अधिकारी द्वारा दिये जाते है उनमें धीरे धीरे हो जाएगा जैसे विचारों से योजना के पूर्णतः सफल होने पर ग्रहण लग जाता है, इसके अतिरिक्त अन्य कारण गांव स्तर पर डेटा को अच्छी तरह से इकठा न करना भी मुख्य कारण है, हम प्रायः देखते है कि आंकड़ो को एक छत के नीचे बैठकर भर दिया जाता है जिससे बुनियादी सुधारों को छोड़ दिया जाता है। जबकि बुनियादी सुधारों के बिना कोई सफलता प्राप्त नही की जा सकती जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण शहर है, वहाँ सरकार द्वारा सभी सुविधाओं के बावजूद स्थिति दयनीय होती है।

उपरोक्त ज्ञान मेरे विवेकानुसार है जिसमें त्रुटि की संभावनाएं है मगर सुधार की गुंजाइश निरंतर रहती है, यही प्रकृति का नियम भी है, बस हम ये भूल जाते है सुधार के वक़्त उस प्रकृति को ही भूल जाते है, दूरदर्शिता का अभाव नजर आता है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

साम्राज्य का दुष्चक्र

गत कुछ दिनों से में कार्यालय की ग्राम सचिव के समूह स्तर की बैठकों में भाग ले रहा हूँ, जिन अपेक्षाओं से मैंने इन मीटिंग में भाग लिया था उनसे विपरीत अधिकारी का आचरण देखने को मिला। मानता हूँ कि हो सकता है कि मेरी सूझबूझ का स्तर उतना न हो, लेक़िन मेरी समझ अनुसार इन बैठकों का नतीजा शून्य है, जैसे कोई खानापूर्ति के लिए कार्य किया जा रहा हो। जैसे दिखावा करने को की मेने तो अपनी जिम्मेदारी निभा दी दूसरों ने नही किया तो मेरा क्या दोष। क्या इतनी सार्थकता काफी है। केजरीवाल जैसा आचरण है ये तो? जितना हम दूसरों से कार्य की अपेक्षा रखते है अगर स्वयम को उसी तराजू में रखें तो शायद हम कुछ जान पाए। अधिकारियों के पिछले 3 वर्ष में 3 अधिकारी और 3 ही रूप दिखे। प्रथम अधिकारी तो जगजाहिर था, जैसा कहते है सब नेता चोर है पर मेरा काम करदे मुझे उससे क्या। द्वितीय अधिकारी ऐसा की जिसके लिए नौकरी एक सरकारी अध्यापक की तरह थी, जो हो रहा है ऐसे ही होगा मेरा वेतन मिल रहा है मेरा घर चल रहा है वो काफी है। और तीसरे अधिकारी की शिक्षा और दीक्षा देखकर लगा था कि ये अधिकारी तो कुछ जुनून रखता है जमीनी स्तर पर कार्य करने का, मगर आशाओं पर उस वक़्त पानी फिर गया जब मैंने उनकी अखबारों में चमकने की भूख, ग्राम विकास की पीड़ा को अनुभव करने से ज्यादा थी। मैं सहमत हूँ कि समाज स्वयम का दुश्मन बना हुआ है वो निज हित के कारण सामूहिक विषयों को दरकिनार कर देता है। लेकिन इतना आसान होता सत्य का रास्ता तो हर कोई मसीहा या फरिश्ता न होता। संसार नही बदल रहा तो मैं ही बदल गया, इस धारणा का दुष्परिणाम तब देखने को मिलेगा जब आने वाली नस्लें चैन की जिंदगी के लिए जमीन तलाशेगी और सिवा कचरे के और कुछ नही होगा, मेरा शक अधिकारी की क्षमता पर नही और न ही मैं उनकी विवेचना करने की क्षमता रखता हूँ, मैं स्वयं की पीड़ा व्यक्त कर रहा हूँ, क्योंकि इतनी शिक्षा और नयेपन का अधिकारी बहुत कम देखने को मिलेगा और जब वो ही अधिकारी नही काम करेगा तो तकलीफ़ होना जायज है, स्वयम की बात करूं तो फिर सब कहेंगे अहम हो गया, मैं अपनी निर्धारित कार्य को कभी रुकने नही देता और सही कार्य को अधिकारियों से करवा भी लेता हूँ। मुझे तक़लीफ़ इतनी सी बात देती है जब मुझे दुसरो की तुलना करके नीचा दिखाया जाता है, एक विषय पर जब आप मेरी तुलना उनसे करते है क्या अन्य विषय जिनमें मेरी दक्षता है उनकी तुलना की, नही कभी नही। क्योंकि वो विषय तो आपकी पसंद ही नही।

और कुछ बातें सीने में इसलिए दफन कर लेता हूँ क्योंकि समाज का हर बात को लेने का संदर्भ अलग होता है । जब कभी आप किसी का सम्मान करने का नाम करते हो और फिर पलट जाते हो तो क्या उसका अपमान नही हो जाता। और ऐसा एक बार नही बहुत बार हुआ, कभी रिवॉर्ड के नाम लैपटॉप की मीठी गोली, कभी स्वतंत्र दिवस पर सम्मानित करवाने के सपने, यहां इस बात से ये भी प्रश्न उठता है कि जब अधिकारी अपने क्षेत्र का कार्य सम्पन्न नही कर पाता और कर्मचारी से उसकी तय चुनोतियों से अलग कार्य की अपेक्षा रखता है और पूरा न होने पर उसे बैठकों में अपमानित करता है। हालांकि मेने अधिकारी को भी उनके उच्च अधिकारियों के समक्ष बेबस पाया है और ये ही सोचकर मैं स्वयम को तसल्ली देकर अपने कार्य को पूरी मेहनत से पूर्ण करने की कोशिश करता हूँ।
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आज बाहुबली 2 मूवी देखी उसमें कुछ सार समाज की समझ बतलाता है जब आपके मन कपट नही होता तो कपटी व्यक्ति आप का शोषण इस तरह से करेगा आप सोच नही सकते यही जीवन में घटित होता है सदा, जहां आप सहकर्मियों पर भरोसा करते है वहीं सहकर्मी निज हित के लिए आप को मूर्ख साबित करते है, जबकि वो ये भूल जाते है कि जो व्यक्ति उनके स्नेह में एक बार मूर्ख बनकर उन्हें फायदा देता है जीवन भर के दोस्ती में कितना अनमोल होता। और थोड़े लालच में वो बड़ा नुकसान कर देते है। वो मूर्ख मित्र तो मन से प्रसन्न जीवन आनंदपूर्वक जी लेगा क्योंकि उसके मन मैल नही। छल करने वाला सदा छल की दलदल में ही रहता है डर के साये में सदा।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

गुणवत्ता और इच्छा शक्ति::चापलूसी और कर्मठता

क्यों लिख रहा हूँ इस विषय पर जबकि सब की नजरों में कार्यालय में मौजूदा दौर में मेरा एक शशक्त वजूद है, ताने रूपी बाणो से हर क्षण भेदा गया है।
  दूसरी और अधिकारी की बढ़ती उम्मीदों के कारण मानसिक रूप से अपंगता का अनुभव होता है, जब आप शत प्रतिशत देते है और आशाएं एवं अपेक्षाएं ख़त्म होने का नाम नही लेती। इसके अतिरिक्त सिमित संसाधनों व् सभी कार्यो को समावेश बनाये रखना भी आवश्यक होता है। अधिकारी जब उच्च अधिकारियों के दवाब में एक वक़्त में एक मुद्दे को प्राथमिकता देते है तो अन्य विषय लंबित हो जाते है। जिसके कारण हर समस्या के समाधान के तुरंत बाद दूसरी समस्या खड़ी हो जाती है। जबकि समय रहते उचित प्रबंधन किया होता तो शायद वो समस्या गंभीर स्वरूप न लेती।

उदारहण स्वरूप दिसम्बर/जनवरी माह के दौरान मेने अधिकारी का ध्यान नवनिर्मित शौचालय की सूचि और दिलाना चाहा तो मुझे odf की प्राथमिकता का हवाला देकर इस विषय को अनदेखा कर दिया गया। और सिर्फ माह पश्चात् जब odf हुआ तो सर्वप्रथम वही कार्य याद आया, लेकिन एक सोचने की बात odf होने के 2 माह उपरान्त भी कार्यालय के पास कुछ ग्राम पंचायतों के ग्राम सभा प्रस्ताव और शौचालय निर्माण परिवारों की सूचि नही है निरिक्षण तो दूर की बात।

वहीँ दूसरी और स्वच्छ संग्रह बारे उपायुक्त महोदय द्वारा जब डिस्कस के लिए लिखा गया तो विचार विमर्श की बजाए उस कार्य को भी अन्य एजेंसी द्वारा करवाने के निर्णय से ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया। विचार विमर्श सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है किसी भी कार्य को दिशा निर्देश देने के लिए जब तक आप एक पहलु पर कार्य करते रहेंगे दूसरे पहलु के कार्य को कमजोर कर देंगे। फिर सबसे छोटी इकाई को ही सारा दोष मढ़ने की सौहार्दपूर्ण चेतावनी/धमकी। मानता हूँ कि बहुत से विषय हम में से किसी के हाथ नही होते पर टीम के रूप में कार्य करना हमारे हाथ होता है। टीम के रूप कार्य करने का मतलब श्रेय भी सबका और दोष भी सबका।

खैर छोड़िए असली मैं जो मुद्दा था जो काफी दिन की उठा पटक की वजह से ज़हन में चल रहा था वो है एक कंप्यूटर  ऑपरेटर के कार्य न करने का,

इस से पहले में एक उदारहण से अपनी मंशा जाहिर करना चाहूंगा। कभी भी शरीर के किसी अंग में समस्या होती है तो हम उसका इलाज करते है न कि उस निकाल अलग कर देते है कुछ विषम परिस्थितियों में जब वो अंग शरीर के अन्य भागों को नुक़सान पहुंचाए तब अलग करने की जरूरत पड़ती है अनायास तो आप शरीर को ही खत्म कर दोगे, नही समझे?

उस डाटा एंट्री ऑपरेटर में गुणवत्ता या क्षमताओं की कमी नही, सिर्फ इच्छाशक्ति का आभाव है अगर मैं अन्य कर्मचारियों पर नजर डालूँ तो उस से अधिक निक्कमे कर्मचारी मौजूद है कार्यालय में, पर जब वो काम करते नही तो उनसे गलतियां भी नही होती या वो निम्न अधिकारियो की चापलूसी के कारण प्रकाश में आते ही नहीं। आपके निम्न अधिकारी पर भी काफी निर्भर करता है कि वो आपको किस तरह से सिंचित कर रहे है।
जब मौजूदा अधिकारी से मेरी पहले दिन की बैठक थी तो मध्य अन्य कर्मचारी के होने के कारण मेरी एक नकारात्मक छवि बनकर उभरी थी। क्योंकि वो मध्यस्थ कर्मचारी अपनी त्रुटियों को हमेशा दूसरों को थोपने में माहिर है और श्रेय के लिए स्वयं आगे, मुझे ज्ञात नही लेकिन कुछ दिन के पश्चात मेरी छवि में सुधार हुआ और आवश्यकता से अधिक हुआ। अगर मुझे भी उस मध्यस्थ कर्मचारी की भ्रांतियों से ही आकलन किया जाता तो शायद मैं भी उसी कागार पर होता जहाँ आज वो डाटा एंट्री ऑपरेटर है। युवाओं की मानसिकता को भी समझना आवश्यक है कम वेतन मिलने के बावजूद उनके कार्य में सजगता, पूर्ण वेतन मिलने वालों की तुलना में अधिक योगनिय है।

मेरी तो ये ही समझ है कि उस ऑपरेटर को एक और मौका देकर, कार्य करने का मौका दिया जाए तथा समस्या का समाधान किया जाये न कि जड़ें उखाड़ी जाये।

मेरा शायद इतना कहना बनता नही, किसी को ठेस पहुंचाने के मकसद से नही बल्कि एक संवेदना से भरे मनुष्य के रूप में इस स्थिति को समझना चाहा है।

और जो विषय बहुत ही ठेस जनक थे उनका तो मैं जिक्र भी नही कर पाया।

कड़वे शब्द बोलता हूँ